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क्या रक्तदान से सच में होती है कमज़ोरी? जानिए इससे जुड़े मिथकों का सच, क्या कहते हैं हेल्थ एक्सपर्ट

रक्तदान को लेकर अक्सर कई तरह के सवाल मन में आते हैं। ऐसा नहीं होता की सीधे सुई लगाई जाए और खून निकाल लिया जाए। सुरक्षा और स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हुए रक्तदान की प्रक्रिया बेहद सुरक्षित और व्यवस्थित होती है।

Image Credit: ChatGPT
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हर साल 14 जून को दुनिया भर में 'विश्व रक्तदान दिवस' मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को रक्तदान के महत्व के प्रति जागरूक करना और स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देना है। रक्तदान को हमेशा 'महादान' का दर्जा दिया गया है, क्योंकि एक स्वस्थ व्यक्ति द्वारा रक्तदान करना किसी  ज़रूरतमंद इंसान को जिंदगी देने जैसा है। लेकिन इसके बावजूद आज के आधुनिक दौर में भी एक बड़ी आबादी रक्तदान करने से ही हिचकिचाती है।

रक्तदान को लेकर फैली गलत धारणाएं 

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है की इसका सबसे बड़ा कारण है समाज में रक्तदान को लेकर फैली गलत धारणाएं और भ्रांतियां, जो लोगों के मन में डर पैदा करती हैं। सबसे बड़ी गलतफहमी ये है कि रक्तदान करने से शरीर कमजोर हो जाता है या लंबे समय तक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। 

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डॉक्टर्स के अनुसार ये धारणा पूरी तरह गलत है। वास्तव में एक स्वस्थ व्यक्ति का शरीर बहुत तेजी से रक्त की पूर्ति कर लेता है।

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एक यूनिट रक्त कई मरीजों के इलाज में उपयोगी 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) भी लोगों से लगातार अपील कर रहा है कि वे इन भ्रांतियों से बाहर निकलकर स्वैच्छिक रक्तदान को अपनाएं। एनएचएम के अनुसार, यदि अधिक लोग नियमित रूप से रक्तदान करें तो देश में रक्त की कमी की समस्या काफी हद तक दूर की जा सकती है। एक यूनिट रक्त कई मरीजों के इलाज में उपयोगी साबित होता है, खासकर दुर्घटनाओं, सर्जरी और प्रसव जैसी आपात स्थितियों में।

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रक्तदान को लेकर अक्सर कई तरह के सवाल मन में आते हैं। ऐसा नहीं होता की सीधे सुई लगाई जाए और खून निकाल लिया जाए। सुरक्षा और स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हुए रक्तदान की प्रक्रिया बेहद सुरक्षित और व्यवस्थित होती है।

रक्तदान से पहले स्वास्थ्य जांच ज़रूरी 

रक्तदान से पहले डोनर की पूरी स्वास्थ्य जांच की जाती है। इसमें हीमोग्लोबिन, ब्लड प्रेशर और सामान्य स्वास्थ्य की जांच शामिल होती है। केवल वही व्यक्ति रक्तदान कर सकता है जो पूरी तरह स्वस्थ हो। 18 से 65 वर्ष की आयु के लोग इस प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं, बशर्ते उनका हीमोग्लोबिन कम से कम 12.5 ग्राम प्रति डेसीलीटर हो।

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डॉक्टर्स के अनुसार, पुरुष हर तीन महीने में और महिलाएं हर चार महीने में रक्तदान कर सकती हैं। पूरी प्रक्रिया केवल कुछ मिनटों की होती है और इसका शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। इसके विपरीत, यह शरीर में नई रक्त कोशिकाओं के निर्माण को भी प्रोत्साहित करता है।

स्वास्थ्य विभाग और विभिन्न संस्थान लोगों को जागरूक करने के लिए लगातार अभियान चला रहे हैं। स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों पर रक्तदान शिविर आयोजित किए जा रहे हैं ताकि अधिक से अधिक लोग इस सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ सकें।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग सही जानकारी प्राप्त करें और गलत धारणाओं को छोड़ दें तो देश में रक्त की उपलब्धता की समस्या काफी हद तक हल हो सकती है।

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Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य ज्ञान और जागरूकता के उद्देश्य से है. प्रत्येक व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और आवश्यकताएं अलग-अलग हो सकती हैं. इसलिए, इन टिप्स को फॉलो करने से पहले अपने डॉक्टर या किसी विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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