अशराफ वर्ग से लड़कर दिलाई 'देशज' मुसलमानों को पहचान, डटकर रखी देशहित में राय...पसमांदा आंदोलन की मुखर आवाज डॉ. फैयाज अहमद फैजी
डॉ. फैयाज़ अहमद फैज़ी आज भारत में पसमांदा आंदोलन के सबसे प्रमुख और मुखर चेहरों में से एक हैं. डॉ. फैज़ी ने तमाम संघर्षों और सामाजिक बंदिशों के बावजूद पसमांदा समाज को एक राष्ट्रीय पहचान दिलाने और विमर्श के केंद्र में लाने में सफलता पाई है.
Follow Us:
भारत में इस्लाम को लेकर लंबे समय से बहस रही है कि असली मुसलमान कौन है? क्या जो अशराफ वर्ग है, जो खुद को भारतीय संस्कृति से अलग मानता है या फिर पसमांदा मुसलमान, जिनकी जड़ें, रीति रिवाज भारतीयता से मेल खाती हैं, जिन्हें इन्हीं अशराफिया द्वारा अलग-थलग किया गया. इन्हीं सब द्वंद्व और सोच को दूर करता, अपने समाज की लड़ाई लड़ता और पसमांदा आंदोलन को वैचारिक क्रांति का शक्ल देता बलिया की क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाता में पसमांदा समाज का बड़ा चेहरा, बड़ी आवाज डॉक्टर फैयाज अहमद फैजी. जिसने तमाम संघर्षों और सामाजिक बंदिशों के बावजूद पसमांदा समाज को एक राष्ट्रीय पहचान दिलाने और वैचारिक-मीडिया, राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने में सफलता पाई है.
आपको बता दें कि डॉ. फैयाज़ अहमद फैज़ी आज भारत में पसमांदा आंदोलन के सबसे प्रमुख और मुखर चेहरों में से एक हैं. पेशे से आयुष चिकित्सक होने के साथ-साथ वे एक लेखक, अनुवादक और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं. तमाम विरोधों और धमकियों के बावजूद, वे बाबा कबीर और आसिम बिहारी जैसे सुधारकों की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. उनका मुख्य लक्ष्य मुस्लिम समाज के भीतर गहराई तक जमे जातिवाद, भेदभाव और ‘अशराफवाद’ (उच्च वर्गीय वर्चस्व) को चुनौती देना है.
सामाजिक आंदोलनों की विरासत को आगे बढ़ा रहे डॉ. फैज़ी
डॉ. फैज़ी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के भृगु आश्रम में एक जागरूक पसमांदा परिवार में हुआ. उनके परिवार का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम, जेपी आंदोलन और सामाजिक सुधारों से जुड़ा रहा है. बलिया की उस ऐतिहासिक धरती, जिसने मंगल पाण्डेय, चितु पाण्डेय, जयप्रकाश नारायण और चंद्रशेखर जैसे नायकों को जन्म दिया, उसी विद्रोही परंपरा को डॉ. फैज़ी मुस्लिम समाज के आंतरिक सुधारों की ओर मोड़ रहे हैं. उनका मानना है कि जब तक मुस्लिम समाज आंतरिक सामाजिक न्याय सुनिश्चित नहीं करेगा, तब तक समानता की बात अधूरी रहेगी.
देशज मुसलमानों को पहचान और राष्ट्रीय पहचान दिलाने की कोशिश
डॉ. फैज़ी का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक योगदान ‘देशज पसमांदा’ की अवधारणा है. यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक पहचान है जो पसमांदा मुसलमानों को अशराफ मुसलमानों की वर्चस्ववादी मानसिकता से मुक्त करती है.देशज’ का अर्थ है ‘स्थानीय’ या ‘भारत का मूल निवासी’. यह पहचान उन्हें उन ‘अशराफ’ मुसलमानों से अलग करती है जो स्वयं को विदेशी आक्रांताओं का वंशज मानते हैं.
मूल रूप से ‘भारतीय’ हैं पसमांदा मुसलमान: डॉ. फैज़ी
डॉ. फैज़ी का तर्क है कि पसमांदा मुसलमान मूल रूप से भारत के ही निवासी हैं, जिनकी जीवनशैली, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक मान्यताएं हिंदू परंपराओं से काफी मेल खाती हैं. वे इन भारतीय रीति-रिवाजों को इस्लाम विरोधी नहीं मानते. उनका कहना है कि इस्लामी शरिया के “उर्फ़” (स्थानीय परंपरा) सिद्धांत के अंतर्गत इन सांस्कृतिक पहचानों को मान्यता प्राप्त है.
