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‘वोट के लिए नाटक…’ कांशीराम को ‘प्रधानमंत्री’ बनाने का दावा करने वाले राहुल गांधी को योगी के मंत्री ने दिखाया आईना

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक और दलित नेता कांशीराम पर इन दिनों UP की राजनीति गर्माई हुई है. राहुल गांधी का कांशीराम को ‘प्रधानमंत्री’ बनाने वाला बयान दावा अब कांग्रेस को ही भारी पड़ रहा है.

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14 Mar 2026
( Updated: 14 Mar 2026
03:51 PM )
‘वोट के लिए नाटक…’ कांशीराम को ‘प्रधानमंत्री’ बनाने का दावा करने वाले राहुल गांधी को योगी के मंत्री ने दिखाया आईना
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उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को साधने की राजनीतिक जंग तेज हो गई है. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लखनऊ में कांशीराम जयंती से जुड़े 'सामाजिक परिवर्तन दिवस' कार्यक्रम में बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा, 'अगर जवाहरलाल नेहरू जी जिंदा होते तो कांशीराम जी कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते.’ 

यह कार्यक्रम कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग (OBC) और अनुसूचित जाति (SC) विभागों और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सहयोग से इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित किया गया. पार्टी ने मंच से प्रस्ताव पारित कर कांशीराम को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग की. कांग्रेस का यह कदम 2027 चुनाव में दलितों को आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. यह बसपा की कमजोर स्थिति को भुनाने की कोशिश है. राहुल ने कहा कि आज BJP ने समाज को 15-85 में बांट दिया है, जबकि कांशीराम बराबरी की बात करते थे. 

BJP ने किया पलटवार, कसा तंज

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उत्तर प्रदेश सरकार में समाज कल्याण, अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण मंत्री असीम अरुण ने राहुल गांधी के बयान और कांग्रेस के कांशीराम प्रेम को बनावटी करार दिया. उन्होंने कहा, 'राहुल गांधी को इतिहास-भूगोल कुछ मालूम नहीं है. माननीय कांशीराम ने कांग्रेस के खिलाफ ही बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी. कांग्रेस के दलितों के शोषण पर तो कांशीराम जी ने पूरी किताब लिखी है. राहुल गांधी को कांशीराम जी की किताब 'चमचा युग' जरूर पढ़नी चाहिए. कांशीराम जी मानते थे कि कांग्रेस पार्टी ने ऐसी नीति अपनाई जिससे दलित नेता सिर उठाकर खड़ा न हो सके. कांग्रेस को दलित समाज से केवल चमचे नेता चाहिए थे. सच ये है कि कांग्रेस तो कांशीराम जी को अछूत मानती थी और उनके जीते जी कभी सम्मान नहीं दिया. अब केवल वोट के लिए राहुल गांधी नाटक कर रहे हैं. कांशीराम एक स्वाभिमानी नेता थे और पूरे जीवन दलित स्वाभिमान के लिए काम किया.’ 

असीम अरुण ने आरोप लगाया कि चुनावी साल में कांग्रेस और सपा दोनों कांशीराम की विरासत पर दावा पेश कर रहे हैं, लेकिन दोनों का इससे कोई वास्तविक लेना-देना नहीं है. 

सपा-कांग्रेस की होड़, बसपा की विरासत

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दिलचस्प है कि सपा और कांग्रेस दोनों कांशीराम को अपना बताने की कोशिश में लगे हैं, जबकि कांशीराम ने बसपा बनाकर कांग्रेस विरोधी रुख अपनाया था. कांशीराम के निर्देशन में बसपा ने BJP से तीन बार गठबंधन किया. माना जाता है कि अगर कांशीराम आज होते तो शायद BJP के सबसे करीब होते. बसपा सुप्रीमो मायावती ही इस विरासत पर सबसे ज्यादा हक रखती हैं, जो जानती हैं कि कांग्रेस और सपा ने दलितों के साथ कैसा व्यवहार किया और उनके नेताओं का शोषण किया. 

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यह राजनीतिक बयानबाजी 2027 में दलित वोटों की लड़ाई को और रोचक बनाती है, जहां बसपा की कमजोरी कांग्रेस और सपा के लिए मौका बनी है, लेकिन BJP इसे विपक्षी वोट बंटवारे के रूप में देख रही है. 

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