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अमेरिका-ईरान समझौते में क्या-क्या हुआ तय? 14 पॉइंट्स में समझें पूरी डील, जानें किन मुद्दों पर अब भी फंसी है बात
अमेरिका और ईरान के बीच चार महीने से जारी संघर्ष को खत्म करने के लिए समझौता हो गया है. ट्रंप ने इसकी पुष्टि करते हुए होर्मुज स्ट्रेट खोलने और नाकेबंदी हटाने का ऐलान किया. हालांकि, कुछ अहम मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद अब भी बने हुए हैं
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करीब चार महीने तक चले तनाव, सैन्य कार्रवाई और वैश्विक चिंता के बाद सोमवार की सुबह अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते पर सहमति बनने की खबर सामने आई है. इस घटनाक्रम ने सिर्फ मिडिल ईस्ट ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते की पुष्टि करते हुए संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रहा टकराव अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है.
दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए जानकारी दी कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरा हो चुका है. इसके साथ ही उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए फिर से खोलने और ईरानी बंदरगाहों पर लागू अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की घोषणा भी की. यह फैसला वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है.
किसने निभाई मध्यस्थ की भूमिका?
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रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते को अंतिम रूप तक पहुंचाने में पाकिस्तान और कतर की भूमिका महत्वपूर्ण बताई जा रही है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई है. खास बात यह है कि इस सहमति में लेबनान से जुड़ा मुद्दा भी शामिल है, जिस पर पहले काफी मतभेद देखने को मिले थे. जानकारी के मुताबिक, समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर 19 जून को स्विट्जरलैंड में किए जाएंगे. इससे पहले दोनों देशों के अधिकारी तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर कई दौर की बातचीत करेंगे, ताकि समझौते के की रूपरेखा तय की जा सके.
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14 बिंदुओं में क्या-क्या तय हुआ?
समझौते के तहत कई महत्वपूर्ण फैसलों पर सहमति बनी है. इनमें युद्ध को स्थायी रूप से रोकना, अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी हटाना, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को जहाजों के लिए खोलना और ईरान पर लगे कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देना शामिल है. इसके अलावा अमेरिका ने ईरान के पुनर्निर्माण में आर्थिक सहायता देने का भी संकेत दिया है. समझौते के अनुसार, अगले 60 दिनों तक दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत बातचीत जारी रहेगी. साथ ही ईरान ने परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता जताने पर भी सहमति दी है. समझौते में यह भी कहा गया है कि बातचीत के दौरान अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही किसी नई सैन्य कार्रवाई की शुरुआत करेगा. वहीं ईरान की फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से वापस करने का रास्ता भी तैयार किया गया है.
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तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है. वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है. ऐसे में इस मार्ग के खुलने और तनाव कम होने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को राहत दी है. जानकारों का मानना है कि यदि समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो तेल आपूर्ति सामान्य होने लगेगी और ऊर्जा कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर भी देखने को मिल सकता है.
अभी भी बाकी हैं कई बड़े सवाल
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जानकारी देते चलें कि भले ही इस समझौते को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे अब भी पूरी तरह सुलझे नहीं हैं. सबसे बड़ा सवाल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बना हुआ है. अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को समाप्त किया जाएगा और उस पर सख्त निगरानी रखी जाएगी. दूसरी ओर ईरान का दावा है कि उसे कम संवर्धित रूप में यूरेनियम अपने देश में रखने की अनुमति मिलनी चाहिए. यही कारण है कि दोनों देशों के बयानों में अब भी अंतर दिखाई दे रहा है. ईरान के उप-विदेश मंत्री काज़ेम गरीबाबादी ने भी स्पष्ट किया है कि उनका देश पहले अमेरिका की प्रतिबद्धताओं को व्यवहार में देखना चाहता है. उसके बाद ही अंतिम शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा.
क्या ट्रंप होंगे हस्ताक्षर समारोह में शामिल?
19 जून को स्विट्जरलैंड में होने वाले हस्ताक्षर समारोह को लेकर भी उत्सुकता बनी हुई है. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने संकेत दिए हैं कि वह इस कार्यक्रम में शामिल हो सकते हैं. वहीं डोनाल्ड ट्रंप के भी अंतिम समय में समारोह में पहुंचने की संभावना जताई जा रही है. हालांकि सुरक्षा व्यवस्थाओं और अन्य अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के कारण अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है. अमेरिकी सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुसार राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को एक साथ विदेशी कार्यक्रमों में भेजने से आमतौर पर बचा जाता है. ऐसे में संभावना यही है कि दोनों में से कोई एक प्रतिनिधित्व करता दिखाई दे.
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बहरहाल, पूरी दुनिया की नजर 19 जून पर टिकी है. यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो यह न केवल अमेरिका और ईरान के संबंधों में नया अध्याय खोलेगा, बल्कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा कदम साबित हो सकता है.