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PM मोदी के साथ 'चाय पर चर्चा' कर प्रियंका ने दिए नए संकेत, क्या बदल रही है कांग्रेस की राजनीति और शक्ति का केंद्र?

संसद के शीतकालीन सत्र के बाद हुई पारंपरिक ‘चाय पे चर्चा’ इस बार खास रही, क्योंकि पहली बार सांसद बनीं प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रधानमंत्री मोदी और लोकसभा अध्यक्ष के साथ अग्रिम पंक्ति में बैठकर राजनीतिक संकेत दिए.

PM मोदी के साथ 'चाय पर चर्चा' कर प्रियंका ने दिए नए संकेत, क्या बदल रही है कांग्रेस की राजनीति और शक्ति का केंद्र?
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संसद के शीतकालीन सत्र के समापन के बाद होने वाली पारंपरिक ‘चाय पे चर्चा’ आमतौर पर एक औपचारिक रस्म मानी जाती है. नेता आते हैं, चाय पीते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं और सियासी गलियारों में हल्की-फुल्की बातचीत होती है. लेकिन इस बार यह चाय चर्चा कई मायनों में खास रही. वजह बनीं कांग्रेस की पहली बार सांसद बनीं प्रियंका गांधी वाड्रा. उनका लोकसभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पहली पंक्ति में बैठना केवल एक तस्वीर नहीं था, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक संकेत निकाले जा रहे हैं.

दरअसल, प्रियंका गांधी का उसी पंक्ति में बैठना इसलिए भी चर्चा में रहा, क्योंकि वह फिलहाल कांग्रेस संसदीय दल में किसी औपचारिक पद पर नहीं हैं. इसके बावजूद उन्हें प्रमुख स्थान मिला, जबकि एनसीपी की वरिष्ठ नेता सुप्रिया सुले उनसे पीछे बैठी नजर आईं. सियासी जानकार इसे महज संयोग नहीं मान रहे. सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान प्रियंका गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच उनके संसदीय क्षेत्र वायनाड को लेकर शालीन और सौहार्दपूर्ण बातचीत भी हुई. यह संवाद बताता है कि प्रियंका टकराव के साथ-साथ संवाद की राजनीति को भी महत्व देती हैं.

ऐसी बैठकों से दूर रहती है कांग्रेस?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी अक्सर ऐसी अनौपचारिक बैठकों से दूरी बनाए रखते हैं. उनकी राजनीतिक शैली अधिक आक्रामक और वैचारिक संघर्ष पर आधारित मानी जाती है. इसके उलट प्रियंका गांधी की मौजूदगी यह संकेत देती है कि वह राजनीति को अलग नजरिए से देख रही हैं. चाय चर्चा के दौरान उनके चेहरे पर सहज मुस्कान और आत्मविश्वास साफ दिखा. यह आत्मविश्वास यूं ही नहीं आया है. इससे एक दिन पहले ही लोकसभा में उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से वायनाड में एक हाईवे को लेकर मुलाकात का अनुरोध किया था. गडकरी ने भी सत्र समाप्त होते ही उन्हें अपने कार्यालय आने का आमंत्रण दे दिया. यह घटना प्रियंका की संवाद क्षमता और व्यवहारिक राजनीति का उदाहरण मानी जा रही है.

कांग्रेस की तरफ से संसद में प्रियंका ने संभाली कमान 

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एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी की अनुपस्थिति में इस सत्र के दौरान प्रियंका गांधी ने प्रभावी ढंग से संसदीय कमान संभाली. वह रोज सुबह करीब 9.30 बजे संसद पहुंचती थीं, मीडिया से संवाद करती थीं और यह सुनिश्चित करती थीं कि कांग्रेस की आवाज सदन और बाहर दोनों जगह सुनी जाए. उनकी भूमिका सिर्फ मौजूदगी तक सीमित नहीं रही. पार्टी के भीतर भी उन्होंने सक्रिय हस्तक्षेप किया. सूत्र बताते हैं कि प्रियंका गांधी ने कांग्रेस में ‘बिग टेंट’ अप्रोच अपनाने की पहल की. यानी उन नेताओं को फिर से साथ लाने की कोशिश, जो समय के साथ हाशिए पर चले गए थे.

बगावत करने वालों को मनाएंगी प्रियंका गांधी?

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि प्रियंका गांधी के प्रयासों से ही मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे नेताओं को दोबारा प्रमुख बहसों में आगे लाया गया. पार्टी नेतृत्व को यह महसूस हुआ कि अनुभवी और प्रभावशाली वक्ताओं को नजरअंदाज करना कहीं न कहीं बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो रहा था. इसके बाद मनीष तिवारी ने SHANTI विधेयक समेत कई अहम मुद्दों पर सदन में मजबूती से अपनी बात रखी. वहीं शशि थरूर ने VB-G RAM G बिल पर बोलने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड मामले में मकर द्वार पर हुए विरोध प्रदर्शन में भी सक्रिय भूमिका निभाई.

संसद में प्रियंका गांधी में दिखी माँ सोनिया गांधी की झलक 

प्रियंका गांधी की यह समावेशी राजनीति कई लोगों को उनकी मां सोनिया गांधी की शैली की याद दिलाती है. सोनिया गांधी को भी पार्टी के भीतर मतभेदों को सार्वजनिक टकराव बनने से पहले संभालने के लिए जाना जाता रहा है. प्रियंका ने भी लोकसभा के भीतर सीधे टकराव से परहेज नहीं किया, लेकिन भाषा और अंदाज में संतुलन बनाए रखा. ‘वंदे मातरम्’ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उन्होंने प्रधानमंत्री को घेरने का साहस दिखाया. यह ऐसा विषय है, जिसे छूने से कांग्रेस के कई नेता अब तक कतराते रहे हैं. प्रियंका ने संयम, दृढ़ता और हल्के हास्य के मिश्रण से सरकार को जवाब देने पर मजबूर किया.

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बीजेपी के लिए नई साबित हो सकती है नई चुनौती 

बीजेपी खेमे में भी यह धारणा बनने लगी है कि राहुल गांधी को निशाना बनाना अपेक्षाकृत आसान रहा है, जबकि प्रियंका गांधी एक ज्यादा जटिल और संतुलित राजनीतिक चुनौती पेश करती हैं. उनके बारे में कहा जा रहा है कि वह लंबी राजनीतिक नाराजगियां नहीं पालतीं और संवाद के रास्ते खुले रखती हैं. इसी बीच, रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ उनके रिश्तों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं. गौर करने वाली बात यह है कि बिहार अभियान के दौरान प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी की आलोचना की थी, लेकिन प्रियंका गांधी को लेकर वह हमेशा सम्मानजनक रुख अपनाते रहे हैं.

क्या अब कांग्रेस में हो गए दो पावर सेंटर?

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शीतकालीन सत्र के समापन के साथ ही कांग्रेस में दो शक्ति केंद्रों के उभरने की चर्चा तेज हो गई है. पार्टी के भीतर यह माना जा रहा है कि राहुल गांधी वैचारिक संघर्ष और जन-आंदोलनों का चेहरा बने रहेंगे. वहीं रणनीति, संवाद और रोजमर्रा के राजनीतिक प्रबंधन की जिम्मेदारी धीरे-धीरे प्रियंका गांधी के हाथों में जा सकती है. ऐसे में सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी को प्रियंका का प्रधानमंत्री के साथ चाय पीना रास आएगा, या यह कांग्रेस की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत साबित होगा. जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है, लेकिन संकेत साफ हैं कि कांग्रेस के भीतर संतुलन की नई रेखाएं खिंचने लगी हैं.

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