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चीन की तरह भारत में भी बन रहा ‘आर्टिफिशियल सन’, असली सूरज से 20 गुना ज्यादा टेम्परेचर, इस तकनीक से मिलेगी सफलता!

चीन की तरह भारत भी अपना ‘आर्टिफिशियल सन’ बनाने जा रहा है, जिसके लिए वह न्यूक्लियर फ्यूजन तकनीक का इस्तेमाल करेगा. यह प्रोजेक्ट असीमित बिजली बनाने की क्षमता रखता है.

Image by Meta AI
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Artificial Sun: भारतीय वैज्ञानिक गुजरात के गांधीनगर में स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (IPR) में अपनी स्वदेशी प्रयोगात्मक मशीन SST-1 के जरिए इस प्रोजेक्ट के उपर काम कर रहे हैं. इस प्रोजेक्ट में भविष्य की असीमित और स्वच्छ ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की ताकत है. 

पहले चीन ने ‘आर्टिफिशियल सन’ बनाया था और अब भारत भी अपने इस महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को बनाने में जुटा हुआ है. यहां ‘आर्टिफिशियल सन’ बनाने का मतलब असल सूरज जैसा कुछ बनाने से नहीं है, बल्कि सूरज के जितनी या उससे ज्यादा ऊर्जा पैदा करने से है. चीन ने भी कुछ सेकंड्स के लिए अपने प्रोजेक्ट से तापमान को 11 करोड़ से 16 करोड़ डिग्री तक पहुचाया था.

सूरज से कैसे पैदा होती है ऊर्जा?

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सूरज विश्व में ऊर्जा का एक बहुत बड़ा स्रोत है लेकिन सूरज में भी ऊर्जा का निर्माण न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्शन से होता है. सूरज के केंद्र में तापमान लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस होता है. सूरज एक प्राकृतिक फ्यूजन रिएक्टर है, जिसमें हाइड्रोजन लगातार हीलियम में बदलती है और इस प्रकिया में ऊर्जा निकलती है. फिर यह ऊर्जा लगभग 15 करोड़ किलोमिटर की दूरी तय करके धरती तक आती है. तारें भी ऊर्जा का स्रोत हैं और इनमें भी इसी प्रक्रिया से ऊर्जा का निर्माण होता है. 

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न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्शन की प्रक्रिया

न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्शन में दो हल्के परमाणु न्यूक्लियस अधिक तापमान में एक-दूसरे के साथ जुड़कर एक भारी न्यूक्लियस बनाते हैं और इस प्रक्रिया में ऊर्जा का निर्माण होता है. इस रिएक्शन में अलग-अलग परमाणुओं का प्रयोग हो सकता है, जैसे सूरज में हुए रिएक्शन में हाइड्रोजन का इस्तेमाल होता है जो हीलियम में बदलता है, सूरज में हुए इस रिएक्शन की चेन को मुख्य रूप से ‘प्रोटॉन-प्रोटॉन चेन’ कहा जाता है.

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सूरज में तो यह रिएक्शन प्राकृतिक रूप से होता है पर वैज्ञानिक चुंबकीय टोकामाक मशीन की मदद से इस प्रक्रिया को कर रहे हैं. इस मशीन से अत्यंत गर्म गैस यानी प्लाज्मा को नियंत्रित स्थिति में रखा जाता है. 

चीन का ‘आर्टिफिशियल सन’ प्रोजेक्ट

चीन के इस प्रोजेक्ट का नाम EAST यानी ‘एक्सपेरिमेंटल एडवांस्ड सुपरकंडक्टिंग टोकामक’ है. इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य न्यूक्लियर फ्यूजन से स्वच्छ ऊर्जा पैदा करने की तकनीक का विकास करना है. इसके तहत चीन ने 1066 सेकंड यानी 17 मिनट 46 सेकंड तक 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस के प्लाज्मा को स्थिर हाई-कन्फाइनमेंट अवस्था में रोके रखा. यह उपलब्धि फ्यूजन ऊर्जा के लिए काफी जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है की चीन ने अभी बिजली बनाने वाला व्यवसायिक फ्यूजन रिएक्टर बना लिया है और न ही चीन अभी इससे बिजली बना रहा है, अभी तक यह बस एक सफल एक्सपेरिमेंट है.

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क्यों कहते हैं ‘आर्टिफिशियल सन’?

सूरज में हाइड्रोजन न्यूक्लियस, फ्यूज होकर हीलियम बनाते हैं और ऊर्जा निकलती है. EAST भी फ्यूजन प्रक्रिया के लिए आवश्यक अत्यधिक गर्म प्लाज्मा का प्रयोग करता है. इसलिए इसे ‘आर्टिफिशियल सन’ कहा जाता है. यह वास्तविक सूर्य नहीं है और न ही इसे सूर्य की रोशनी पैदा करने के लिए बनाया गया है, इसका काम सिर्फ ऊर्जा पैदा करना है. हालांकि, सूर्य के अंदर फ्यूजन, गुरुत्वाकर्षण के कारण होता है, जबकि EAST में बहुत गर्म प्लाजमा को शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र से नियंत्रित किया जाता है.

भारत का ‘आर्टिफिशियल सन’ प्रोजेक्ट

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भारत के इस तकनीक का नाम SST-1 (स्टेडी स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामक-1) है. भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने SST-1 रिएक्टर में न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्शन से 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से भी अधिक तापमान का प्लाज्मा बना कर इतिहास रचा था. यह तापमान असली सूरज के सेंटर के तापमान से लगभग 20 गुना ज्यादा है. हालांकि वैज्ञानिकों के लिए यह तापमान पाना ही एक मात्र लक्ष्य नहीं है, उनके लिए बड़ी चुनौती इतने तापमान को बिना मशीन की दीवारों को नुकसान पहुंचाए, लंबे समय तक एक जगह पर स्थिर रखना है.

इसके लिए कर रहे हैं गाइरोट्रॉन सिस्टम का यूज

नया गाइरोट्रॉन सिस्टम जिसकी क्षमता 82.6 गीगाहर्टज (GHz) फ्रीक्वेंसी और 400 किलोवाट है, उसे भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने SST-1 रिएक्टर में इंस्टॉल किया है. गाइरोट्रॉन एक शक्तिशाली माइक्रोवेव/रेडियो-फ्रीक्वेंसी तरंग पैदा करने वाला उपकरण है. यह तरंगें रिएक्टर के अंदर मौजूद प्लाजमा को समान रूप से गर्म करने का काम करता है, साथ ही उसके बर्ताव को नियंत्रित भी करता है. इस उपकरण से वैज्ञानिक ज्यादा समय तक प्लाजमा को नियंत्रित रखने में कामयाब रहेंगें. 

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