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सुप्रीम कोर्ट बड़ा संदेश, हिंदू समाज को बंटने के बजाय एकजुट होने पर देना चाहिए ध्यान; जानें पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा को जरूरी या गैर-जरूरी बताने के लिए एक समान नियम बनाना मुश्किल है, क्योंकि हर धर्म की अपनी परंपराएं होती हैं. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए.

Image Source: IANS
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देश की सर्वोच्च अदालत ने धार्मिक प्रथाओं को लेकर एक अहम टिप्पणी की है, जिसने कानूनी और सामाजिक बहस को नई दिशा दे दी है. सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने साफ कहा है कि किसी भी धार्मिक संप्रदाय की प्रथा को जरूरी या गैर-जरूरी घोषित करने के लिए कोई एक समान नियम बनाना आसान नहीं है. अदालत के मुताबिक, हर धर्म और संप्रदाय की अपनी अलग पहचान और परंपराएं होती हैं, इसलिए एक ही पैमाने से सबको नहीं परखा जा सकता.

प्रथाओं पर सीमाएं भी जरूरी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी धार्मिक प्रथाओं को 'जरूरी' नहीं माना जा सकता. अगर कोई परंपरा नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था या स्वास्थ्य के खिलाफ जाती है, तो उसे संरक्षण नहीं दिया जा सकता. कोर्ट का यह रुख बताता है कि धार्मिक स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है. कोर्ट का मानना है कि आज हिंदू समाज को संप्रदायों में बंटने के बजाय एकजुट होने पर ध्यान देना चाहिए. नहीं तो वह आने वाले दिनों में कमजोर ही होगा. 

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भेदभाव पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी

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यह टिप्पणी उस समय आई जब पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़े मामलों पर सुनवाई कर रही थी. बहस के दौरान जजों ने कहा कि संविधान सभी को समान अधिकार देता है और किसी भी तरह का भेदभाव लंबे समय तक टिक नहीं सकता. हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि धार्मिक प्रथाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी सही नहीं होगा.

एकजुटता पर अदालत का खास जोर

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सुनवाई के दौरान जस्टिस वीबी नागरत्ना ने हिंदू समाज को लेकर भी अहम बात कही. उन्होंने कहा कि अलग-अलग संप्रदायों में बंटने के बजाय समाज को एकजुट रहना चाहिए. अगर मंदिरों के दरवाजे एक-दूसरे के लिए बंद होंगे, तो इससे समाज कमजोर होगा. उनका मानना है कि आपसी दूरी बढ़ाने के बजाय सहयोग और समावेश की भावना जरूरी है.

धर्म की आजादी और राज्य की जिम्मेदारी

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने भी अदालत के सामने अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियां अहम हैं, लेकिन धर्म और विवेक की स्वतंत्रता भी उतनी ही जरूरी है. उनके अनुसार, किसी भी सुधार को लागू करते समय उसके उद्देश्य और जरूरत के बीच स्पष्ट संबंध होना चाहिए.

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बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी दिखाती है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल काम है. अदालत ने संकेत दिया है कि हर मामले को उसकी परिस्थितियों के अनुसार ही परखा जाएगा. आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और बहस तेज होने की संभावना है, क्योंकि यह सीधे तौर पर समाज और संविधान दोनों से जुड़ा हुआ है.

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