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उत्तराखंड का रहस्यमयी ‘पांचवां धाम’, जहां शिव ने पांडवों को दिए थे दर्शन

उत्तराखंड की पावन धरती पर स्थित बूढ़ा केदार धाम आस्था, अध्यात्म और प्राकृतिक सौंदर्य का अनोखा संगम है. टिहरी गढ़वाल की शांत वादियों में बालगंगा और धर्मगंगा नदियों के पवित्र संगम के पास स्थित यह शिवधाम श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है.

Image Credits: @pushkardhami/x
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उत्तराखंड की पावन धरा के कण-कण में शिव का वास है. टिहरी गढ़वाल की शांत वादियों में छुपा 'बूढ़ा केदार धाम' एक ऐसा जागृत शिवालय है, जहां पहुंचते ही आत्मा को सुकून पहुंचता है. यह केवल एक मंदिर नहीं बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक है.

उत्तराखंड का ‘पांचवां धाम’ बूढ़ा केदार

यहां स्थापित विशाल शिवलिंग का आकार और उसकी आभा देश के अन्य शिवालयों से बिल्कुल भिन्न और विस्मयकारी है. मंदिर की भव्यता पर बुधवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने विचार रखे.

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बूढ़ा केदार धाम आस्था और अध्यात्म का अद्भुत केंद्र

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उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का खास वीडियो पोस्ट किया. इसके साथ उन्होंने लिखा, "हर-हर महादेव. जनपद टिहरी गढ़वाल में बालगंगा और धर्मगंगा के पावन संगम के समीप स्थित बूढ़ा केदार धाम आस्था और अध्यात्म का अद्भुत केंद्र है. स्कंदपुराण के केदारखंड में वर्णित यह पवित्र स्थल पंचम धाम के रूप में विशेष मान्यता रखता है. टिहरी गढ़वाल आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें."

यह मंदिर आधुनिकता की चकाचौंध से दूर, वन्यजीव अभयारण्य के समीप घने देवदार और बांज के जंगलों से घिरा हुआ है. इसे उत्तराखंड का 'पांचवां धाम' भी माना जाता है. सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, इस मंदिर के पुजारी केवल नाथ संप्रदाय के योगी ही होते हैं.

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जहां शिव ने पांडवों को दिए थे दर्शन

मंदिर का इतिहास महाभारत के इतिहास से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि महाभारत के युद्ध में पांडवों पर अपने ही सगे-संबंधियों, विशेष रूप से अपने ताऊ के पुत्रों (कौरवों) और गुरु द्रोणाचार्य का वध करने के बाद गोत्र हत्या और स्वजन हत्या का पाप लगा था. भगवान कृष्ण के निर्देश पर पांडव महादेव की खोज में निकले. यहां भगवान शिव ने उन्हें एक वृद्ध (बूढ़े) ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए थे और अंतर्ध्यान होकर शिवलिंग में समाहित हो गए. इसी घटना के कारण इस स्थान का नाम 'बूढ़ा केदार' पड़ा.

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यह धाम बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के पवित्र संगम पर बसा हुआ है. अन्य हिमालयी धामों के विपरीत बूढ़ा केदार धाम के कपाट वर्ष भर श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते हैं. यह टिहरी शहर से लगभग 60 किलोमीटर और ऋषिकेश से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

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