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ब्राह्मण विरोध कर पुर्खों ने तमिलनाडु में जमाए पैर, सनातन को कोसते रहे उदयनिधि स्टालिन, CM विजय की चुप्पी पर उठे सवाल

तमिलनाडु विधानसभा के सत्र के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को लेकर विवादित टिप्पणी की. जिसपर सीएम विजय की चुप्पी ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

ब्राह्मण विरोध कर पुर्खों ने तमिलनाडु में जमाए पैर, सनातन को कोसते रहे उदयनिधि स्टालिन, CM विजय की चुप्पी पर उठे सवाल
Image Credits:IANS/Video Grab/UdhayanidhiStalin/Twitter
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तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर सनातन धर्म को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है. विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद भी DMK नेताओं के विवादित बयान रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. हाल ही में तमिलनाडु की विधानसभा में मंगलवार को कुछ ऐसा हुआ, जिसने सनातन पर आस्था रखने वालों की भावनाएं आहत कर दीं. 

उदयनिधि स्टालि का सनातन पर विवादित बयान

एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उदयनिधि स्टालिन उसी पुराने एजेंडे के साथ नज़र आए, जिसके के लिए उनकी पार्टी डीएमके सदियों से जानी जाती है. तमिलनाडु विधानसभा के सत्र के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को लेकर विवादित टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि “सनातनम्, जिसने लोगों को बांटा, उसे खत्म कर देना चाहिए.” 

सनातन के अपमान पर क्यों चुप रहे विजय

जिस तरह से स्टालीन के अमर्यादित बयान को खामौशी से उन्होंने सुना और इस पर कुछ भी बोलने की ज़हमत तक नहीं उठाई तो कई लोगों के दिल को चुब गई. विकास की राजनीति की बात कहने वाले विजय के इस रुख़ पर अब ये भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या सीएम विजय के दिल में सनातन विरोध वाली दशको पुरानी द्रविडियन पॉलिटिक्स ही घर करती है. अगर उनकी भी यही सोच है तो मानिए तमिलनाडु की अवसर वाली राजनीति में सिर्फ चेहरे बदले हैं, बाते वही पुरानी ही है. और अगर वो इस सोच से ताल्लुख नहीं रखते तो सवाल एक बार फिर वही आता है कि विजय सनातन के अपमान पर ख़ामोश क्यों रहे. वहीं सवाल ये भी है कि क्या मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए ऐसे धर्म से जुड़ी हेट स्पीच को सहन कर रहे हैं?

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कांग्रेस की चुप्पी पर भी बवाल 

इस मामले पर सबसे चौंकाने वाली खामोशी कांग्रेस पार्टी की है, जब उदयनिधि स्टालिन विधानसभा में सनातन को लेकर हेड स्पीच दे रहे थें, तब सिर्फ बीजेपी के एक विधायक ने इसका विरोध किया था. वहीं विधानसभा में मौजूद कांग्रेस के विधायक इस मुद्दे पर पूरी तरह से ख़ामोश रहे. उत्तर भारत में वोटों के लिए मंदिर-मंदिर फेरे लगाने वाली कांग्रेस भी पूरी तरह से चुप है. 

अमित मालवीय ने किया पलटवार

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने इस मुद्दे पर ज़ोरदार पलटवार किया. उन्होंने कहा, “पिछली बार जब उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को ‘मिटाने’ की बात कही थी, तो अदालतों ने इसे ‘हेट स्पीच’ करार दिया था. इस बार, तमिलनाडु की जनता ने उनकी पार्टी को विपक्ष में धकेल दिया है. हो सकता है कि वह उस कानूनी सुरक्षा की आड़ ले रहे हों, जो उन्हें विधायिका से मिली हुई है. लेकिन कुछ सीमाएं ऐसी होती हैं जिन्हें पार करने पर उसके गंभीर परिणाम भुगतने ही पड़ते हैं. लाखों लोगों की आस्था का मजाक उड़ाना और उसे निशाना बनाना राजनीतिक साहस नहीं, बल्कि कोरा अहंकार है. इस बार, ईश्वरीय दंड अत्यंत भीषण हो.”

अमित मालवीय वही शख्स हैं, जिनके खिलाफ डीएमके ने उदयनिधि की ‘हेट स्पीच’ का विरोध करने पर एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था.

