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कट्टरपंथियों के फतवे झेले... मुस्लिम महिलाओं की आवाज बनने वालीं बानू मुश्ताक ने बुकर प्राइज किया सेना को समर्पित!

कन्नड़ भाषा की लेखिका, वकील और सोशल एक्टिविस्ट बानू मुश्ताक ने बुकर प्राइज 2025 जीतकर इतिहास रच दिया है. उन्होंने इस सम्मान को सेना के जवानों और देश को समर्पित किया है. उनके संघर्ष की कहानी अपने आप में काफी प्रेरणादायी हैं.

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कर्नाटक की लेखिका, वकील और एक्टिविस्ट बानू मुश्ताक (Banu Mushtaq) को इस साल का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार (International Booker Prize 2025) दिया गया है. मूल रूप से कन्नड़ भाषा में लिखी उनकी किताब के अंग्रेजी अनुवाद ‘हार्ट लैंप’ को ये सम्मान दिया गया है. उनकी इस किताब को दीपा भास्थी ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है. 

जितनी चर्चा उनकी किताबों, कहानियों और सामाजिक मुद्दों पर उनकी राय की होती रही है, उतनी ही चर्चा उनके द्वारा बुकर प्राइज जीतने के बाद दिए गए बयान की हो रही है. उन्होंने ये प्राइज जीतने के बाद जो किया उसकी गूंज हमेशा रहेगी. उन्होंने कहा, ‘इस पुरस्कार को मैं अपने मुल्क के हर शख्स को, मेरे मुल्क की हिफाजत कर रहे जवानों को, कलाकारों को और मेरे मुल्क को डेडिकेट करना चाहती हूं.’

बानू मुश्ताक की कहानी, संघर्ष और उनकी रूढ़ीवाद से लड़ाई के बारे में जानना जरूरी हो जाता है. 
बानू मुश्ताक, 8 साल की वही बच्ची जिसे कॉन्वेंट स्कूल ने दाखिला देने से इनकार कर दिया क्योंकि उस बच्ची को कन्नड़ नहीं आती थी. उसे आती थी तो केवल उर्दू और टूटी फूटी हिंदी. मुश्ताक वो बच्ची, जिसने जबसे होश संभाला, क़ुरान और उर्दू की ही किताबें ही पढ़ीं लेकिन किताब कन्नड़ में लिख इतिहास रच दिया. इसे ही कुदरत का कमाल कहते हैं. कॉन्वेंट स्कूल प्रशासन की चिंता थी कि बच्ची कन्नड़ नहीं सीख पाएगी. उसके लिए उर्दू स्कूल ही बेहतर होगा. बच्ची के पिता ने प्रिंसिपल के सामने हाथ पैर पकड़े, बेटी के दाख़िले की गुहार लगाई. इसके बाद कॉन्वेंट स्कूल प्रशासन का लहजा थोड़ा नरम हुआ वो बच्ची को एडमिशन देने के लिए तैयार हो गए लेकिन एक शर्त रख दी. शर्त ये थी कि बच्ची को 6 महीने में कन्नड़ सीखनी होगी. अगर वो ऐसा करने में नाकाम हो गई तो उसे स्कूल से बाहर कर दिया जाएगा.

बच्ची और उसके पिता ने स्कूल की ये शर्त मान ली. इसके बाद जो हुआ उसने स्कूल प्रशासन को भी हैरान कर दिया. बच्ची ने महीनों में नहीं बल्कि कुछ ही दिनों में कन्नड़ सीख ली. वो बच्ची जिसे कन्नड़ नहीं आने के कारण स्कूल ने दाखिले से इनकार कर दिया था उसने उसी कन्नड़ भाषा को गौरवान्वित कर दिया और अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार दिया तो उनकी उसी कन्नड़ भाषा के अंग्रेजी अनुवाद को दिया गया, बानू ऐसा करने वाली पहली कन्नड़ लेखिका बन गई हैं.

'चंद दिनों में कन्नड़ सीखने से लेकर बुकर जीतने तक, एक चक्र पूरा होता है'
बुकर प्राइज देते वक्त जब उनके संघर्ष के बारे में फेलिसिटेशन पढ़ा जा रहा था तो माहौल शांत था. 77 साल की बानू मुश्ताक जब अपने लिए कहे ये शब्द सुनती हैं तो अपनी साथी दीपा भाष्थी को गले लगाकर झूम उठती हैं. दोनों के लिए ही ये दिन ऐतिहासिक था. इन दोनों के साथ-साथ उन तमाम महिलाओं के लिए भी ये दिन ख़ास बन गया था जिनके किरदार उनकी कहानियों में हकीकत को बयां करते थे. कर्नाटक की रहने वाली बानू मुश्ताक को उनकी शॉर्ट स्टोरी बुक ‘हार्ट लैंप’ के लिए बुकर प्राइज मिला है. इसके इंग्लिश संस्करण को इस सम्मान से नवाज़ा गया. कन्नड़ भाषा में लिखी गई हार्ट लैंप का अंग्रेज़ी अनुवाद दीपा भाष्थी ने किया है. दोनों ने अपने इस सफ़र को शानदार और सामुहिक बताया. बानू मुश्ताक़ ने कहा, ऐसा लग रहा है जैसे हजारों जुगनू एक ही आसमान को रोशन कर रहे हों. संक्षिप्त, शानदार और पूरी तरह से सामूहिक.

