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केरल का चमत्कारी तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर, जहां 365 दिन होते हैं दर्शन और कभी नहीं रुकती भगवान की सेवा

केरल की पवित्र भूमि पर स्थित तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर आस्था, रहस्य और परंपराओं का अद्भुत संगम है. यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के उन विशेष स्वरूपों में से एक को समर्पित है, जहां उनकी सेवा और पूजा से जुड़ी मान्यताएं इसे देश के अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं.

Image Credits: IANS
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देशभर में कई प्राचीन मंदिर हैं, जहां भगवान श्री कृष्ण अलग-अलग अवतारों में भक्तों के कष्टों को हरते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि केरल की धरती पर ऐसा मंदिर मौजूद है, जो साल के 365 दिन दर्शन के लिए खुला रहता है और ग्रहण लगने पर भी मंदिर में पूजा-पाठ बंद नहीं होता. हम बात कर रहे हैं केरल के तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर की. 

भगवान श्रीकृष्ण को दिन में 10 बार लगता है भोग

थिरुवरप्पु बस स्टैंड के पास स्थित तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रसिद्ध हैं. यह पहला मंदिर है, जहां भगवान श्रीकृष्ण को दिन में 10 बार भोग अर्पित किया जाता है, और अगर भोग अर्पित करने में देरी होती है, तो भगवान की प्रतिमा पतली हो जाती है और कमर पर बंधा कमरबंध भी अपनी जगह से खिसकने लगता है. यही कारण है कि ग्रहण के समय भी भगवान को लगातार भोग लगता रहता है.

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ग्रहण से जुड़ी रहस्यमयी कथा

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स्थानीय लोक मान्यताओं की मानें तो एक बार ग्रहण की वजह से मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए थे और अगले दिन सुबह जब मंदिर के कपाट खोले गए तो भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा एक दिन में ही कमजोर दिखने लगी थी और कमरबंध कमर से नीचे खिसक गया था. तब से लेकर अब तक मंदिर को रात को नौ बजे बंद किया जाता है और सुबह 2 बजे खोल दिया जाता है. भगवान को पहला भोग सुबह 3 बजे अर्पित किया जाता है.

कुल्हाड़ी रखने की अनोखी परंपरा

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मंदिर में कुल्हाड़ी रखने की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है. कुल्हाड़ी रखने के पीछे का कारण है कि अगर मंदिर और गर्भगृह के ताले किसी कारणवश नहीं खुल पाते हैं, तो कुल्हाड़ी की सहायता से ताले और दरवाजे को तोड़ा जा सके. गर्भगृह में मौजूद कृष्ण जी की प्रतिमा भी बहुत खास है, जो काले रंग की है और पीले वस्त्रों और आभूषणों से उनका शृंगार किया गया है. प्रतिमा की चार भुजाएं हैं, जो शंख और अस्त्र धारण किए हुए हैं.

विशेष प्रतिमा और पौराणिक मान्यता

माना जाता है कि यह स्वंयभू प्रतिमा पांडवों को मिली थी, जिसे उन्होंने एक संत को स्थापित करने के लिए दिया था. यह प्रतिमा भगवान के उस रूप को दिखाती है, जब उन्होंने कंस का वध किया था. कंस का वध करने के बाद श्री कृष्ण को बहुत तेज भूख लगी थी और अपनी भूख को शांत करने के लिए वे इसी स्थल पर आए थे. मंदिर के परांगण में अन्य मंदिर भी मौजूद हैं. परिसर में कोचंबलम मंदिर, शिव मंदिर, गणपति, सुबरमणियार और सास्ता के मंदिर भी मौजूद हैं.

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