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राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दो साल हुए पूरे, 'मोदी आर्काइव' ने शेयर किया PM Modi का 36 साल पुराना लेख

22 जनवरी 2024 को राम मंदिर के निर्माण के बाद रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी. इस तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर 'मोदी आर्काइव' ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'अयोध्या में सामाजिक क्रांति का जयघोष' लेख को शेयर किया है.

राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दो साल हुए पूरे, 'मोदी आर्काइव' ने शेयर किया PM Modi का 36 साल पुराना लेख
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 पिछले छह वर्षों में भारत समेत पूरे विश्व ने अयोध्या में राम मंदिर के संघर्ष की विजय से लेकर भव्य मंदिर और उस मंदिर के ऊपर फहराते पताका को देखा है. आज से ठीक दो साल पहले, 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर के निर्माण के बाद रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी. इस तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर 'मोदी आर्काइव' ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'अयोध्या में सामाजिक क्रांति का जयघोष' लेख को शेयर किया है. 

 ‘नरेंद्र मोदी का एक लेख साधना के 'अक्षर उपवन' में छपा था’

1987 में भाजपा में शामिल होने के दो साल बाद 18 नवंबर 1989 को नरेंद्र मोदी का एक लेख साधना के 'अक्षर उपवन' में छपा था. यह लेख गुजराती भाषा में लिखा गया था. 'मोदी आर्काइव' ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, "साधना के 'अक्षर उपवन' में 'अनिकेत' उपनाम से लिखा गया नरेंद्र मोदी का यह विशेष लेख अयोध्या के ऐतिहासिक राम शिलान्यास (9–10 नवंबर 1989) की स्मृति को जीवंत करता है.”

‘आजाद भारत में पहली बार हिंदू विजयश्री की ओर कदम बढ़ा रहा है’

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उन्होंने अपने लेख 'अनिकेत' में लिखा, "आजाद भारत में पहली बार हिंदू विजयश्री की ओर कदम बढ़ा रहा है. 9 और 10 नवंबर 1989 हिंदू चेतना के इतिहास में गगनचुंबी स्मारक बनकर रहेंगे. अयोध्या में हुए रामशिला न्यास विधि को अनेक लोग अनेक दृष्टियों से देखेंगे. राजनीतिक ठेकेदारी करने वाले कुछ बुद्धिजीवी उसमें कल्पना-लोक के रंग भरकर मनमाने अर्थ निकालेंगे. हिंदू विजय में कुछ लोगों को कांग्रेस की सहमति दिखाई देगी, तो कुछ को विश्व हिंदू परिषद की पीछे हटने की कल्पनात्मक साम्राज्य रचना में आनंद आएगा.”

‘हिंदुस्तान में घटी इस घटना की ओर पूरे विश्व का ध्यान केंद्रित था’

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इस लेख में लिखा गया, "हिंदुस्तान में घटी इस घटना की ओर पूरे विश्व का ध्यान केंद्रित था. राजनीतिक रूप से वोटों के लालच में जीने वाले कुछ सत्ता-भूखे भेड़िए पूरे प्रसंग की सच्चाई से आंखें मूंदकर दंगों के भय को आगे रख रहे थे. ऐसे सभी लोगों के लिए हिंदू चेतना का यह गौरवमय दिन एक पाठ बनकर रहेगा. अयोध्या का शिलान्यास 450 वर्ष पुरानी गुलामी की निशानी पर एक प्राणघातक प्रहार के साथ-साथ सांस्कृतिक आज़ादी की विजययात्रा का शुभारंभ है. जो लोग इस घटना में राजनीतिक चालें और गंध-सुगंध खोजने में लगे हैं, उन्हें अयोध्या की घटना का मूल्यांकन करने से पहले इस घटना के मूल में निहित जनचेतना की अभिव्यक्ति के इतिहास को देखना चाहिए, तभी वे सत्य को समझ पाएंगे.”

