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तीन शुक्रवार तक ट्रंप करते रहे इंतजार, फिर भी PM मोदी ने नहीं किया कॉल... ट्रेड डील पर आखिर क्या है US के खिलाफ भारत का सबसे बड़ा हथियार?

टैरिफ, पेनाल्टी, लगातार धमकी, फिर भी PM मोदी ने नहीं किया ट्रंप को ट्रेड डील के लिए कॉल. भारत की बढ़ती ताकत, दूरगामी सोच और अनुभवों में छिपा है इस सवाल का जवाब!

Donald Trump And PM Modi (File Photo)

भारत और अमेरिका के रिश्तों में जो तनाव पिछले एक साल से दिख रहा है, वैसा बीते 25 सालों में कभी नहीं हुआ. अमेरिका को हिंद-प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक स्तर पर चीन के बढ़ते प्रभुत्व को चुनौती देने, उस थ्रेट को काउंटर करने के लिए एक ऐसे स्ट्रैटेजिक पार्टनर की तलाश थी जो स्थिर हो, सक्षम हो और सतत रूप से बढ़ रहा हो. वह था भारत. दोनों देशों के रिश्तों में प्रगाढ़ता आई क्योंकि सोच एक थी, लक्ष्य एक थे और विचार एक मसलन लोकतंत्र, व्यापार और रूल्स-बेस्ड वर्ल्ड ऑर्डर. भारत-अमेरिका ने इस दौरान खासी तरक्की भी की और बहुत कुछ हासिल किया.

इसी बीच MAGA के रथ पर सवार होकर आए ट्रंप, जो परंपरागत राजनीति से अलग अपने लोकल सपोर्ट बेस को खुश करने के लिए ऐसे फैसले लेने लगे, जिन्होंने दशकों की मेहनत से बने दोस्ताना रिश्तों को बिगाड़कर रख दिया.

ट्रंप की व्यक्तिगत खुन्नस, हर मामले में खुद को विनर साबित करने की चाह और हर बात का क्रेडिट लेने की भूख ने कूटनीतिक रिश्तों को पटरी से उतार दिया. चार साल के लिए आए ट्रंप से, 40 साल की नीतियां बनाने वाले भारत को परेशानी होने लगी. किसी कॉरपोरेट कंपनी के CEO की तरह व्यवहार और फैसले लेने वाले ट्रंप की चाहत थी कि भारत भी उनकी बात वैसे ही माने जैसे ब्रिटेन और पाकिस्तान जैसे देशों ने मानी. ट्रंप चाहते थे कि भारत उनकी लाइन पर चले और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीजफायर में उनकी कथित भूमिका को स्वीकार करे, उनकी पीठ थपथपाए जैसा पाकिस्तान ने चापलूसी की हदें पार कर किया.

ट्रंप चाहते थे कि मोदी उन्हें नोबेल के लिए नॉमिनेट करें, जैसा पाकिस्तान ने किया. ट्रंप की अपेक्षा थी कि चूंकि मोदी उनके दोस्त हैं, इसलिए वे हर बात में हां में हां मिलाएं और शांति प्रस्तावों व युद्ध रुकवाने का क्रेडिट उन्हें दें, ताकि नोबेल पीस प्राइज के लिए उनकी दावेदारी मजबूत हो सके. लेकिन ट्रंप की चाहतें और देशों के व्यवहार करने के तरीके अलग-अलग होते हैं. भारत किसी भी कीमत पर पाकिस्तान के स्तर पर गिरकर वैसा कुछ नहीं करेगा, जो उसके इतिहास में कभी रहा ही नहीं है.

भारत का इतिहास रहा है कि वह द्विपक्षीय मुद्दों में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका या हस्तक्षेप को कभी स्वीकार नहीं करता. चाहे कश्मीर का मसला हो, शिमला समझौता हो या अन्य विषय, जैसे सिंधु जल समझौते की बहाली भारत ने कभी भी मध्यस्थता की बात नहीं मानी.

इतना ही नहीं, ट्रंप की यह भी चाहत थी कि भारत अमेरिकी एग्रो यानी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए अपने बाजार खोल दे और उनका डंपिंग ग्राउंड बन जाए. ट्रंप और अमेरिका चाहते थे कि भारत खेती-किसानी और फार्मा सेक्टर पर दी जाने वाली सब्सिडी भी खत्म करे. हालांकि ऐसा कुछ नहीं हुआ. भारत ने साफ कहा कि वह अपने राष्ट्रहित और स्वतंत्र विदेश नीति के फैसले लेने के अधिकार से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा.

इसके अलावा ट्रंप ने भारी दबाव बनाया कि भारत रूस से तेल न खरीदे और अपना तेल आयात अमेरिका से करे, लेकिन यह भी नहीं हुआ. भारत ने स्पष्ट कहा कि बाजार, कीमत और उपलब्धता तय करेंगे कि किससे सामान लेना है और किससे नहीं. भारत ने रूस से तेल का आयात जारी रखा, इस हद तक कि उस पर अब भी 50% टैरिफ और पेनाल्टी लगी हुई है.

इसी बीच एक और खबर आई कि ट्रंप ने डेडलाइन दी कि मोदी उन्हें कॉल करें और तुरंत ट्रेड डील साइन करें, जैसा दुनिया के अन्य देशों ने किया—और जैसा जापान को बाद में पछताना पड़ा. अब सवाल उठता है कि भारत ने ट्रंप की बात क्यों नहीं मानी. आखिर क्या वजह है कि भारत ट्रंप के सामने झुक नहीं रहा? इसकी कई वजहें हैं, जो आज भारत की ताकत हैं और पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं.

