Advertisement
‘ममता ने भगाया, सुवेंदु लाएंगे’, सिंगुर की गलती सुधारेगी BJP, अब TATA की होगी वापसी
BJP: पश्चिम बंगाल BJP के नए प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने हाल ही में दावा किया है कि टाटा समूह एक बार फिर पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर निवेश कर सकता है. भाजपा राज्य में उद्योगों के आकर्षित करने और आर्थिक गतिविधियों को तेज करने के लिए 100 दिन की विशेष औद्योगिक योजना चला रही है.
Advertisement
Suvendu Adhikari: पश्चिम बंगाल BJP के नए प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने हाल ही में दावा किया है कि टाटा समूह एक बार फिर पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर निवेश कर सकता है. उन्होंने सिंगुर से टाटा के जाने की घटना को राज्य के इतिहास का एक दुखद अध्याय बताते हुए कहा कि इससे पूरे देश में बंगाल के आद्योगिक माहौल को लेकर गलत संदेश गया था. उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब भाजपा राज्य में उद्योगों के आकर्षित करने और आर्थिक गतिविधियों को तेज करने के लिए 100 दिन की विशेष औद्योगिक योजना चला रही है.
जब सिंगुर बना देश की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों में से एक
आज से करीब दो दशक पहले पश्चिम बंगाल का छोटा-सा कस्बा सिंगुर राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया था. उस समय राज्य में वाम मोर्चा सरकार थी और मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल में औद्योगीकरण को बढ़ावा देना चाहते थे. इसी सोच के तहत Tata Motors ने अपनी महत्वाकांक्षी और दुनिया की सबसे सस्ती कार मानी जाने वाली Tata Nano के उत्पादन के लिए सिंगुर में फैक्ट्री लगाने का फैसला किया. सरकार ने इस परियोजना के लिए बड़ी मात्रा में कृषि भूमि का अधिग्रहण किया. लेकिन यहीं से विवाद शुरू हो गया.
Advertisement
कई किसानों और स्थानीय लोगों का आरोप था कि उनकी उपजाऊ बहु-फसली जमीन उनकी इच्छा के विरुद्ध ली जा रही है. विरोध धीरे-धीरे बड़ा आंदोलन बन गया और इसकी अगुवाई उस समय विपक्ष में मौजूद ममता बनर्जी ने की. धरने, प्रदर्शन, राजनीतिक रैलियां और लगातार टकराव ने पूरे इलाके का माहौल तनावपूर्ण बना दिया.
Advertisement
NEET RE-Exam की सख्त तैयारियां, Indian Air Force के जहाजों से सेंटर तक पहुंचेंगे Question Paper!
टाटा ने क्यों छोड़ा बंगाल?
Advertisement
लगातार विरोध और अस्थिर माहौल के कारण आखिरकार अक्टूबर 2008 में टाटा मोटर्स ने सिंगुर परियोजना बंद करने की घोषणा कर दी. कंपनी का कहना था कि जिस माहौल में कर्मचारी और इंजीनियर सुरक्षित महसूस न करें, वहां उद्योग चलाना संभव नहीं है.
उस समय टाटा समूह के तत्कालीन प्रमुख रतन टाटा ने बेहद भावुक अंदाज में कहा था कि वे सिंगुर छोड़ रहे हैं, लेकिन यह फैसला उनकी इच्छा नहीं बल्कि परिस्थितियों की मजबूरी है.
फैक्ट्री लगभग तैयार हो चुकी थी और कंपनी ने सैकड़ों करोड़ रुपये का निवेश भी कर दिया था. ऐसे में परियोजना का बंद होना सिर्फ एक कारोबारी फैसला नहीं था, बल्कि यह पूरे देश में निवेश और उद्योगों के माहौल पर बड़ी बहस का विषय बन गया.
गुजरात ने खोले दरवाजे, साणंद बना नया केंद्र
Advertisement
सिंगुर छोड़ने के बाद टाटा मोटर्स को जल्द ही नया ठिकाना मिला. साणंद में तत्कालीन गुजरात सरकार ने कंपनी को जमीन और जरूरी प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराई. इसके बाद रिकॉर्ड समय में नया प्लांट तैयार हुआ और 2010 में वहां से पहली नैनो कार का उत्पादन शुरू हो गया.
