Advertisement

शादी का वादा टूटा तो क्या हर बार बनेगा बलात्कार का केस? उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक केस के फैसले में कहा है कि यदि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक सहमति से संबंध रहे हों, तो बाद में शादी का वादा पूरा न होने मात्र से उसे बलात्कार नहीं माना जा सकता.

Uttrakhand High Court

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में बड़ा फैसला सुनाया है, जो सहमति, विवाह के वादे और आपराधिक कानून की सीमाओं को स्पष्ट करता है. अदालत ने कहा है कि यदि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध रहे हों, तो बाद में शादी का वादा पूरा न होने मात्र से उसे बलात्कार नहीं माना जा सकता.

क्या है पूरा मामला?

यह मामला मसूरी की एक महिला की शिकायत से जुड़ा था. महिला ने सूरज बोरा नामक व्यक्ति पर आरोप लगाया कि उसने 45 दिन में शादी करने का भरोसा दिया और इसी वादे के आधार पर शारीरिक संबंध बनाए. बाद में आरोपी शादी से मुकर गया. पुलिस ने जांच के बाद 22 जुलाई 2023 को आरोप पत्र दाखिल किया. इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कार्यवाही रद्द करने की मांग की.

बचाव पक्ष की दलील क्या रही?

बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि दोनों पक्ष वयस्क थे और लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध में रहे. प्राथमिकी में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि शुरुआत से ही आरोपी का इरादा शादी करने का नहीं था. वकीलों का कहना था कि यह एक असफल संबंध हो सकता है, लेकिन इसे आपराधिक मामला बनाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा.

राज्य सरकार ने किया विरोध

वहीं राज्य सरकार और महिला की ओर से पेश वकीलों ने याचिका का विरोध किया. उनका कहना था कि महिला की सहमति केवल शादी के वादे पर आधारित थी. यदि यह साबित हो जाए कि वादा शुरू से ही झूठा था, तो यह भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत अपराध बन सकता है. उनका तर्क था कि यह तय करना कि वादा धोखे से किया गया था या नहीं, साक्ष्यों के आधार पर मुकदमे के दौरान ही संभव है.

अदालत ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आशीष नैथानी ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि किसी वयस्क महिला की सहमति केवल इसलिए अवैध नहीं मानी जा सकती क्योंकि संबंध विवाह में नहीं बदला. धारा 376 के तहत अपराध तभी माना जाएगा, जब यह साबित हो कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था और केवल सहमति हासिल करने के लिए किया गया था.

कोर्ट का अंतिम फैसला

अदालत ने पाया कि दोनों पक्ष लंबे समय तक संबंध में रहे और कई बार शारीरिक संबंध बने, जो आपसी सहमति की ओर संकेत करते हैं. ऐसे में ठोस साक्ष्य के बिना आपराधिक मुकदमा चलाना आरोपी के उत्पीड़न के समान होगा. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित मामला और 22 जुलाई 2023 का आरोप पत्र पूरी तरह रद्द कर दिया.

बहरहाल, कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला सहमति और धोखे के बीच की महीन रेखा को स्पष्ट करता है. यह निर्णय बताता है कि हर असफल प्रेम संबंध को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता, जब तक कि स्पष्ट रूप से यह साबित न हो जाए कि शुरुआत से ही धोखाधड़ी का इरादा था. यह फैसला भविष्य के ऐसे मामलों के लिए एक अहम मिसाल के रूप में देखा जा रहा है.

Advertisement

यह भी पढ़ें

Advertisement

LIVE