भारत का बाजार, भारत के लोग उसकी असली ताकत

आपको बता दें कि भारत की शक्ति अब उसकी अपनी आबादी और घरेलू मांग में निहित है. पहले की तुलना में भारत अब केवल दुनिया को सामान बेचने के लिए बेताब नहीं है, बल्कि दुनिया भारत के विशाल बाजार में सामान बेचने के लिए बेताब है. भारत आज जापान को पछाड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है. 4.18 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होने के नाते भारत का आंतरिक उपभोग यानी घरेलू मांग इतनी मजबूत है कि वह बाहरी झटकों और दबावों को झेल सकता है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार जरूर है, लेकिन भारत का अस्तित्व केवल उसी पर निर्भर नहीं है.

आंतरिक मांग पर टिकी है भारत की तरक्की

भारत की ग्रोथ बाहरी दुनिया के बजाय अपनी आंतरिक मांग पर टिकी है. अमेरिका हमारा सबसे बड़ा पार्टनर जरूर है, लेकिन हमारे कुल निर्यात का केवल 18% ही वहां जाता है. इसका मतलब यह है कि भारत को व्यापार समझौते के लिए किसी दबाव में झुकने की जरूरत नहीं, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था किसी एक देश की ‘बंधक’ नहीं है.

भारत ने बदल डाली अपनी रणनीति

भारत ने “एक ही टोकरी में सारे अंडे” न रखने की नीति अपनाई है. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूएई और मॉरीशस जैसे देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए हैं और यूरोपीय संघ के साथ बातचीत कर रहा है. इसके अलावा ग्लोबल साउथ के साथ संबंध मजबूत कर भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि यदि अमेरिका के साथ व्यापारिक परिस्थितियां कठिन होती हैं, तो भारत के पास अन्य मजबूत विकल्प मौजूद रहें.

आत्मनिर्भरता से भारत को मिली ताकत

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार जरूर है, लेकिन अब वह स्थिति नहीं रही कि यदि इसमें कमी आए तो भारत भूखा या कंगाल हो जाएगा. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी व्यापारिक नीति को संतुलित किया है. जब व्यापार के कई विकल्प मौजूद हों, तो किसी एक पक्ष का दबाव या धमकी काम नहीं करती. भारत ने अपनी निर्भरता को फैलाया है, जिससे उसकी वैश्विक सौदेबाजी की शक्ति बढ़ी है.

37 ट्रिलियन डॉलर के ऋण संकट से जूझ रहा अमेरिका

अमेरिका वर्तमान में 37 ट्रिलियन डॉलर के भारी ऋण संकट से जूझ रहा है. वैश्विक स्तर पर ‘डी-डॉलराइजेशन’ की लहर चल रही है, जहां कई देश डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं. भारत ने भी रूसी तेल की खरीद के लिए रूबल में भुगतान किया है. ऐसे में अमेरिका को अपने तेल, गैस और हथियार बेचने के लिए भारत जैसे बड़े और विश्वसनीय खरीदार की सख्त जरूरत है. यह स्थिति भारत को सौदेबाजी की मेज पर ऊपरी हाथ देती है. अब व्यापार समझौता भारत की मजबूरी नहीं, बल्कि अमेरिका की अपनी अर्थव्यवस्था को सहारा देने की कोशिश बन चुका है.

भारत ने अमेरिका से ट्रेड डील में क्यों नहीं की जल्दबाजी?

अक्सर व्यापारिक समझौतों में बड़ी शक्तियां ऐसी शर्तें थोपती हैं, जो विकासशील देशों के किसानों और छोटे व्यापारियों को नुकसान पहुंचाती हैं. ये डील शॉर्ट टर्म में फायदे देती हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म में देश को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं इसे ही पॉलिसी पैरालिसिस कहा जाता है. अमेरिका चाहता था कि भारत अपने डेयरी और कृषि बाजार खोल दे और डेटा सुरक्षा नियमों में ढील दे. इससे भारत के करोड़ों छोटे किसानों और पशुपालकों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता. मोदी सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि तात्कालिक लाभ के लिए देश के करोड़ों लोगों की आजीविका और डेटा संप्रभुता से समझौता नहीं किया जाएगा.

मोदी अगर ट्रंप की बात मान जाते तो क्या होता?

भारत इस समय भविष्य के निर्माण के लिए दूरदर्शी सोच के साथ डिफेंस, सेमीकंडक्टर और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों की नींव रख रहा है. यदि आज दबाव में आकर पॉलिसी स्पेस का सौदा कर लिया जाता, तो भविष्य में भारत अपनी औद्योगिक नीतियां स्वतंत्र रूप से नहीं बना पाता. भारत ने आज के छोटे नुकसान, जैसे टैरिफ, इसलिए सहन किए ताकि आने वाले दशकों में वह एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर औद्योगिक शक्ति के रूप में उभर सके और किसी बाहरी नियामक शर्तों का पालन न करना पड़े.

यही वजह है कि ट्रंप के लगातार दबाव, 25%, 50% ही नहीं बल्कि 500% टैरिफ की धमकियों के बावजूद भारत न हिला, न डरा और न ही ट्रेड डील को लेकर घबराया. इसी कारण जब अमेरिका के राजदूत भारत में पदभार संभालते हैं तो कहते हैं कि अमेरिका के लिए भारत से बड़ा कोई साझेदार नहीं है. इतना ही नहीं, अमेरिका के नेतृत्व में नवगठित पैक्स सिलिका लीग में भारत को पूर्ण सदस्य देश के रूप में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया जाता है.

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