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Rajarajeshwari Temple: दस महाविद्याओं में शामिल मां राजराजेश्वरी हैं तंत्र की देवी, मंदिर में क्या करने से कम होता राहु का प्रभाव

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा भी काफी प्राचीन और प्रसिद्ध है. माना जाता है कि राजराजेश्वरी पीठाधिपति अरुल ज्योति नागराज मूर्ति विजयवाड़ा जा रहे थे. उन्होंने दुर्गामित्ता में विश्राम किया और सामने के खुले मैदान में देवी राजराजेश्वरी की उपस्थिति का अनुभव किया.

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उत्तर से लेकर दक्षिण भारत में मां जगदम्बा अलग-अलग रूपों में विराजमान हैं. दक्षिण भारत में ज्यादा मां के उग्र रूपों की पूजा की जाती है, लेकिन आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में मां सौंदर्य और आनंद की देवी के रूप में विराजमान हैं, लेकिन फिर भी तंत्र विद्या की देवी के रूप में पूजी जाती हैं. मंदिर में भक्त तांत्रिक परंपरा के साथ मां की पूजा करने के लिए पहुंचते हैं और विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए यज्ञ और हवन करते हैं. 

राजराजेश्वरी मंदिर को 51 शक्तिपीठों का दर्जा मिला है

आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में शांत और सौम्य रूप में मां राजराजेश्वरी विराजमान हैं. यह मंदिर आंध्र प्रदेश के बड़े हिंदू मंदिरों में शामिल है, जहां 51 यंत्र गर्भगृह में देखने को मिल जाते हैं. 51 यंत्र को इच्छापूर्ति के लिए शक्तिशाली माना जाता है और यही वजह है कि राजराजेश्वरी मंदिर को 51 शक्तिपीठों का दर्जा मिला है. मंदिर में मुख्य रूप से मां राजराजेश्वरी की पूजा होती है, जिन्हें 10 महाविद्याओं में से एक माना गया है. मां राजराजेश्वरी को ललिता, त्रिपुरासुंदरी और षोडशी के रूप में पूजा जाता है.

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मंदिर में दीप जलाने से कम होता राहु का प्रभाव

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मंदिर भक्तों के बीच बहुत प्रसिद्ध है, क्योंकि माना जाता है कि इस मंदिर में अनुष्ठान और विधि-पूर्वक पूजा करने से हर परेशानी से छुटकारा मिलता है और तंत्र का काट भी होता है. अगर कुंडली राहु दोष से प्रभावित है, तब भी यहां 18 सप्ताह तक विशेष राहु काल दीपम होता है. इसमें लगातार 18 सप्ताह तक देसी घी और नींबू के दीयों को जलाया जाता है. माना जाता है कि ऐसे करने से राहु का प्रभाव कम होता है. भक्त मंदिर परिसर में दीपक जलाते थे और देवता की परिक्रमा करते थे, और प्रतिदिन चंडी होमम भी किया जाता है.

मंदिर में दशहरा को एक बड़े उत्सव के रूप में क्यों मनाया जाता है?

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मंदिर में दशहरा को एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है.  भक्त पूरे दिन और रात में मां भगवती का पूजन करते हैं और मेले का आनंद भी लेते हैं. माना जाता है कि मां राजराजेश्वरी ने सृष्टि को बचाने के लिए कई राक्षसों का वध किया था. राक्षसों पर मां भवानी की जीत को ही दशहरा के रूप में मनाया जाता है.

किसने कराया इस मंदिर का निर्माण?

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा भी काफी प्राचीन और प्रसिद्ध है. माना जाता है कि राजराजेश्वरी पीठाधिपति अरुल ज्योति नागराज मूर्ति विजयवाड़ा जा रहे थे. उन्होंने दुर्गामित्ता में विश्राम किया और सामने के खुले मैदान में देवी राजराजेश्वरी की उपस्थिति का अनुभव किया. उन्होंने अपने स्थानीय नेल्लोर के शिष्यों से मैदान में एक मंदिर का निर्माण करने का अनुरोध किया. मंदिर की वास्तुकला भी प्राचीन और आध्यात्मिक है. मंदिर के गर्भगृहों की दीवारों पर नवग्रहों की प्रतिमाओं को अंकित कर उकेरा गया है.

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मंदिर के गर्भगृह में मां राजराजेश्वरी की प्रतिमा भी बहुत अद्भुत है

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मंदिर के गर्भगृह में मां राजराजेश्वरी की प्रतिमा भी बहुत अद्भुत है. मां मेरु यंत्र पर विराजमान हैं और उनके हाथ में शंख, चक्र और धनुष विराजमान हैं. मां के दाईं तरफ सरस्वती और बाईं तरफ मां लक्ष्मी भी स्थापित हैं. मंदिर के निर्माण के काफी समय बाद मंदिर में छोटे-छोटे कई उप-मंदिर सुब्रह्मण्येश्वर स्वामी, भगवान श्री सुंदरेश्वर स्वामी, देवी गायत्री, और भगवान विनायक मंदिर का निर्माण कराया गया.

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