‘विश्व हिंदू परिषद ने इसका नेतृत्व किया’

'अनिकेत' में लिखा गया, "अयोध्या की घटना स्पष्ट रूप से विराट की विजयश्री की घटना है. यह सब यूं ही नहीं हुआ है. कांग्रेस संस्कृति की अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति ने इस विजययात्रा में कदम-कदम पर हवन में हड्डियां डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी. देश आजाद होने के बाद रामभक्तों ने 1947 में रामजन्मभूमि की मांग की. चालीस-चालीस वर्षों तक कांग्रेस शासकों ने न केवल उसे ठुकराया, बल्कि बेचारे हिंदुओं की बात कान पर भी नहीं रखी. 1982 से हिंदू इस प्रश्न पर धीरे-धीरे जागृत होने लगे. विश्व हिंदू परिषद ने इसका नेतृत्व किया.”

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‘ये हिंदुओं की दूसरी विजय थी’

इस लेख में तब की कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा गया. 'अनिकेत' में लिखा है, "जनजागृति के लिए जब विश्व हिंदू परिषद ने राम-जानकी रथ निकाले तो कांग्रेस सरकार ने उन्हें रोका, प्रतिबंध लगाए. संत-महंतों ने चेतावनी दी, हिंदू उग्र हुए, तब कांग्रेस सरकार को झुकना पड़ा. केवल तीन महीनों में रथों को मुक्त करना पड़ा. रामजन्मभूमि मंदिर का ताला खोलने का साधु-संतों ने अल्टीमेटम दिया. चालीस वर्षों से ताला खोलने से इनकार करती कांग्रेस को हिंदू शक्ति के दर्शन होने लगे. अदालत के निर्णय का बहाना बनाकर उसे ताला खोलना पड़ा. यह हिंदुओं की दूसरी विजय थी.”

‘हिंदुओं ने वह चुनौती भी स्वीकार कर ली’

उन्होंने लिखा, "राम मंदिर के लिए शिला-पूजन कार्यक्रम की बात आई. कांग्रेस सरकार ने खोखली धमकियों के साथ कहा कि ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं होने दिया जाएगा. हिंदू अडिग रहे. कांग्रेस सरकार को फिर झुकना पड़ा. देशभर में गांव-गांव, घर-घर रामशिला पूजन कार्यक्रम हुए. कांग्रेस के कानून कागजों पर ही रह गए. कांग्रेस की हीन मानसिकता अब भी शांत नहीं बैठी. उसने शिलाओं की शोभायात्राओं पर प्रतिबंध लगाने का ढोल पीटा. हिंदुओं ने वह चुनौती भी स्वीकार कर ली. कांग्रेस सरकारों की नाक के नीचे शानदार और जोरदार शोभायात्राएं निकलीं और कांग्रेस के प्रतिबंध हवा हो गए.”

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‘सेना और पुलिस के काफिले तैनात कर दिए गए’

कांग्रेस पर आरोप लगाए गए कि वोट के लिए भूखी इस पार्टी ने मुसलमानों को खुश करने के लिए उछलकूद को जारी रखा. 'अनिकेत' में लिखा गया, "कांग्रेस ने अयोध्या में शिलाएं लाने पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी, पर कुछ हासिल नहीं हुआ. फिर भी उसने 9 नवंबर के कार्यक्रम को रोकने का प्रयास किया. सेना और पुलिस के काफिले तैनात कर दिए गए, भय का साम्राज्य खड़ा किया गया, प्रचार तंत्र का बेतहाशा दुरुपयोग किया गया, धमकियां दी गईं, साम-दाम-दंड-भेद से साधु-संतों को विचलित करने के नीच प्रयास किए गए, फिर भी कांग्रेस सरकार को कुछ हासिल नहीं हुआ. हवन में हड्डियां डालने के उनके लाख प्रयास पूरी तरह विफल रहे.”

‘सांस्कृतिक शक्तियों के सामने राजसत्ता की पराजय की घटना है’

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अयोध्या की घटनाओं का जिक्र करते हुए इस लेख में लिखा गया, "सांस्कृतिक शक्तियों के सामने राजसत्ता की पराजय की घटना है. कांग्रेस की कथित धर्मनिरपेक्षता के खोखलेपन पर सत्य का तमाचा है. 43 वर्षों की कांग्रेस संस्कृति के राजनीतिक षड्यंत्रों को उजागर करने वाला एक ऐतिहासिक सत्य है और इन सबसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण संकेत कुछ और ही हैं.”

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