पति-पत्नी विवाद में लखनऊ पुलिस की बड़ी चूक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाई फटकार; जानिए पूरा मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ पुलिस को फटकार लगाते हुए एक महिला का ब्लॉक मोबाइल नंबर बहाल करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद में बिना पूरी जांच के की गई कार्रवाई गैर-जिम्मेदाराना है और इससे नागरिकों के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए.
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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से जुड़ी हुई बड़ी खबर सामने आ रही है. दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम मामले में सुनवाई करते हुए पुलिस प्रशासन और साइबर सेल के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए हैं. अदालत ने लखनऊ पुलिस को फटकार लगाते हुए एक महिला का ब्लॉक किया गया मोबाइल नंबर तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी नागरिक को सरकारी एजेंसियों की लापरवाही या गैर-जिम्मेदाराना रवैये का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मामला एक महिला द्वारा दायर रिट याचिका से जुड़ा है. सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि महिला और उसके पति के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है. इसी विवाद के चलते पति ने साइबर सेल में पत्नी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. आरोप है कि शिकायत की पूरी सच्चाई और तथ्यों की जांच किए बिना ही पुलिस ने महिला का मोबाइल नंबर ब्लॉक कर दिया.
हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
इस मामले की सुनवाई जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने की. अदालत ने पाया कि शिकायत के पीछे पारिवारिक विवाद का पहलू स्पष्ट रूप से मौजूद था. इसके बावजूद साइबर सेल द्वारा उठाया गया कदम उचित जांच प्रक्रिया के अनुरूप नहीं दिखाई दिया. सुनवाई के दौरान लखनऊ साइबर सेल के प्रभारी अधिकारी द्वारा दाखिल व्यक्तिगत हलफनामे पर भी अदालत ने नाराजगी जताई. कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ने गृह मंत्रालय के उन निर्देशों का हवाला दिया है, जिनके तहत साइबर पोर्टल से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर खातों या सेवाओं को ब्लॉक अथवा फ्रीज किया जा सकता है. हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल बेहद सावधानी और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए. किसी भी व्यवस्था का दुरुपयोग नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है.
नागरिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोर
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि राज्य की एजेंसियों की लापरवाही या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के कारण किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का दमन स्वीकार नहीं किया जा सकता. अदालत का यह रुख नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के प्रति न्यायपालिका की गंभीरता को दर्शाता है.
जियो और साइबर सेल को एक सप्ताह का समय
कोर्ट ने लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की साइबर सेल को निर्देश दिया कि वह संबंधित टेलीकॉम कंपनी, जो प्रथम दृष्टया जियो टेलीकॉम सर्विसेज लिमिटेड प्रतीत होती है, से तुरंत संपर्क करे और महिला का मोबाइल नंबर बहाल कराने के लिए आवश्यक कदम उठाए. साथ ही एक सप्ताह के भीतर अदालत में इस संबंध में की गई कार्रवाई का शपथ पत्र भी दाखिल करने को कहा गया है.
पति को भी जारी हुआ नोटिस
अदालत ने महिला के पति को भी नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने पूछा है कि यदि शिकायत निराधार और तुच्छ पाई जाती है तो उसके खिलाफ हर्जाना क्यों न लगाया जाए. यह मामला एक बार फिर बताता है कि जांच के बिना की गई कार्रवाई किसी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित कर सकती है और न्यायपालिका ऐसे मामलों में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह सतर्क है.
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बहरहाल, इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बिना पूरी जांच के की गई कार्रवाई किसी आम नागरिक के अधिकारों को कितना प्रभावित कर सकती है. अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पुलिस और संबंधित एजेंसियां हाईकोर्ट के आदेश का पालन कितनी गंभीरता से करती हैं और इस मामले में आगे क्या कदम उठाए जाते हैं.