'मैं भी बंगाल की बेटी हूं, मुझे यहां आने से रोका...', ममता सरकार के बर्ताव से खफा हुईं राष्ट्रपति मुर्मू
नॉर्थ बंगाल में इंटरनेशनल आदिवासी कॉन्क्लेव के लिए परमिशन नहीं दी गई. जिस पर प्रेसिडेंट द्रौपदी मुर्मू ने नाराज थीं. रही सही कसर CM ममता के अधिकारियों ने प्रोटोकॉल का उल्लंघन करके पूरी कर दी.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल का दौरा किया. वह दार्जिलिंग में 9वें अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस में शामिल हुईं. इस दौरान महामहिम पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार से बेहद खफा दिखीं. उन्होंने CM पर आदिवासियों के अपमान का आरोप भी लगाया.
नॉर्थ बंगाल में इंटरनेशनल आदिवासी कॉन्क्लेव के लिए परमिशन नहीं दी गई. जिस पर प्रेसिडेंट द्रौपदी मुर्मू ने नाराजगी जाहिर की. उन्होंने कहा, ‘संथालों को वेन्यू तक पहुंचने से रोक दिया गया था.’ द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल प्रशासन पर प्रोटोकॉल फॉलो न करने का आरोप भी लगाया. दावा है कि राष्ट्रपति को अगवानी के लिए राज्य सरकार का कोई प्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद नहीं था. इसके बाद उनकी नाराजगी और बढ़ गई.
ममता सरकार पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने क्या कहा?
दरअसल राष्ट्रपति को मूल रूप से सिलीगुड़ी के बिधाननगर उपमंडल में कार्यक्रम को संबोधित करना था, लेकिन पुलिस ने अनुमति नहीं दी. इसलिए कार्यक्रम स्थल को बागडोगरा के गोशाईपुर में स्थानांतरित कर दिया गया. अपना कार्यक्रम पूरा करने के बाद वह मूल स्थल पर गईं और वहां अपनी बात रखी. महामहिम मुर्मू ने कहा, ‘पता नहीं प्रशासन के मन में क्या था, हम तो आसानी से यहां आ गए. वहां हालात बहुत ज्यादा कंजस्टेड हैं, लेकिन यहां तो मुझे लगता है कि 5 लाख लोग आसानी से इकट्ठे हो सकते हैं. पता नहीं हमें वहां किसलिए ले गए.’
राष्ट्रपति ने आगे कहा, वे अपने भाई-बहनों के पास जाकर उनके हालात देखना चाहती थीं, लेकिन प्रशासन ने अड़ंगा डाला. दरअसल, ममता सरकार पर आरोप है कि उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन को उत्तर बंगाल में आयोजित करने की इजाजत नहीं दी, ये पता होते हुए भी कि राष्ट्रपति इसमें चीफ गेस्ट थीं.
‘ममता बनर्जी को मेरे साथ होना चाहिए था’
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भावुक होकर कहा, उन्हें (ममता बनर्जी) मेरे कार्यक्रम में साथ होना चाहिए था. मैं बंगाल की बेटी हूं, फिर भी मुझे यहां आने की अनुमति नहीं है. ममता मेरी छोटी बहन जैसी हैं, पता नहीं, शायद वह मुझसे नाराज हैं. इसीलिए मुझे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए वहां (गोशाईपुर) जाना पड़ा. कोई बात नहीं, मुझे इस बात का कोई गुस्सा या नाराजगी नहीं है.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पहले से नाराज थीं रही सही कसर ममता सरकार के अधिकारियों ने पूरी कर दी. सरकार का कोई नुमांईंदा उन्हें रिसीव करने नहीं पहुंचा. जिसे प्रोटोकॉल का बड़ा उल्लंघन माना जा रहा है. इस घटनाक्रम के बाद बंगाल की राजनीतिक पारा गर्मा गया और सरकार पर कई सवाल खड़े हो गए.
BJP ने साधा निशाना
राष्ट्रपति मुर्मू की नाराजगी के बाद BJP ने ममता सरकार को आड़े हाथों लिया. BJP आईटी सेल के हेड अमित मालवीय ने X पर पोस्ट करते हुए कहा, आज पश्चिम बंगाल में घटी घटनाओं से ममता बनर्जी सरकार के नेतृत्व में संवैधानिक ढांचे के पूर्ण पतन का संकेत मिलता है. एक दुर्लभ और अभूतपूर्व घटनाक्रम में, भारत की माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने सिलीगुड़ी यात्रा के दौरान तैयारियों और प्रोटोकॉल के अभाव पर खुले तौर पर नाराजगी व्यक्त की. इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय संथाली सम्मेलन के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया, जहां स्वयं राष्ट्रपति मुख्य अतिथि थीं.’
संथाल कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा, यह संथाल समुदाय के लिए गर्व की बात है कि हमारे पूर्वज तिलका मांझी ने करीब 240 साल पहले शोषण के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया था. उनके बगावत के करीब 60 साल बाद, बहादुर सिदो-कान्हू और चांद-भैरव ने बहादुर फूलो-झानो के साथ मिलकर 1855 में संथाल हुल का नेतृत्व किया था.
अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में राष्ट्रपति ने क्या कहा?
राष्ट्रपति ने कहा कि साल 2003 को संथाल समुदाय के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा. उस साल, संथाल भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था. उन्होंने कहा, आदिवासी समुदायों ने सदियों से अपने लोक संगीत, नृत्य और परंपराओं को बचाकर रखा है. उन्होंने प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रकृति संरक्षण का सबक आने वाली पीढ़ियों को दिया जाना चाहिए. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि लोक परंपराओं और पर्यावरण को बचाने के साथ-साथ, हमारे आदिवासी समुदायों को आधुनिक विकास को अपनाना चाहिए और तरक्की की यात्रा पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने भरोसा जताया कि संथाल समुदाय समेत आदिवासी समुदायों के लोग तरक्की और प्रकृति के बीच तालमेल की मिसाल कायम करेंगे.
राष्ट्रपति ने कहा कि आज के समय में शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तीकरण पर ध्यान देना ज़रूरी है. आदिवासी युवाओं को शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट के जरिए आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन इन सभी कोशिशों में उन्हें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए. उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने, शिक्षा को प्राथमिकता देने और समाज में एकता और भाईचारा बनाए रखने का संकल्प लेना चाहिए. इससे हमें एक सशक्त समाज और एक मजबूत भारत बनाने में मदद मिलेगी.
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