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'तानाशाही' में तब्दील हो रही ट्रंप की दादागिरी…बगावत करने वाले तीन जनरलों को दी ऐसी सजा कि मच गया बवाल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में भी बर्खास्तगी की बड़ी कार्रवाई की है. रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने तीन वरिष्ठ अधिकारियों DIA प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जेफ्री क्रूज, नेवी रिजर्व प्रमुख वाइस एडमिरल नैन्सी लैकोरे और नेवी सील कमांडर रियर एडमिरल मिल्टन सैंड्स को पद से हटा दिया.

'तानाशाही' में तब्दील हो रही ट्रंप की दादागिरी…बगावत करने वाले तीन जनरलों को दी ऐसी सजा कि मच गया बवाल
Image: US Army General / Donald Trump
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अमेरिका की राजनीति एक बार फिर हलचल से भर गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में बर्खास्तगी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. बीते दिन रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने तीन बड़े सैन्य अधिकारियों को पद से हटा दिया. इन नामों में सबसे अहम है लेफ्टिनेंट जनरल जेफ्री क्रूज, जो डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) के मुखिया थे. इसके साथ ही वाइस एडमिरल नैन्सी लैकोरे, जो नेवी रिजर्व की प्रमुख थीं, और रियर एडमिरल मिल्टन सैंड्स, जो नेवी सील्स और स्पेशल वॉरफेयर कमांड के कमांडर थे, उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इस कदम ने अमेरिकी राजनीति और सुरक्षा तंत्र दोनों को हिला दिया है.

क्यों उठाया गया यह कदम?

ट्रंप प्रशासन की यह कार्रवाई सीधे तौर पर ईरान पर हुए अमेरिकी हवाई हमलों से जुड़ी बताई जा रही है. दरअसल, DIA की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि इन हमलों से ईरान का परमाणु कार्यक्रम सिर्फ कुछ महीनों के लिए धीमा हुआ है. यह रिपोर्ट ट्रंप के उस दावे के बिल्कुल उलट थी जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह तबाह हो चुका है. इतना ही नहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी ट्रंप के दावे का समर्थन किया था. जब रिपोर्ट मीडिया में लीक हुई तो राष्ट्रपति ट्रंप बेहद नाराज हो गए. माना जा रहा है कि इसी नाराजगी ने जनरल क्रूज की बर्खास्तगी की जमीन तैयार की.

विपक्ष का तीखा हमला

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इस बर्खास्तगी के बाद विपक्षी नेताओं ने ट्रंप प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि सरकार अब सेना और खुफिया एजेंसियों से सिर्फ वही रिपोर्ट चाहती है जो राजनीतिक हितों को साधे. सीनेटर मार्क वॉर्नर ने कहा कि “एक और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी की बर्खास्तगी से यह साफ है कि ट्रंप प्रशासन खुफिया रिपोर्ट को देश की सुरक्षा नहीं बल्कि वफादारी की कसौटी मान रहा है.” हाउस इंटेलिजेंस कमेटी के डेमोक्रेटिक नेता जिम हाइम्स ने भी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि “अगर इन बर्खास्तगियों की कोई पारदर्शी वजह नहीं बताई जाती तो इसे राजनीतिक फैसला ही माना जाएगा. यह कदम खुफिया एजेंसियों में डर का माहौल बनाने के लिए उठाया गया है.”

पहले भी हो चुकी हैं बड़ी बर्खास्तगियां

यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप प्रशासन ने वरिष्ठ अधिकारियों को हटाने का फैसला लिया हो. इसके पहले भी कई चर्चित नाम इस लिस्ट में शामिल हो चुके हैं.

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  • एयरफोर्स के शीर्ष अधिकारी जनरल डेविड ऑल्विन ने अचानक दो साल पहले ही रिटायरमेंट की घोषणा कर दी थी.
  • ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल CQ ब्राउन जूनियर को भी हटा दिया गया.
  • नौसेना प्रमुख, एयरफोर्स के डिप्टी चीफ और तीनों सेनाओं के शीर्ष लॉ ऑफिसर्स को पद से हटा दिया गया.
  • NSA के प्रमुख जनरल टिम हॉग और नाटो की वरिष्ठ अधिकारी वाइस एडमिरल शोशाना चैटफील्ड को भी इस साल अप्रैल में बाहर का रास्ता दिखाया गया.
  • इन फैसलों ने साफ कर दिया है कि ट्रंप प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है.

विशेषज्ञों क्या मानते हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की बर्खास्तगियां अमेरिकी सुरक्षा तंत्र को कमजोर कर सकती हैं. खुफिया एजेंसियों का काम सरकार को निष्पक्ष और सही जानकारी देना होता है, लेकिन जब उन पर राजनीतिक दबाव बढ़ता है तो उनकी विश्वसनीयता पर असर पड़ता है. विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ईरान के मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन की आक्रामक नीति के कारण सेना और खुफिया एजेंसियों के बीच अविश्वास की खाई और चौड़ी हो गई है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये बर्खास्तगियां केवल ट्रंप की नाराजगी का नतीजा हैं या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति छिपी है. विपक्ष इस मुद्दे को कांग्रेस में उठाने की तैयारी कर रहा है. वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह संदेश जा रहा है कि अमेरिका के भीतर नीति और खुफिया रिपोर्टों को लेकर गहरी असहमति है.

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गौरतलब है कि राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में यह पहली बार नहीं है जब उनकी नाराजगी के कारण वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया गया हो. लेकिन इस बार जिस तरह से डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी के मुखिया सहित तीन बड़े सैन्य अधिकारियों को बाहर किया गया है, उसने अमेरिकी राजनीति और सुरक्षा तंत्र दोनों को हिला कर रख दिया है. यह घटनाक्रम न केवल अमेरिकी लोकतंत्र में संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है बल्कि यह भी दिखाता है कि राजनीति और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना कितना कठिन हो गया है.

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