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बिंदु माधव मंदिर: काशी में विष्णु भक्ति का अद्भुत संगम, रामनवमी पर उमड़ती श्रद्धा

मोक्षनगरी के इस मंदिर की शांति दुनिया की भागदौड़ से राहत देती है. ऐतिहासिक रूप से यह मंदिर कभी अत्यंत भव्य था. 17वीं शताब्दी के फ्रांसीसी यात्री जीन बप्तिस्त टैवर्नियर ने अपने यात्रा वर्णन में इसकी खूब प्रशंसा की.

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मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव यानी रामनवमी 27 मार्च को है, जिसे दुनिया भर में भक्त उत्साह और उल्लास के साथ मनाते हैं. भक्त पूजा-पाठ करने के साथ नारायण के दर्शन को देवालय जाते हैं. श्रीकाशी विश्वनाथ की नगरी काशी में गंगा, शिव और ज्ञान का अद्भुत संगम है। इसी के बीच स्थित है, नारायण को समर्पित भव्य मंदिर, जिसकी मान्यता ऋषि अग्निबिंदु से जुड़ी है. 

क्यों खास है बिंदु माधव मंदिर? 

वाराणसी के पंचगंगा घाट पर स्थित नारायण को समर्पित मंदिर का नाम बिंदु माधव मंदिर है, जो धार्मिक रूप से विशेष महत्व रखता है, जहां भगवान नारायण ‘बिंदु माधव’ या ‘बूंदों के स्वामी’ के रूप में विराजमान हैं. यह मंदिर न केवल विष्णु भक्ति का केंद्र है, बल्कि रामनवमी पर यहां आने वाले भक्त भगवान राम और विष्णु के एकत्व का अनुभव करते हैं.

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ऋषि अग्निबिंदु की तपस्या से जुड़ी कथा

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उत्तर प्रदेश सरकार के काशी गवर्मेंट पोर्टल के अनुसार, पंचगंगा घाट से ऊपर जाती सीढ़ी एक साधारण पत्थर के हॉल तक पहुंचती है. यहां कोई तड़क-भड़क नहीं, सिर्फ पौराणिक कथाओं और शांत भक्ति की गूंज है. इस हॉल में है प्राचीन बिंदु माधव मंदिर। किंवदंतियों के अनुसार, इस मंदिर की उत्पत्ति ऋषि अग्निबिंदु से जुड़ी है. ऋषि ने यहां तपस्या की और पवित्र जल की बूंदों को पीकर ही अपना जीवन व्यतीत किया. उनकी निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि वह सदैव यहां निवास करेंगे. इसी वजह से उनका नाम ‘बिंदु माधव’ पड़ा, जिसका अर्थ है ‘बूंदों के स्वामी’.

यह मंदिर ‘पंच माधव’ मंदिरों में से एक है, जहां सच्ची भक्ति से मनुष्य के कर्मों के पाप धुल जाते हैं. रामनवमी के दिन भक्त इस मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. भगवान राम विष्णु के अवतार हैं, इसलिए रामनवमी पर बिंदु माधव मंदिर में राम-विष्णु की संयुक्त भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है. श्रद्धालु यहां दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने की कामना रखते हैं.

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इतिहास: भव्यता से सादगी तक का सफर

मोक्षनगरी के इस मंदिर की शांति दुनिया की भागदौड़ से राहत देती है. ऐतिहासिक रूप से यह मंदिर कभी अत्यंत भव्य था. 17वीं शताब्दी के फ्रांसीसी यात्री जीन बप्तिस्त टैवर्नियर ने अपने यात्रा वर्णन में इसकी खूब प्रशंसा की. उन्होंने बताया कि मंदिर ‘क्रॉस’ (एक्स) के आकार का पैगोडा था, जिसमें भगवान विष्णु की छह फुट ऊंची प्रतिमा रत्नों, माणिकों और मोतियों की मालाओं से सजी हुई थी. वर्ष 1669 में मंदिर को नष्ट कर दिया गया, लेकिन प्रतिमा को गुप्त रूप से बचाया गया.

19वीं शताब्दी में मराठा शासक भवान राव ने नए साधारण मंदिर का निर्माण करवाया और प्राचीन प्रतिमा को फिर से स्थापित किया. आज मंदिर में भगवान विष्णु की शालिग्राम शिला व प्रतिमा स्थापित है, जिसके दोनों ओर गरुड़ और हनुमान जी विराजमान हैं. जानकारी के अनुसार, ये प्रतिमाएं पुराने मंदिर के मलबे से बचाई गई हैं. कम ऊंचाई वाले हॉल में श्रद्धालु कीर्तन और जप करते हैं.

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रामनवमी और अन्य पर्वों पर विशेष आयोजन

हर वर्ष कार्तिक मास में यह मंदिर दीपों से जगमगा उठता है. धार्मिक ग्रंथों का पाठ होता है और दूर-दूर से भक्त पापों से मुक्ति की कामना लेकर आते हैं. रामनवमी पर भी यहां विशेष सजावट और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है, जो भक्ति भाव को और गहरा करता है.

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बिंदु माधव मंदिर, पंचगंगा घाट के रतन फाटक, घसी टोला इलाके में स्थित है। मंदिर जाने के लिए कैंट रेलवे स्टेशन से ऑटो, रिक्शा या कैब कर सकते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार की रोडवेज बसें भी उपलब्ध हैं. मंदिर प्रतिदिन सुबह 5 बजे से रात 10.30 बजे तक खुला रहता है.

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