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खाड़ी जंग में पाकिस्तान को 'पोस्टमैन' बनना पड़ा भारी, चीन ने निकाल दी सारी चौधराहट, कहा-पहले खुद का घर संभालो

पाकिस्तान पश्चिम एशिया विवाद में मध्यस्थता कराने चला था. खूब वाहवाही लूटने चला था, लेकिन चीन ने उसकी हेकड़ी निकाल दी. बीजिंग गए इशाक डार को सख्त वॉर्निंग दी गई कि पहले अपना घर संभालो.

Jinping and Shehbaz Sharif (File Photo)
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एक कहावत है कि दोनों नावों की सवारी नहीं की जाती, ये ज्यादा देर चलती नहीं. पाकिस्तान के साथ कुछ यही हो रहा है. दरअसल पाकिस्तानी आर्मी और सरकार खाड़ी जंग में अमेरिका का पिछलग्गू बनी रही और जैसा आदेश आया, जो लिखकर दिया, वो भी पोस्टमैन की भांति पहुंचा दिया. यानी कि पीसमेकर बनने चला पाकिस्तान भूल गया कि उसकी हैसियत क्या है. इसलिए तो अब उसका ऑलवेदर फ्रेंड चीन भी उससे नाराज चल रहा है. पाकिस्तान-चीन से अपनी दोस्ती को समुंद्र से गहरी, शहद से मीठी करार देता आया है.

खाड़ी जंग में मध्यस्थ बनने चला था पाकिस्तान, भारी पड़ गई

आपको बताएं कि पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के दौरान पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों से चीन के साथ उसके संबंधों में तनाव पैदा हो गया है. दरअसल ख़बर सामने आ रही है कि बीजिंग ने भले ही सार्वजनिक तौर पर चिंता जाहिर नहीं की हो, लेकिन उसकी कूटनीतिक प्रतिक्रिया से पाक-अमेरिका रिश्तों को लेकर असहजता साफ झलक रही है.

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चीन पाकिस्तान की हरकतों से नाराज!

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थिंक टैंक पोलिटेइया अनुसंधान फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार का हालिया बीजिंग दौरा इस मकसद से था कि चीन से मध्यस्थता के लिए समर्थन हासिल किया जाए, लेकिन उन्हें सिर्फ “सतर्क और सिद्धांत आधारित” प्रतिक्रिया दी गई.

पाकिस्तान को मुस्लिम उम्मा का लीडर बनना भारी पड़ गया

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रिपोर्ट में कहा गया है कि यह स्थिति इस बात का संकेत है कि चीन-पाकिस्तान संबंधों में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. खासतौर पर अफगानिस्तान और अमेरिका को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद उभर रहे हैं, जिससे इस “ऑल-वेदर” साझेदारी की दिशा प्रभावित हो रही है. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने पहले इस्लामाबाद में मिस्र, सऊदी अरब और तुर्की जैसे देशों के साथ बैठक कर मध्यस्थता की कोशिश की थी, लेकिन जब कोई ठोस परिणाम नहीं निकला तो उसने चीन का रुख किया. यानी कि इस्लामिक उम्मा बनाने चला पाकिस्तान अपने ही दोस्त चीन को बुलाना, उसकी इजाजत लेना भूल गया और जिनपिंग को नाराज कर बैठा.

ये पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान में मुस्लिम उम्मा का लीडर बनने की चाहत जगी है. इससे पहले जब इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे तब भी पाकिस्तानियों को मदीना की रियासत बनने की इच्छा हुई थी. ऐसे में वो पहले खुद को मुस्लिम देशों का नेता बनाने की चाह में इमरान खान ने और मलेशिया-तुर्की के साथ मिलकर अपना एक ग्लोबल चैनल लॉन्च करेंगे जो अलजजीरा की तर्ज पर होगा. इतना ही नहीं सऊदी अरब की बादशाहत को भी चुनौती दी गई, अमेरिका को भी ललकारा गया. नतीजा क्या हुआ, इमरान खान विदेशी मुदाखलत के आरोपों के बीच सत्ता से बाहर चले गए और आज भी जेल में हैं.

चीन ने पाकिस्तान से कहा कि अपना घर पहले संभालो!

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अब आते हैं, चीन वाली बात पर. इन दिनों पाकिस्तान चीन के साथ दोस्ती के साथ-साथ अमेरिका के इशारों पर नाचने लगा. चीन ने मध्यस्थता की इस पहल का खुलकर समर्थन करने के बजाय पाकिस्तान को पहले अफगानिस्तान के साथ अपने संबंध सुधारने की सलाह दी. रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन का मानना है कि जो देश खुद अपने पड़ोसी के साथ तनाव में हो, वह निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभा सकता. चीन ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि उसका करीब 65 बिलियन डॉलर पाकिस्तान में दांव पर लगा है. TTP, अफगानिस्तान, BLA के साथ लड़ाई और उसके हमलों के बीच CPEC ठप हो गया है. इसका पूरा होना तो लगभग नामुमकिन है बल्कि चीन का पैसा भी निकालना मुश्किल हो गया है. चीनी वर्कर्स और इंजीनियर्स की भी जान मुश्किल में है, उसे तो पाकिस्तान सुरक्षा नहीं दे पा रहा है.

चीन CPEC ठप होने से परेशान!

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में चीन के सुरक्षा हितों की अनदेखी की है, जिससे बीजिंग को अपनी क्षेत्रीय रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा है. चीन की चिंता उसके बड़े निवेश से भी जुड़ी है, खासकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) के तहत. इसके अलावा, चीन अफगानिस्तान में भी अपने आर्थिक और कनेक्टिविटी नेटवर्क का विस्तार करना चाहता है, जो उसके बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का अहम हिस्सा है.

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रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के वर्षों में चीन ने सीपीईसी के लिए फंडिंग में काफी कमी की है. इसके पीछे भ्रष्टाचार, चीनी कर्मियों पर आतंकी हमले और पाकिस्तान में बढ़ती अस्थिरता जैसी चिंताएं प्रमुख कारण हैं. पाकिस्तान बार-बार सीपीईसी का जिक्र कर चीन से आर्थिक समर्थन हासिल करने की कोशिश करता है, लेकिन बीजिंग अब सतर्क रुख अपना रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते हालात में चीन और पाकिस्तान के रिश्तों की दिशा में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है, जो क्षेत्रीय राजनीति और आर्थिक सहयोग पर असर डाल सकता है. यानी कि चौधरी बनने चला पाकिस्तान ना घर का रहा ना घाट का.

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