हालांकि नैनो कार को लेकर शुरुआती उत्साह बाद में बिक्री में नहीं बदल सका. धीरे-धीरे इसकी मांग कम होती गई और आखिरकार 2018 में कंपनी ने नैनो का उत्पादन बंद कर दिया. लेकिन साणंद का प्लांट बंद नहीं हुआ. बाद में यही संयंत्र टाटा की लोकप्रिय कारों जैसे Tata Tiago और Tata Tigor के निर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया.
बंगाल की छवि को कितना नुकसान हुआ?
सिंगुर से टाटा के जाने को केवल एक फैक्ट्री के बंद होने के रूप में नहीं देखा गया. उद्योग जगत के कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना ने निवेशकों के बीच पश्चिम बंगाल की छवि को प्रभावित किया. बड़े उद्योगों ने यह संदेश लिया कि राज्य में भूमि अधिग्रहण और औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर राजनीतिक जोखिम काफी अधिक हो सकता है.
Advertisement
यही वजह है कि वर्षों तक जब भी पश्चिम बंगाल में नए निवेश की चर्चा होती थी, सिंगुर का उदाहरण अक्सर सामने आ जाता था. उद्योग जगत में यह मामला एक प्रतीक बन गया कि कैसे एक बड़ी परियोजना राजनीतिक संघर्ष की भेंट चढ़ सकती है.
766 करोड़ रुपये का मुआवजा
सिंगुर विवाद कानूनी लड़ाई में भी बदल गया था. लंबे समय तक चले विवाद के बाद 2023 में एक आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने टाटा मोटर्स के पक्ष में फैसला सुनाया. ट्रिब्यूनल ने पश्चिम बंगाल सरकार को परियोजना के नुकसान और खर्चों के मद्देनजर कंपनी को 766 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया.
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि इसने वर्षों पुराने विवाद पर कानूनी रूप से एक बड़ा निष्कर्ष प्रस्तुत किया.
Advertisement
ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर का टर्निंग पॉइंट
सिंगुर आंदोलन ने केवल औद्योगिक नीति को प्रभावित नहीं किया, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा भी बदल दी. इसी आंदोलन ने ममता बनर्जी को राज्य की सबसे मजबूत विपक्षी नेता के रूप में स्थापित किया.
सिंगुर और बाद में नंदीग्राम के आंदोलनों ने वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ जनमत तैयार किया. इसका परिणाम 2011 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला, जब 34 वर्षों से सत्ता में मौजूद वाम मोर्चा सरकार को हार का सामना करना पड़ा और ममता बनर्जी पहली बार मुख्यमंत्री बनीं.
इसके बाद 2016 में Supreme Court of India ने भूमि अधिग्रहण को अवैध ठहराते हुए जमीन किसानों को लौटाने का आदेश दिया. यह फैसला आंदोलन से जुड़े किसानों और स्थानीय लोगों के लिए बड़ी जीत माना गया.
अब भाजपा क्या संदेश देना चाहती है?
Advertisement
आज भाजपा सिंगुर को एक नए नजरिए से पेश करने की कोशिश कर रही है. पार्टी का कहना है कि जिस स्थान को कभी उद्योगों के पलायन के प्रतीक के रूप में देखा गया था, वही भविष्य में उद्योगों की वापसी का प्रतीक बन सकता है.
यह भी पढ़ें
शमिक भट्टाचार्य ने व्यापार-अनुकूल नीतियों, एमएसएमई क्षेत्र को मजबूत करने, आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण और डेटा सेंटर जैसे नए क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की बात कही है. भाजपा का दावा है कि यदि राज्य में निवेशकों का भरोसा फिर से मजबूत किया जाए तो पश्चिम बंगाल एक बार फिर पूर्वी भारत का प्रमुख औद्योगिक केंद्र बन सकता है.