ममता को बड़ा झटका! सुवेंदु अधिकारी की मीटिंग में शामिल हुए TMC नेता, दीदी के बेहद करीबी
TMC: विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद TMC के भीतर बेचैनी की खबरें लगातार सामने आ रही थीं, लेकिन अब जो तस्वीरें और घटनाएं सामने आई है, उन्होंने राजनितिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है. जिन नेताओं को कभी भाजपा सरकार के मंच से दूर माना जाता था, वही अब सरकारी बैठकों में दिखाई दे रहे हैं.
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TMC Leader Attend Suvendu Adhikari Meeting: पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प मोड़ पर कड़ी दिखाई दे रही है. विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद वैसे ही All India Trinamool Congress यानी TMC के भीतर बेचैनी की खबरें लगातार सामने आ रही थीं, लेकिन अब जो तस्वीरें और घटनाएं सामने आई है, उन्होंने राजनितिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है. जिन नेताओं को कभी भाजपा सरकार के मंच से दूर माना जाता था, वही अब सरकारी बैठकों में दिखाई दे रहे हैं..यही वजह हैं कि लोग पूछने लगे हैं - क्या बंगाल की राजनीति में अंदर ही अंदर कोई बड़ा बदलाव शुरू हो चूका हैं...?
काकोली घोष दस्तीदार की मौजूदगी ने बढ़ाई चर्चा
सबसे ज्यादा चर्चा टीएमसी की वरिष्ठ सांसद Kakoli Ghosh Dastidar को लेकर हो रही है. हाल ही में उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक पद से इस्तीफा दिया था और सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी. उन्होंने इशारों-इशारों में यह तक कह दिया था कि चार दशक की निष्ठा का उन्हें ऐसा फल मिला है. उनके इस बयान ने पहले ही साफ कर दिया था कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा.
ऐसे समय में जब वे मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari की प्रशासनिक समीक्षा बैठक में पहुंचीं, तो राजनीतिक मायने अपने आप निकलने लगे. लोगों को लगा कि शायद टीएमसी के कुछ बड़े नेता अब दूरी बनाने लगे हैं. हालांकि दस्तीदार ने बहुत सधे हुए अंदाज में सिर्फ इतना कहा - “प्रशासन सबका होता है.” लेकिन राजनीति में कई बार छोटे वाक्य भी बड़े संकेत छोड़ जाते हैं.
सिर्फ बैठक नहीं, बदलते रिश्तों की तस्वीर
कल्याणी में हुई इस बैठक में टीएमसी के कई विधायक भी पहुंचे. किसी ने विकास की बात की, किसी ने पिछड़े इलाकों के लिए मदद मांगी. नेताओं का कहना था कि वे जनता के काम के लिए आए हैं, राजनीति के लिए नहीं। लेकिन राजनीति में समय और मंच बहुत मायने रखते हैं.
जो नेता कल तक भाजपा सरकार की बैठकों से दूरी बनाकर रखते थे, उनका अचानक इस तरह शामिल होना एक नए माहौल की ओर इशारा करता है. यह सिर्फ प्रशासनिक सहयोग नहीं, बल्कि राजनीतिक रिश्तों में नरमी की तस्वीर भी मानी जा रही है.
सिलीगुड़ी में भी दिखा वही दृश्य
दिलचस्प बात यह रही कि ऐसा सिर्फ एक जगह नहीं हुआ. सिलीगुड़ी के उत्तरकन्या सचिवालय में हुई बैठक में भी कई टीएमसी विधायक शामिल हुए। बैठक की अध्यक्षता उत्तर बंगाल विकास मंत्री Nisith Pramanik कर रहे थे. यहां भी विपक्षी विधायकों ने सरकार की पहल की तारीफ की और कहा कि जनता के काम के लिए संवाद जरूरी है.
नेताओं ने साफ कहा कि इसे दल-बदल से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि जब एक साथ इतने नेता सरकारी मंचों पर दिखने लगें, तो सिर्फ “विकास” वाली दलील लोगों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं करती.
शुभेंदु अधिकारी ने भी दिया बड़ा संदेश
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी इस पूरे घटनाक्रम को एक नई राजनीतिक संस्कृति बताया. उन्होंने कहा कि जब उनकी पार्टी विपक्ष में थी, तब उन्हें ऐसी बैठकों में नहीं बुलाया जाता था, लेकिन अब सरकार विपक्षी विधायकों को भी साथ लेकर चलना चाहती है.
उनकी यह बात सिर्फ प्रशासनिक बयान नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है. भाजपा अब खुद को “सबको साथ लेकर चलने वाली सरकार” के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ टीएमसी के भीतर नाराज नेताओं की मौजूदगी भाजपा के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त भी बना सकती है.
टीएमसी के भीतर बढ़ रही है बेचैनी?
इन घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या टीएमसी के अंदर असंतोष बढ़ता जा रहा है? पार्टी के कुछ नेता खुलकर नाराजगी दिखा चुके हैं. कुछ नेता पार्टी नेतृत्व के फैसलों से खुश नहीं बताए जा रहे. ऐसे में अगर विपक्षी दल उनके लिए सम्मान और मंच देने की कोशिश करता है, तो राजनीतिक समीकरण बदलना तय माना जाता है.
हालांकि अभी तक किसी भी नेता ने पार्टी छोड़ने जैसी बात नहीं कही है. सभी नेता यही कह रहे हैं कि वे सिर्फ जनता के काम के लिए बैठकों में शामिल हुए. लेकिन बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि बड़े बदलाव अक्सर ऐसे ही छोटे-छोटे संकेतों से शुरू होते हैं.
आने वाले दिनों में और बढ़ सकती है हलचल
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फिलहाल बंगाल की राजनीति में जो माहौल बन रहा है, वह आने वाले समय में और दिलचस्प हो सकता है. अगर टीएमसी के भीतर नाराजगी बढ़ती है और भाजपा ऐसे नेताओं को लगातार मंच देती रहती है, तो इसका असर सिर्फ पार्टी संगठन पर नहीं बल्कि पूरे राज्य की राजनीति पर पड़ सकता है..