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WHO की बड़ी चेतावनी, आने वाले सालों में हर घर तक पहुंचेगा कैंसर का खतरा, डब्ल्यूएचओं की रिपोर्ट ने बढ़ाई टेंशन
WHO: आने वाले 25 वर्षों में कैंसर के मरीजों की संख्या में बहुत तेज बढ़ोतरी होगी. इतना ही नहीं, दुनिया की लगभग 92 फीसदी आबादी अपने जीवन में किसी न किसी रूप में कैंसर से जरूर प्रभावित होगी.
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WHO: कैंसर आज सिर्फ एक बीमारी नहीं रह गया है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए तेजी से बढ़ती हुई एक गंभीर चुनौती बन चुका है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO ) की नई रिपोर्ट ने इस खतरे को लेकर चिंता और बढ़ा दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले 25 वर्षों में कैंसर के मरीजों की संख्या में बहुत तेज बढ़ोतरी होगी. इतना ही नहीं, दुनिया की लगभग 92 फीसदी आबादी अपने जीवन में किसी न किसी रूप में कैंसर से जरूर प्रभावित होगी. यानी या तो उन्हें खुद यह बीमारी होगी या फिर उनके परिवार, रिश्तेदार या किसी करीबी दोस्त को कैंसर का सामना करना पड़ेगा.
2050 तक कैंसर के मामलों में होगी रिकॉर्ड बढ़ोतरी
8 जुलाई को जारी WHO की ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन कैंसर 2026 के अनुसार, इस समय दुनिया भर में हर साल करीब 2.06 करोड़ नए कैंसर के मामले सामने आते हैं. लेकिन अगर यही रफ्तार जारी रही तो वर्ष 2050 तक यह संख्या बढकर लगभग 3.5 करोड़ तक पहुंच जाएगी. यानी अगले 25 वर्षों में कैंसर के नए मामलों में करीब 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने का अनुमान है. यह आंकड़ा साफ बताता है कि अगर समय रहते रोकथाम और इला पर गंभीरता से काम नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों मे स्थिति और भी चिंताजनक हो सकती है.
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हर साल करीब एक करोड़ लोगों की जान ले रहा है कैंसर
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WHO की रिपोर्ट बताती है कि इस समय कैंसर हर साल लगभग 1 करोड़ लोगों की जान ले रहा है. इसका मतलब है कि हर दिन करीब 26 हजार लोग इस बीमारी की वजह से अपनी जिंदगी खो देते है. यही कारण है कि हृदय रोगों के बाद कैंसर दुनिया में मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह बन चुका है. लेकिन इसका असर केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता. कैंसर का इलाज लंबा और महंगा होता है, जिससे पूरे परिवार को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
लगभग 40 फीसदी कैंसर को रोका जा सकता है
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रिपोर्ट में एक राहत देने वाली बात भी सामने आई है. WHO का कहना है कि करीब चार में से एक नहीं, बल्कि चार में से लगभग दो यानी करीब 40 प्रतिशत कैंसर के मामले ऐसे हैं जिन्हें सही जीवनशैली अपनाकर रोका जा सकता है. तंबाकू और शराब का सेवन, मोटपा, शारीरिक गतिविधियों की कमी, असंतुलित खानपान और कुछ संक्रमण जैसे एचपीवी (HPV), हेपेटाइटिस बी और सी, तथा हेलिकोबैकतर पाइलोरी कैंसर के प्रमुख कारण हैं. अगर लोग इन जोखिमों से बचें और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं, तो बड़ी संख्या में कैंसर के मामलों को रोका जा सकता है.
इलाज में भारी असमानता, गरीब देशों में कम बचती है जान
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रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कैंसर से बचने की संभावना हर देश में समान नहीं है. उदाहरण के लिए, अमीर देशों में ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित लगभग 87 प्रतिशत महिलाएं कम से कम पांच साल या उससे अधिक समय तक जीवित रहती हैं, जबकि गरीब देशों में यह आंकड़ा सिर्फ 42 प्रतिशत के आसपास है. इसकी सबसे बड़ी वजह समय पर बीमारी का पता न चलना और इलाज की सीमित सुविधाएं हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया के तीन में से सिर्फ एक देश ने ही कैंसर के इलाज को अपनी सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं (Universal Health Coverage) में शामिल किया है. इससे करोड़ों लोगों को जरूरी इलाज नहीं मिल पाता.
जरूरी दवाओं तक भी सभी की बराबर पहुंच नहीं
WHO के अनुसार, जीवन बचाने वाली कैंसर की दवाओं तक पहुंच भी दुनिया भर में बराबर नहीं है. कम और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में लोगों को सिर्फ 9 से 54 प्रतिशत जरूरी कैंसर की दवाएं ही उपलब्ध हो पाती हैं. वहीं, अमीर देशों में यह उपलब्धता 68 से 94 प्रतिशत तक है. इसका सीधा असर मरीजों के इलाज और उनकी जिंदगी पर पड़ता है.
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एशिया में सबसे ज्यादा कैंसर के मामले
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में दुनिया भर में सामने आए कुल कैंसर मामलों में से 50.7 प्रतिशत मामले अकेले एशिया में दर्ज किए गए. वहीं, कैंसर से होने वाली कुल मौतों में 56.5 प्रतिशत हिस्सेदारी भी एशिया की रही. इसकी सबसे बड़ी वजह यहां की बड़ी आबादी है. अगर अलग-अलग कैंसर की बात करें तो फेफड़ों का कैंसर आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा जान लेने वाला कैसर बना हुआ है. पुरुषों में फेफड़े, प्रोस्टेट और कोलोरेक्टल कैंसर सबसे अधिक पाए जाते हैं, जबकि महिलाओं में ब्रेस्ट, फेफड़े और कोलोरेक्टल कैंसर सबसे आम हैं.
कैंसर सिर्फ शरीर नहीं, पूरी जिंदगी को प्रभावित करता है
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WHO ने पहली बार कैंसर से प्रभावित लोगों पर एक वैश्विक सर्वे भी किया. इसमें सामने आया कि कैंसर का असर सिर्फ मरीज के शरीर तक सीमित नहीं रहता. करीब 45 प्रतिशत मरीजों ने बताया कि इलाज के दौरान उन्हें गंभीर आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा. वहीं, आधे से ज्यादा लोगों ने मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं होने की बात कही. मरीजों की देखभाल करने वाले लगभग सभी लोगों ने माना कि इस दौरान उन्हें बिना किसी भुगतान के लंबे समय तक देखभाल करनी पड़ी, सामाजिक जीवन प्रभावित हुआ और मानसिक दबाव भी बढ़ा.
WHO ने सरकारों से की ठोस कदम उठाने की अपील
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WHO का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में तंबाकू के इस्तेमाल में कमी आई है, कई देशों ने राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजनाएं शुरू की हैं और जांच व इलाज की तकनीकों में भी सुधार हुआ है. लेकिन यह प्रयास अभी पर्याप्त नहीं हैं. बढ़ते कैंसर के खतरे को देखते हुए सरकारों को रोकथाम पर ज्यादा ध्यान देना होगा, लोगों को समय पर जांच और इलाज की सुविधा देनी होगी, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना होगा और जरूरी दवाएं हर मरीज तक सस्ती कीमत पर पहुंचानी होंगी.