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पीएम मोदी के एक्ट ईस्ट पॉलिसी वाले बयान से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का बदला आधार

एक्ट ईस्ट पॉलिसी : पीएम मोदी का एक विचार जिसने बदल दिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति के आधार

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 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बैंकॉक की यात्रा पर हैं जिसके बाद वह श्रीलंका दौरे पर भी जाएंगे। इस यात्रा से एक बार फिर 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' चर्चा के केंद्र में आई है। पीएम मोदी की विदेश नीति में 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' विशेष स्थान रखती है।  

इस पॉलिसी की जड़ें 1992 में शुरू की गई 'लुक ईस्ट पॉलिसी' में हैं जिसका मुख्य ध्यान दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के साथ आर्थिक संबंधों पर था। हालांकि 2014 में पीएम मोदी ने 'लुक ईस्ट पॉलिसी' को अधिक गतिशील 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी (एईपी)' में बदल दिया।

पीएम मोदी की ओर से किया गया यह बदलाव सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं था बल्कि एक महत्वपूर्ण रणनीतिक दृष्टिकोण का प्रतीक था। इसके दक्षिण-पूर्व एशिया और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ गहन कूटनीतिक जुड़ाव, मजबूत व्यापार साझेदारी, बेहतर सुरक्षा सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर जोर दिया गया।

'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' ने भारत को क्षेत्रीय मामलों में एक सक्रिय हितधारक के रूप में स्थापित किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए कई देशों की कई यात्राएं की। इनमें सिंगापुर की तीन यात्राएं (2015, 2018, 2024) और इंडोनेशिया की भी तीन यात्राएं (2018, 2022, 2023) शामिल हैं।

2017 में, पीएम मोदी, 36 वर्षों में फिलीपींस का दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने। 2024 में ब्रुनेई की उनकी ऐतिहासिक यात्रा किसी भारतीय पीएम की देश की पहली यात्रा थी, जो भारत की बढ़ती कूटनीतिक पहुंच का प्रतीक बनी।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने म्यांमार, मलेशिया, थाईलैंड, लाओस और वियतनाम की यात्राएं भी कीं, जिससे क्षेत्र में भारत के रणनीतिक और आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सका।

पीएम मोदी ने 2018 में आसियान-भारत वार्ता साझेदारी के 25 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सभी आसियान नेताओं को आमंत्रित किया।

पीएम मोदी की 'लुक ईस्ट पॉलिसी' रंग लाई और आसियान के साथ भारत का व्यापार लगभग दोगुना हो गया। 2016-17 में यह 71 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 तक 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया।

आज, भारत आसियान का 7वां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जबकि आसियान भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।

आर्थिक संपर्क बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को बढ़ावा दिया, ताकि भारत-आसियान व्यापार और आवाजाही को बढ़ावा मिले।

सीधी उड़ान कनेक्टिविटी में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ, भारत अब कई आसियान देशों से सीधे जुड़ा है, जिससे व्यापार, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में आसानी हुई।

'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' का रणनीतिक और रक्षा आयाम फोकस का एक और अहम क्षेत्र रहा। भारत समुद्री सुरक्षा सहयोग में सक्रिय रूप से शामिल रहा है, खासकर फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों के साथ।

इस पॉलिसी के तहत सबसे बड़े मील के पत्थरों में से एक फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों की बिक्री थी, जिसने इस क्षेत्र में एक गंभीर रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत के प्रवेश को चिह्नित किया। इसके अतिरिक्त, भारत ने वियतनाम के साथ सैन्य रसद समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिससे इंडो-पैसिफिक सुरक्षा ढांचे में इसकी उपस्थिति का विस्तार हुआ।

2019 में शुरू की गई 'इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (आईपीओआई)' इस क्षेत्र में समुद्री स्थिरता और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम था।

भारत और आसियान ने 2023 में अपना पहला संयुक्त समुद्री अभ्यास किया, जिसका उद्देश्य दक्षिण चीन सागर और व्यापक इंडो-पैसिफिक में सुरक्षा चुनौतियों का मुकाबला करना था।

व्यापार और सुरक्षा के अलावा, सांस्कृतिक और लोगों के बीच आपसी जुड़ाव ने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के रिश्ते मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रधानमंत्री मोदी की एक्ट ईस्ट नीति ने म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ भारत की साझा बौद्ध विरासत को पुनर्जीवित किया, जिससे गहरे आध्यात्मिक संबंध विकसित हुए।

300 से अधिक आसियान छात्रों को नालंदा विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति मिली। मोदी सरकार ने संबंधों को मजबूत करने के लिए शैक्षिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की सुविधा प्रदान की।

पिछले 10 वर्षों में, 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' ने भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया में एक सक्रिय और प्रभावशाली खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया। जबकि 'लुक ईस्ट नीति' मुख्य रूप से व्यापार पर केंद्रित थी, एईपी ने एक बहुआयामी रणनीति को विस्तार दिया जिसमें कूटनीति, रक्षा, संपर्क और संस्कृति शामिल है।

पीएम मोदी की लगातार मुलाकातों, हाई-प्रोफाइल शिखर सम्मेलनों और रणनीतिक साझेदारियों ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत की उपस्थिति को न केवल मजबूत किया बल्कि उसने क्षेत्रीय मसलों में एक नेता की भूमिका में ला दिया।

Input: IANS
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