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पुरुषोत्तम मास विशेष: कहां है समंदर किनारे स्थित ये भव्य मंदिर, जहां नारायण के साथ विराजते हैं महादेव

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों को समर्पित है. मंदिर परिसर में शिवलिंग स्थापित है. वहीं भगवान विष्णु की शयन मुद्रा वाली प्रतिमा भी मौजूद है.

पुरुषोत्तम मास विशेष: कहां है समंदर किनारे स्थित ये भव्य मंदिर, जहां नारायण के साथ विराजते हैं महादेव
Image Credits: Shore temple/ Incredibleindia/Portal
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भारत एक देश, जिसे मंदिरों का देश भी कहा जाता है. यहां कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में ऐसे कई मंदिर हैं, जो केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं, बल्कि आस्था के साथ इतिहास और कला के भी प्रतीक हैं. तमिलनाडु के मामल्लापुरम में स्थित शोर मंदिर भी ऐसा ही धार्मिक स्थल है. खास बात है कि नारायण के इस मंदिर में उनके साथ उनके आराध्य यानी देवाधिदेव महादेव भी विराजते हैं. 

 इस खास महीने में भगवान विष्णु के दर्शन का भी विशेष विधान है

वर्तमान में भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित और उन्हें अति प्रिय पुरुषोत्तम का महीना (अधिक मास) चल रहा है. इस खास महीने में भगवान विष्णु के दर्शन का भी विशेष विधान है. देवालय में हर और हरि की संयुक्त उपासना की जाती है. बंगाल की खाड़ी के किनारे खड़ा यह प्राचीन मंदिर श्रद्धा, इतिहास और स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है.

किसने कराया था इस मंदिर का निर्माण

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से लगभग 55 किलोमीटर दक्षिण में स्थित मामल्लापुरम, जिसे महाबलीपुरम भी कहा जाता है. देश के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है. यहां स्थित शोर मंदिर दक्षिण भारत के सबसे पुराने संरचनात्मक मंदिरों में गिना जाता है. माना जाता है कि इसका निर्माण आठवीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय (जिन्हें राजसिंह भी कहा जाता है) ने कराया था.

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भगवान शिव-भगवान विष्णु दोनों को समर्पित है ये मंदिर

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों को समर्पित है. मंदिर परिसर में शिवलिंग स्थापित है. वहीं भगवान विष्णु की शयन मुद्रा वाली प्रतिमा भी मौजूद है. यही कारण है कि यह मंदिर शैव और वैष्णव परंपराओं के समन्वय का प्रतीक माना जाता है. शोर मंदिर भी नारायण की भक्ति और सनातन परंपरा की गौरवशाली विरासत को दर्शाता है.

ये मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है

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ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित यह मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है. समुद्र की लहरों के ठीक सामने खड़ा यह मंदिर दूर से किसी विशाल प्रहरी की तरह दिखाई देता है. इसके ऊंचे शिखर, सुंदर नक्काशी और कलात्मक संरचना आज भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं. मंदिर का मुख्य भाग पूर्व दिशा की ओर है, जिससे सूर्योदय की पहली किरण सीधे मंदिर पर पड़ती है और इसका दृश्य अत्यंत मनमोहक बन जाता है.

आज केवल शोर मंदिर ही सुरक्षित रूप से दिखाई देता है

इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर कभी समुद्र तट पर बने सात भव्य मंदिरों के समूह का हिस्सा था. प्रसिद्ध यात्री मार्को पोलो ने भी अपनी यात्राओं के दौरान इन मंदिरों का उल्लेख "सात पैगोडा" के रूप में किया था. समय के साथ समुद्र की लहरों ने अधिकांश मंदिरों को अपने भीतर समा लिया और आज केवल शोर मंदिर ही सुरक्षित रूप से दिखाई देता है.

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अभी भी कुछ प्राचीन संरचनाएं समुद्र के भीतर मौजूद 

साल 2004 की सुनामी के दौरान समुद्र का जलस्तर अचानक पीछे हटने पर कुछ प्राचीन अवशेष दिखाई दिए थे. इसके बाद पुरातत्वविदों ने यहां शोध कार्य किया, जिससे इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को लेकर नई जानकारियां सामने आईं. माना जाता है कि अभी भी कुछ प्राचीन संरचनाएं समुद्र के भीतर मौजूद हो सकती हैं.

 हर साल देश-विदेश से हजारों पर्यटक यहां पहुंचते हैं 

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शोर मंदिर और मामल्लापुरम के अन्य स्मारकों को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है. यह सम्मान इस क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य महत्ता को दर्शाता है. हर वर्ष देश-विदेश से हजारों पर्यटक यहां पहुंचते हैं और प्राचीन भारतीय कला की भव्यता को करीब से देखते हैं.

इस मंदिर के दर्शन करने के लिए अब आना चाहिए

समुद्र की लहरों के बीच अडिग खड़ा शोर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, आस्था और स्थापत्य कौशल का जीवंत प्रतीक है. यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन को पहुंचते हैं. यदि आप इस मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं तो अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. इस दौरान मौसम सुहावना रहता है और समुद्र तट की खूबसूरती भी अपने चरम पर होती है.

कैसे करने पहुंचे मंदिर के दर्शन

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मामल्लापुरम पहुंचने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो लगभग 55 किलोमीटर दूर स्थित है. वहीं निकटतम रेलवे स्टेशन चेंगलपट्टू रेलवे स्टेशन है, जो करीब 23 किलोमीटर की दूरी पर है. चेन्नई और आसपास के शहरों से सड़क मार्ग द्वारा भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है.

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