सांस्कृतिक जुड़ाव: डॉ. फैज़ी का तर्क है कि पसमांदा मुसलमान मूल रूप से भारत के ही निवासी हैं, जिनकी जीवनशैली, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक मान्यताएं हिंदू परंपराओं से काफी मेल खाती हैं.
इस्लामी शरिया और ‘उर्फ़’: वे इन भारतीय रीति-रिवाजों को इस्लाम विरोधी नहीं मानते. उनका कहना है कि इस्लामी शरिया के “उर्फ़” (स्थानीय परंपरा) सिद्धांत के अंतर्गत इन सांस्कृतिक पहचानों को मान्यता प्राप्त है.
राष्ट्र, राष्ट्रीयता और बौद्धिक विमर्श के अगुआ डॉ. फैज़ी
डॉ. फैज़ी का संघर्ष केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमित नहीं है. उन्होंने कई संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों पर मुखरता से अपनी राय रखी है. उन्होंने ट्रिपल तलाक को ‘अशराफ-प्रधान’ धार्मिक राजनीति का शस्त्र बताया, जिसने मुस्लिम महिलाओं के न्याय को रोक रखा था. उन्होंने पसमांदा महिलाओं को इसके खिलाफ जागरूक किया और इसे उनके समान अधिकार और गरिमा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना. डॉ. फैज़ी ने निम्न राष्ट्रीय और सामाजिक विषयों पर दो टूक अपनी बौद्धिक राय रखी.
1. ट्रिपल तलाक और महिला अधिकार
उन्होंने ट्रिपल तलाक को ‘अशराफ-प्रधान’ धार्मिक राजनीति का शस्त्र बताया, जिसने मुस्लिम महिलाओं के न्याय को रोक रखा था. उन्होंने पसमांदा महिलाओं को इसके खिलाफ जागरूक किया और इसे उनके समान अधिकार और गरिमा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना.
2. अनुच्छेद 370 का समर्थन
डॉ. फैज़ी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन किया. उनके अनुसार, यह कश्मीरी अशराफ नेतृत्व के वर्चस्व को चुनौती देने वाला निर्णय था, जिसने वहां के पसमांदा मुसलमानों को उनके संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण से वंचित रखा था.
3. वक्फ बोर्ड में सुधार
उनका मानना है कि वक्फ संपत्तियों पर अशराफ वर्ग का एकाधिकार रहा है. उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सामने सुझाव दिया कि इसमें मुस्लिम समाज के सामाजिक न्याय को सामने रखते हुए पसमांदा की आबादी के अनुसार भागीदारी सुनिश्चित की जाए. वक्फ की भूमि का कुछ हिस्सा भूमिहीन पसमांदा परिवारों को आवंटित किया जाए, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें.
4. समान नागरिक संहिता (UCC)
डॉ. फैज़ी UCC को लैंगिक समानता और न्याय के लिए अनिवार्य मानते हैं. उन्होंने इसके पक्ष में एक व्यापक डिजिटल अभियान चलाकर हजारों ईमेल विधि आयोग को भेजवाए. उनका तर्क है कि UCC इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है, क्योंकि इस्लाम स्वयं सामाजिक न्याय और सुधारों का समर्थक है.
5. आर्टिकल 341 और आरक्षण
वे अनुच्छेद 341(3) में संशोधन की वकालत करते हैं ताकि दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों को भी अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा मिल सके. उनका स्पष्ट मत है कि धर्म परिवर्तन से जातिगत पिछड़ापन और ऐतिहासिक अन्याय समाप्त नहीं होता. वे आरक्षण में क्रीमी लेयर और वर्गीकरण के भी प्रबल समर्थक हैं, ताकि लाभ अति-वंचितों तक पहुंचे.
6. जातिगत जनगणना
उनके अनुसार, जातिगत जनगणना सामाजिक न्याय की नींव है. इससे पसमांदा समाज की वास्तविक आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का सटीक आकलन हो सकेगा, जिससे सरकारें उनके लिए लक्षित नीतियां बना सकेंगी.
इस्लाम की व्याख्या: व्यक्तिगत आस्था बनाम संवैधानिक व्यवस्था
डॉ. फैज़ी के अनुसार, इस्लाम मूलतः समानता और न्याय का धर्म है, जिसे कालांतर में ‘अशराफ’ वर्ग ने अपने राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व के लिए विकृत कर दिया. वे धर्म और समाज के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा खींचते हैं: उनके लिए धर्म एक व्यक्तिगत आस्था है, जबकि समाज एक संविधान-आधारित व्यवस्था होनी चाहिए. वे शिक्षा, अवसर और न्याय के लिए धार्मिक परंपराओं के बजाय देश के संविधान को सर्वोपरि मानते हैं.