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पुर्खे भी करते आए हैं सनातन विरोधी राजनीति

उदयनिधि ने सितंबर 2023 को सनातन को लेकर जो बयान दिए और उसके बाद अपने उसी बयान को तमिलनाडु की विधानसभा में दोहराया, वह उनकी सिर्फ अपनी सोच नहीं है. बल्कि, उनके पुर्खे भी दशकों से यही राजनीति करते आए हैं. आपको बता दें कि उदयनिधि स्‍टालिन तमिलनाडु के पूर्व मुख्‍यमंत्री एमके स्‍टालिन और एम करुणानिधि के पौत्र हैं. तमिलनाडु में इस राजनीति की शुरूआत 1916 में जस्टिस पार्टी का गठन कर टीएम नायर और त्‍यागराज चेट्टी ने की थी. तब यह सिर्फ ब्राह्मण विरोधी मुहिम हुआ करता था और इसका आधार मद्रास प्रेसीडेंसी के वरिष्‍ठ पदों पर ब्राह्मण समुदाय का वर्चस्‍व था.

तब हिंदी का विरोध कर बनाई थी राजनैतिक जमीन

1944 में ईवी रामास्‍वामी (पेरियार) ने सीएन अन्‍नादुरई (अन्ना) के साथ मिलकर द्रविड़ कड़गम (डीके) पार्टी का गठन किया था. अपनी राजनैतिक महत्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्‍होंने ब्राह्मण विरोध को हिंदी विरोध से जोड़ दिया था. साथ ही, इसे तमिल अस्‍मिता की शक्‍ल देकर आंदोलन के तौर पर खड़ा कर दिया था. चूंकि पेरियार अगल ‘द्रविड़नाडु’ राष्‍ट्र चाहते थे और अन्‍नादुरई उनकी इस बात से सहमत नहीं थे, लिहाजा 1949 में उन्‍होंने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली. 1967 के चुनावों में इसी आंदोलन पर सवार होकर डीएमके ने बड़ी जीत हासिल की और अन्‍नादुरई मुख्यमंत्री बने गए.

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जब उयदनिध‍ि के दादा ने संभाली ब्राह्मण विरोध की कमान

1969 में सीएन अन्‍नादुरई का निधन हो गया, जिसके बाद एम. करुणानिधि (कलैनार) ने मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख का पद संभाला. एम. करुणानिधि भी पेरियार और अन्‍नादुरई की ब्राह्मण विरोध वाली सोच को आगे बढ़ाते रहे. इसके बाद, उनकी इस विरासत को उनके बेटे एमके स्‍टालिन ने आगे बढ़ाया. अब एमके स्‍टालिन के बेटे उदयनिधि स्‍टालिन अपने पुर्खों की इस नफरत वाली राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए मर्यादा की सारी हदें पार कर गए हैं. उन्‍होंने ब्राह्मण‍ विरोध के साथ-साथ पूरे सनातन को खत्‍म करने की बात कहना शुरू कर दिया है. वहीं, उसकी इस हेट स्‍पीच पर सभी खामोश हैं.

पहले भी दे चुके हैं ऐसे बयान

यह पहली बार नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को लेकर विवादित बयान दिया हो. साल 2023 में भी उन्होंने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों से की थी. उस समय भी देशभर में बड़ा विवाद खड़ा हुआ था.उन्होंने तब कहा था कि सनातन धर्म का सिर्फ विरोध करना काफी नहीं है, बल्कि इसे खत्म कर देना चाहिए क्योंकि यह सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है. उनके उस बयान को लेकर कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए थे और राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई थी.

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चुनावी हार के बाद और बढ़ी मुश्किलें

इस बार तमिलनाडु चुनाव में DMK को बड़ा झटका लगा. पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और खुद एमके स्टालिन भी अपनी सीट नहीं बचा पाए. ऐसे में उदयनिधि का नया बयान पार्टी के लिए और मुश्किलें खड़ी कर सकता है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि चुनाव में हार के बाद पार्टी को आत्ममंथन की जरूरत है, लेकिन विवादित बयान लगातार उसके लिए नई परेशानियां पैदा कर रहे हैं.

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