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उत्तर की काशी में बाबा विश्वनाथ का धाम, सीएम धामी ने श्रद्धालुओं से की दर्शन की अपील

भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन, भव्य मंदिर न केवल उत्तरकाशी की सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि चारधाम यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का जीवंत केंद्र भी है.

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01 Jun 2026
( Updated: 01 Jun 2026
11:55 AM )
उत्तर की काशी में बाबा विश्वनाथ का धाम, सीएम धामी ने श्रद्धालुओं से की दर्शन की अपील
Image Credits: Video Grab
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देवभूमि उत्तराखंड में, पवित्र गंगा के पावन तट पर बसा जनपद उत्तरकाशी (श्री काशी विश्वनाथ) आदिकाल से ही ऋषि-मुनियों की तपस्थली और अगाध आस्था का केंद्र रहा है. भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन और भव्य मंदिर न केवल उत्तरकाशी की सांस्कृतिक धरोधर है.

सीएम पुष्कर सिंह धामी ने किया उत्तरकाशी विश्वनाथ मंदिर की भव्यता का बखान

सोमवार को बाबा के मंदिर की भव्यता का बखान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया के जरिए किया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "जनपद उत्तरकाशी में स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव की आराधना का एक अत्यंत पवित्र एवं प्रमुख केंद्र है. यह धाम श्रद्धा, आस्था और सनातन संस्कृति का अनुपम प्रतीक है. यहां श्रद्धालु आत्मिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और दिव्य अनुभूति का अनुभव करते हैं. आप भी उत्तरकाशी आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें."

 भागीरथी नदी के तट पर स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर

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जनपद उत्तरकाशी (उत्तराखंड) में भागीरथी नदी के तट पर स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर देवभूमि के सबसे प्राचीन और पवित्र शिव मंदिरों में से एक है. इसे 'उत्तर की काशी' भी कहा जाता है.

जनपद उत्तरकाशी (उत्तराखंड) में भागीरथी नदी के तट पर स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर को सौम्य काशी भी कहा जाता है, जिसका आध्यात्मिक महत्व उत्तर प्रदेश के वाराणसी के ही समान माना गया है. मान्यता है कि यहां बाबा विश्वनाथ साक्षात निवास करते हैं और अपने दर्शनार्थियों को मोक्ष का वरदान देते हैं.

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भगवान शिव को समर्पित ये प्राचीन मंदिर 

भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन, भव्य मंदिर न केवल उत्तरकाशी की सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि चारधाम यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का जीवंत केंद्र भी है.

मंदिर की स्थापना को लेकर मान्यता है कि इसकी मूल स्थापना ऋषि परशुराम द्वारा की गई थी, लेकिन इसका पुनर्निर्माण वर्ष 1857 में टिहरी रियासत की रानी, महारानी खनेती देवी द्वारा प्राचीन वेदी के ऊपर करवाया गया था.

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मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है, जो आश्चर्यजनक रूप से दक्षिण दिशा की ओर थोड़ा झुका हुआ है. मंदिर के प्रांगण में लगभग 115 फीट ऊंचा एक प्राचीन और विशाल त्रिशूल लगा है, जिस पर ब्राह्मी लिपि में कुछ लेख अंकित हैं. पौराणिक कथाओं में इसे देवासुर संग्राम में देवताओं द्वारा उपयोग किया गया अस्त्र माना जाता है.

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