वे पैगंबर साहब के अंतिम उपदेश और ‘मिसाके मदीना’ को इस्लामी इतिहास का पहला लोकतांत्रिक दस्तावेज मानते हैं, जहाँ श्रेष्ठता का आधार ‘वंश’ नहीं बल्कि ‘तक़वा’ (नेक कर्म) है. डॉ. फैज़ी का तर्क है कि अशराफ वर्ग ने सत्ता के लिए नस्ल और खानदान को महत्व देकर जन्म-आधारित जातिवाद को मजहबी जामा पहनाते हुए इस्लामी शरिया का अभिन्न अंग बना दिया, जिससे कमजोर और वंचित पसमांदा समाज हाशिए पर चला गया.
डॉ. फैजी ‘इस्लाम की पसमांदा व्याख्या’ पर ज़ोर देते हैं, जिसमें स्थानीय संस्कृति (उर्फ़) और भाषा को इस्लाम-सम्मत माना गया है. उनकी यह सोच न केवल पसमांदा समाज को गरिमा और अधिकार दिलाने का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के समानता, न्याय और बंधुत्व के आदर्शों को भी मजबूती प्रदान करती है.
आसान नहीं थी डॉ. फैज़ी की पसमांदा आंदोलन की राह
डॉ. फैज़ी की राह आसान नहीं रही है. उन्हें आंतरिक और बाहरी दोनों स्तरों पर कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है. उन्हें सबसे ज्यादा विरोध मुसलमानों के ही उच्च वर्ग, जिसे डॉ. फैज़ी ‘अशराफ वर्ग’ कहते हैं, से झेलना पड़ा. अशराफिया उन्हें अक्सर “इस्लाम विरोधी” या “सरकार का एजेंट” कहकर बदनाम करने की एक सुनियोजित साजिश करते हैं. कोशिश की जाती है कि उनकी छवि को सामाजिक दौर पर धूमिल किया जाए, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए हैं.
मीडिया की उपेक्षा: इतना ही नहीं, डॉ. फैज़ी का आरोप है कि तथाकथित सेक्युलर मीडिया और बुद्धिजीवी केवल अशराफ नेताओं की आवाज़ को ही “पूरे मुस्लिम समाज की आवाज़” मानते हैं, जिससे पसमांदा मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श से गायब हो जाते हैं. तमाम दिक्कतों और संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा है. तमाम अड़चनों और अपनों के ही तिरस्कार के बावजूद वे कबीर और आसिम बिहारी की बेखौफ आवाज़ उठाने की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं.
रंग ला रही पसमांदा समाज को मुख्यधारा में लाने की डॉ. फैज़ी की मुहिम
डॉ. फैज़ी का मानना है कि पसमांदा समाज का वास्तविक सशक्तिकरण तभी संभव है, जब वे राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदार बनें. उन्होंने आंदोलन को केवल सामाजिक सुधार तक सीमित न रखकर उसे नीति-निर्माण और प्रतिनिधित्व की मांग से जोड़ा है.
उनकी सक्रियता ने इस विमर्श को हाशिए से उठाकर मुख्यधारा में पहुँचा दिया है. आज देश के प्रधानमंत्री भी अपने भाषणों में ‘पसमांदा’ शब्द का उल्लेख करते हैं, जो डॉ. फैज़ी के वर्षों के संघर्ष का परिणाम है. संसद में वक्फ बोर्ड पर चर्चा के दौरान माननीय सांसद डॉ. मेघा कुलकर्णी ने भी उनके विचारों का हवाला दिया, जो यह दर्शाता है कि उनकी आवाज़ अब विधायिका के उच्चतम मंच तक पहुँच चुकी है.
आंदोलन से वैचारिक क्रांति का रूप ले चुका है पसमांदा आंदोलन
यह भी पढ़ें
ऐसे में डॉ. फैयाज़ अहमद फैज़ी का योगदान यह सिद्ध करता है कि पसमांदा आंदोलन अब केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि एक वैचारिक और सामाजिक क्रांति बन चुका है. उनकी “देशज पसमांदा” अवधारणा भारतीय लोकतंत्र की आत्मा समानता, न्याय और बंधुत्वको सुदृढ़ करती है. उनके प्रयासों ने न केवल पसमांदा समाज में आत्मविश्वास जगाया है, बल्कि भारतीय राजनीति और सामाजिक न्याय के संघर्ष को एक नई और अधिक न्यायपूर्ण दिशा प्रदान की है.
टिप्पणियाँ 0
कृपया Google से लॉग इन करें टिप्पणी पोस्ट करने के लिए
Google से लॉग इन करें