‘दक्षिण भारत में मुस्लिम महिलाओं की मुश्किलों का आइना है हार्ट लैंप किताब’
बानू मुश्ताक की लिखी कहानियों में महिलाओं के संघर्ष ख़ासकर मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष, उनकी मुश्किलें और उनकी शक्ति का मार्मिक पहलू है. हार्ट लैंप की 12 कहानियों में भी बानू ने दक्षिण भारत में मुस्लिम महिलाओं की मुश्किलों को बताया है. जो बानू मुश्ताक़ की ज़िंदगी से भी जुड़े हैं. इस किताब में उन महिलाओं का ज़िक्र है जिनकी ज़िंदगियां पितृसत्तात्मक सोच के कारण हाशिए पर रही हैं. किताब के बारे में बताते हुए बानू मुश्ताक़ कहती हैं कि इसके लिए उन्होंने रिसर्च या पढ़ाई नहीं की. मैंने दिल के अनुभवों को अहमियत दी. जो बातें मेरे दिल को छू गई हैं उनका ज़िक्र किताब में है. हार्ट लैंप की 12 कहानियां साल 1990 से 2023 के बीच में प्रकाशित हुई थीं.

बानू मुश्ताक़ दूसरी भारतीय महिला हैं जिन्हें उनकी किताब के लिए बुकर प्राइज मिला है. इससे पहले गीतांजलि श्री को हिंदी उपन्यास रेत समाधि के लिए ये पुरस्कार मिला था. बानू मुश्ताक़ बुकर प्राइज जीतने वाली दूसरी भारतीय लेखिका और पहली कन्नड़ लेखिका बन गईं हैं. 

कौन हैं बानू मुश्ताक? 
बानू मुश्ताक लेखिका होने के साथ साथ सामाजिक कार्यकर्ता और वकील भी हैं. कर्नाटक के हासन की रहने वालीं बानू ने बचपन से ही लिखने की शुरूआत कर दी थी. 26 साल की उम्र में उनकी पहली कहानी कन्नड़ पत्रिका प्रजामाता में पब्लिश हुई. बानू मुश्ताक को कर्नाटक साहित्य अकादमी और दाना चिंतामणि अत्तिमाबे पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान से नवाज़ा जा चुका है. उन्होंने कन्नड़ में कई कहानियां और उपन्यास लिखे हैं.

इस मुक़ाम तक पहुंचने के लिए बानू ने मुश्किल हालातों से विद्रोह किया है. कन्नड़ में महारत हासिल करने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की. बीच में कई ऐसे वाकए हुए जिन्होंने उन्हें तोड़कर रख दिया. उन्होंने लव मैरिज की लेकिन शादी के बाद उनकी ज़िंदगी में दर्दनाक मोड़ आया. जब उन्हें बुर्के में रहने और पूरी ज़िंदगी घर के कामकाज में ही लगाने की हिदायत दी गई. लिखना छूट गया और वह घर में ही बंधकर रह गई. एक पल तो ऐसा भी आया जब बानू खुद को आग के हवाले करने जा रही थीं. हालाँकि उनके पति ने उन्हें सँभाला और अपनी ज़िंदगी अपने तरीक़े से जीने के लिए बानू को आज़ाद कर दिया. 

उनकी कहानियां पितृसत्तात्मक सोच के ख़िलाफ मुखर आवाज़ बनीं. तीखे शब्दों ने उन्हें कट्टरपंथियों के निशाने पर ला दिया था. एक इंटरव्यू में बानू मुश्ताक़ ने बताया था कि साल 2000 में उन्हें धमकी भरे कॉल आए क्योंकि उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर लेख लिखा था. मस्जिदों में नमाज़ पढ़ने के महिलाओं के अधिकार का समर्थन किया था. इसी बात पर उनके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी हो गया. इतना ही नहीं एक शख़्स ने तो उन पर चाकू से भी हमला करने की कोशिश की थी. लेकिन इन घटनाओं से बानू डरी नहीं बल्कि सामना किया वैसे ही जैसे समाज को शिक्षित करने के लिए सावित्रीबाई फुले का विरोध किया जाता था. बानू निडरता से विद्रोहियों का सामना ना करतीं तो वो आज इतिहास ना रचतीं.
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