Advertisement
असम में तीसरी जीत के लिए BJP का बड़ा दांव, PM मोदी का ग्राउंड कनेक्ट; 40 सीटें पलट सकती हैं गेम
असम में चुनाव प्रचार तेज. नरेंद्र मोदी चाय बागानों तक पहुंचे. बीजेपी को ऊपरी असम की 40 सीटों पर भरोसा, ‘पहचान की राजनीति’ और घुसपैठ मुद्दा केंद्र में.
Advertisement
असम में विधानसभा चुनाव का माहौल अब पूरी तरह गर्म हो चुका है. राजनीतिक दलों ने अपनी ताकत झोंक दी है और जमीनी स्तर पर पहुंच बनाने की कोशिश तेज हो गई है. इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चाय बागानों तक जाना इस बात का संकेत है कि चुनाव सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि सीधे संवाद से जीता जाएगा.
बीजेपी इस बार चुनाव को बेहद रणनीतिक तरीके से लड़ रही है. पार्टी का फोकस खासतौर पर ऊपरी असम की 40 सीटों पर है, जहां उसे जीत की सबसे ज्यादा उम्मीद नजर आ रही है. इन इलाकों में स्थानीय असमिया आबादी का दबदबा है और यही वजह है कि ‘पहचान की राजनीति’ यहां बड़ा मुद्दा बनती दिख रही है.
चाय बागानों से लेकर गांव तक सीधा संवाद
प्रधानमंत्री का चाय बागानों में जाकर मजदूरों से बातचीत करना सिर्फ एक प्रतीकात्मक कदम नहीं है. यह उस बड़े चुनावी संदेश का हिस्सा है, जिसमें बीजेपी हर वर्ग तक अपनी पहुंच दिखाना चाहती है. मजदूर, किसान, युवा और महिलाएं हर समूह को टारगेट किया जा रहा है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश में है. सरमा की छवि एक मजबूत प्रशासक की रही है और बीजेपी उसी भरोसे को वोट में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है.
Advertisement
ऊपरी असम क्यों है इतना अहम?
Advertisement
ऊपरी असम के जिलों शिवसागर, जोरहाट, डिब्रूगढ़, धेमाजी, गोलाघाट, लखीमपुर, तिनसुकिया और बिस्वनाथ—को चुनावी नजरिए से बेहद अहम माना जा रहा है. इन इलाकों में स्थानीय पहचान और जमीन से जुड़े मुद्दे लंबे समय से राजनीति के केंद्र में रहे हैं. बीजेपी का मानना है कि यहां ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ का मुद्दा अब भी प्रभावी है. खासकर बांग्लादेशी घुसपैठ और अवैध कब्जों को लेकर पार्टी लगातार सख्त रुख दिखाती रही है. सरकार का दावा है कि उसने बड़े पैमाने पर जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त कराया है और हजारों लोगों को चिन्हित कर कार्रवाई की है.
2021 के आंकड़ों से बढ़ा आत्मविश्वास
Advertisement
बीजेपी को 2021 के चुनाव नतीजों से भी काफी उम्मीदें हैं. उस चुनाव में ऊपरी असम की 40 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ 5 सीटें ही मिल पाई थीं. यही आंकड़ा बीजेपी के लिए इस बार भी भरोसे का आधार बना हुआ है. पार्टी को लगता है कि अगर पहचान का मुद्दा फिर से जोर पकड़ता है, तो उसे सीधा फायदा मिलेगा. यही वजह है कि इस बार भी यह मुद्दा चुनावी नैरेटिव में प्रमुखता से शामिल किया गया है.
एंटी-इनकम्बेंसी की काट
बीजेपी ने सिर्फ मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि संगठन और उम्मीदवारों पर भी बड़ा दांव खेला है. कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया गया है. खासतौर पर ऊपरी असम में 19 विधायकों को रिपीट नहीं किया गया. इस फैसले का मकसद साफ है, एंटी-इनकम्बेंसी को कम करना और नए चेहरों के जरिए ताजगी लाना. पार्टी मानती है कि यह कदम चुनाव में सकारात्मक असर डाल सकता है.
Advertisement
विपक्ष का गठबंधन भी मजबूत
दूसरी ओर, कांग्रेस ने भी इस बार कोई कसर नहीं छोड़ी है. पार्टी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में वाम दलों और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन किया है. इसमें CPI(M), CPI और असम जातीय परिषद जैसे दल शामिल हैं. कांग्रेस को उम्मीद है कि यह गठबंधन उसे हर वर्ग तक पहुंच बनाने में मदद करेगा और बीजेपी को कड़ी टक्कर देगा.
घोषणापत्र से साफ संकेत
Advertisement
बीजेपी ने अपने घोषणापत्र के जरिए भी अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं. पार्टी ने ‘असमिया पहचान’ को केंद्र में रखते हुए कई बड़े वादे किए हैं. साथ ही यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों को उठाकर अपने एजेंडे को और स्पष्ट किया है. असम चुनाव इस बार सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि विचारधाराओं की भी टक्कर है. एक तरफ बीजेपी ‘पहचान और सुरक्षा’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस गठबंधन के जरिए सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है.
यह भी पढ़ें
अब देखना दिलचस्प होगा कि ऊपरी असम का गणित किसके पक्ष में जाता है. क्या बीजेपी अपनी रणनीति से तीसरी बार सत्ता में वापसी करेगी या फिर विपक्ष का गठबंधन नया समीकरण बना देगा. आने वाले दिनों में यह तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी.