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कितनी ताकतवर होती है MLC की कुर्सी? जानें चुनाव से लेकर अधिकारों तक की पूरी जानकारी

यूपी विधान परिषद की 11 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी ने 6 और सपा ने 5 सीटें जीतीं. नतीजों के बाद एमएलसी के चुनाव, वेतन-भत्तों, सरकारी सुविधाओं और कानून बनाने में उनकी भूमिका को लेकर चर्चा तेज है.

Image Source: IANS
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UP MLC: उत्तर प्रदेश की 11 विधान परिषद सीटों के चुनाव ने एक बार फिर सियासत में एमएलसी (MLC) की भूमिका को चर्चा में ला दिया है. 23 अक्टूबर को हुए मतदान के बाद आए नतीजों में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला देखने को मिला. इस चुनाव के बाद लोगों के मन में सवाल है कि आखिर एमएलसी कौन होते हैं, उनका चुनाव कैसे होता है और उन्हें वेतन से लेकर कौन-कौन सी सरकारी सुविधाएं मिलती हैं.

दरअसल, विधान परिषद के सदस्य राज्य की कानून बनाने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं. हालांकि, उनकी शक्तियां विधायकों से कुछ मामलों में अलग होती हैं. आइए समझते हैं एमएलसी के चुनाव, वेतन, भत्तों और अधिकारों का पूरा गणित.

MLC कौन होते हैं और कैसे चुने जाते हैं?

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एमएलसी का पूरा नाम मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल (विधान परिषद सदस्य) है. विधान परिषद राज्य विधानमंडल का उच्च सदन होता है. उत्तर प्रदेश में विधानसभा के साथ विधान परिषद भी है, जहां सदस्य विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं. एमएलसी का चुनाव सीधे आम जनता के मतदान से नहीं होता, बल्कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से किया जाता है. संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार, विधान परिषद के करीब एक-तिहाई सदस्य विधायकों द्वारा चुने जाते हैं. करीब एक-तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के जरिए चुने जाते हैं. इसके अलावा एक-बारहवां हिस्सा स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और एक-बारहवां हिस्सा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुना जाता है. शेष सदस्यों को राज्यपाल नामित करते हैं. एमएलसी बनने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम उम्र 30 वर्ष होनी चाहिए. उनका कार्यकाल छह साल का होता है. विधान परिषद में हर दो साल में करीब एक-तिहाई सदस्यों का कार्यकाल पूरा होता है, जिसके बाद संबंधित सीटों पर चुनाव कराया जाता है.

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MLC को कितनी मिलती है सैलरी?

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उत्तर प्रदेश में एमएलसी को वेतन के साथ अलग-अलग भत्ते भी दिए जाते हैं. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, मूल मासिक वेतन 35 हजार रुपये है. वेतन और विभिन्न भत्तों को मिलाकर कुल मासिक राशि करीब 2.66 लाख रुपये बताई जाती है. हालांकि, वास्तविक भुगतान संबंधित नियमों और लागू भत्तों पर निर्भर करता है.

वेतन के अलावा मिलती हैं ये सुविधाएं

एमएलसी को अपने विधायी और जनसेवा से जुड़े कामों के लिए कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं. इनमें चिकित्सा, निर्वाचन क्षेत्र, यात्रा, टेलीफोन और अन्य निर्धारित भत्ते शामिल हैं. सदन या समिति की बैठकों में भाग लेने पर नियमानुसार दैनिक भत्ता भी मिलता है. इसके अलावा सदस्यों को यात्रा के लिए निर्धारित रेलवे या हवाई यात्रा कूपन और अन्य अनुमन्य सुविधाएं मिल सकती हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में एमएलसी को क्षेत्रीय विकास कार्यों के लिए सालाना पांच करोड़ रुपये की विकास निधि भी उपलब्ध कराई जाती है. इस राशि का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुसार विकास कार्यों के लिए किया जाता है. ध्यान देने वाली बात यह है कि विकास निधि सदस्य की निजी कमाई नहीं होती. इसका उद्देश्य क्षेत्र में जरूरी सार्वजनिक कार्यों को आगे बढ़ाना होता है.

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कानून बनाने में कितनी होती है MLC की भूमिका?

एमएलसी सदन में विधेयकों पर चर्चा कर सकते हैं, सरकार से सवाल पूछ सकते हैं और जनहित से जुड़े मुद्दे उठा सकते हैं. वे कानूनों में सुधार के लिए सुझाव भी देते हैं. इस तरह विधान परिषद विधायी प्रक्रिया में विचार-विमर्श और समीक्षा का मंच उपलब्ध कराती है. हालांकि, वित्तीय मामलों में विधानसभा की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है. मनी बिल केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है. विधानसभा से पारित होने के बाद इसे विधान परिषद के पास सिफारिशों के लिए भेजा जाता है. परिषद को 14 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशें लौटानी होती हैं. विधानसभा इन सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है. यदि परिषद तय समय में विधेयक वापस नहीं करती, तो वह निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत दोनों सदनों से पारित माना जाता है.

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MLC और MLA में क्या है अंतर?

विधायक विधानसभा क्षेत्र की जनता द्वारा सीधे चुने जाते हैं, जबकि एमएलसी का चुनाव अलग-अलग निर्वाचन मंडलों के जरिए होता है. विधायक सरकार के गठन और उसके बहुमत से जुड़े मामलों में अहम भूमिका निभाते हैं. वहीं, एमएलसी कानूनों की समीक्षा, चर्चा और जनता से जुड़े मुद्दों को सदन में उठाने में योगदान देते हैं.

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बहरहाल, एमएलसी का पद केवल वेतन और सरकारी सुविधाओं तक सीमित नहीं है. इसकी असली जिम्मेदारी कानूनों पर गंभीर चर्चा करना, सरकार को जवाबदेह बनाने में योगदान देना और जनता से जुड़े मुद्दों को विधान परिषद तक पहुंचाना है.

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