‘2007 की तरह मिलेगा सम्मान...’, मायावती ने ब्राह्मणों को दिया बड़ा भरोसा, क्या फिर चलेगा 'सोशल इंजीनियरिंग' का दांव?
मायावती ने ब्राह्मण समाज से बसपा से मजबूती से जुड़े रहने की अपील की है. उनके इस कदम को 2007 की सोशल इंजीनियरिंग से जोड़कर देखा जा रहा है.
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उत्तर प्रदेश की सियासी गलियारों में जब भी बहुजन समाज पार्टी और उसकी प्रमुख मायावती का नाम आता है, तो एक वर्ग विशेष की राजनीति का आरोप अपने आप जुड़ जाता है. आम तौर पर यह कहा जाता है कि बीएसपी (BSP) सिर्फ दलित राजनीति तक सीमित रही है. लेकिन अगर बीते तीन दशकों की राजनीतिक यात्रा को गहराई से देखा जाए, तो यह धारणा पूरी तरह सही नहीं ठहरती. हकीकत यह है कि मायावती ने न केवल दलित समाज, बल्कि ब्राह्मण समाज को भी लगातार सम्मान, भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया है. बसपा प्रमुख मायावती (Mayawati) ने पार्टी में सर्वसमाज की भागीदारी और संगठन को मजबूत करने पर जोर देते हुए ब्राह्मण समाज से पार्टी से मजबूती के साथ जुड़े रहने की अपील की है. यही वजह है कि सूबे की सियासी जानकार मायावती के हालिया कदमों को 2007 की सोशल इंजीनियरिंग से जोड़कर देख रहे हैं.
बसपा के सिद्धांतों पर मायावती ने कही ये बात
मायावती ने शुक्रवार को अपने एक बयान में कहा कि बसपा ‘सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की नीतियों एवं सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी है और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष के बजाय संविधान की मूल भावना के अनुरूप सर्वसमाज के हित एवं कल्याण के लिए काम करना है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'जैसाकि सर्वविदित है कि बसपा 'सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय' की नीतियों एवं सिद्धांत पर चलने वाली विशिष्ट पहचान वाली पार्टी है, जो किसी भी समाज के व्यक्ति विशेष से ज्यादा, परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के पवित्र संविधान की सच्ची मंशा के मुताबिक, सर्वसमाज के हित व कल्याण के लिए समर्पित है और इसीलिए पार्टी में नेताओं की नहीं, बल्कि पूरे तन, मन, धन से समर्पित अम्बेडकरवादी कार्यकर्ताओं की ही फौज हर स्तर पर अधिकतर सक्रिय है. यही कांशीराम जी द्वारा पार्टी व मूवमेंट के हित में स्थापित परम्परा भी है.'
1. जैसाकि सर्वविदित है कि बी.एस.पी. ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की नीतियों एवं सिद्धान्त पर चलने वाली विशिष्ट पहचान वाली पार्टी है, जो किसी भी समाज के व्यक्ति विशेष से ज़्यादा, परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के पवित्र संविधान की सच्ची मंशा के मुताबिक़, सर्वसमाज के हित…
— Mayawati (@Mayawati) August 14, 2026
पार्टी छोड़ने वालों पर मायावती का निशाना
उन्होंने कहा कि पार्टी से निकाले गए अथवा निजी स्वार्थ के कारण दूसरी पार्टियों में गए लोगों का पार्टी के प्रति समर्पण सवालों के घेरे में रहा है. इसलिए ब्राह्मण समाज व अन्य सभी समाज के जो भी लोग अभी तक पार्टी से निकाले गए हैं या निकाले जा रहे हैं या वे अपने निजी स्वार्थ में दूसरी पार्टियों में चले गए हैं या फिर वे अपने ग़लत कारनामों की वजह से उनसे बचने के लिए खासकर सत्ताधारी पार्टी में शामिल हो गए हैं, तो उनका पार्टी के प्रति समर्पण भाव लोगों की निगाह में भी उनके कार्यों के ऑकलन के आधार पर काफी सशंकित व निराशाजनक बना रहा है.
निजी और पारिवारिक स्वार्थ को लेकर लगाया आरोप
बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि ऐसे लोगों ने पार्टी की सरकार के दौरान भी अपने निजी और पारिवारिक स्वार्थों को प्राथमिकता दी. उन्होंने कहा, 'खासकर बसपा सरकार के दौरान भी ऐसे लोगों ने अपने निजी व पारिवारिक स्वार्थ के लिए ही पार्टी से फायदा ज्यादा उठाया है, और अपने समाज व पार्टी के हित के लिए वे लोग अधिकतर निष्क्रिय व उदासीन ही बने रहे हैं. ऐसे लोगों के कारण पार्टी को चुनावों में नुकसान भी उठाना पड़ा.'
चुनावी नुकसान का भी किया जिक्र
मायावती ने आगे कहा, 'इन्हीं सब कारणों से उन लोगों ने अपने समाज को भी सही से बसपा में नहीं जोड़ा है, जो कि पार्टी की अपेक्षा के विरुद्ध इनका यह सब कृत्य होने की वजह से पिछले कई लोकसभा व विधानसभा आम चुनावों में पार्टी को काफी नुकसान भी उठाना पड़ा है, जो किसी से भी छिपा हुआ नहीं है. पार्टी में लंबे समय से ईमानदार, समर्पित और निष्ठावान वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा नए कर्मठ लोगों और विशेषकर युवाओं को तैयार करने का अभियान लगातार जारी है. पार्टी में लंबे अरसे से ईमानदार व हर मामले में पार्टी के प्रति लगातार समर्पित एवं निष्ठावान चले आ रहे पार्टी के वरिष्ठ लोगों द्वारा आए दिन नए कर्मठ व ईमानदार लोगों व खासकर युवाओं को पार्टी की नर्सरी में तैयार किया जाता रहा है, जो यह अभियान पूरी तरह से जारी है.'
पुराने कार्यकर्ताओं से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद
उन्होंने कहा कि नए और पुराने कार्यकर्ताओं से पार्टी को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. मायावती के मुताबिक, 'अब वे लोग काफी हद तक पार्टी की अपेक्षा के अनुसार जी-जान से लगातार लगे हुए हैं. पार्टी को पूरी उम्मीद है कि ये सभी नए व पुराने लोग हर मामले में ज्यादा बेहतर, साफ-सुथरे व मिशनरी मानसिकता के बनकर उभरेंगे और वे सच्चे अम्बेडकरवादी एवं संविधानवादी संघर्ष के भरपूर तौर पर काम आएंगे.'
ब्राह्मण समाज से मायावती ने की अपील
बसपा प्रमुख ने ब्राह्मण समाज से पार्टी के साथ मजबूती से जुड़े रहने की अपील करते हुए 2007 की तरह उचित राजनीतिक भागीदारी और सम्मान देने का भरोसा दिलाया. उन्होंने कहा, 'पार्टी खासकर ब्राह्मण समाज को यह भी विश्वास दिलाना चाहती है कि वे अपनी पूरी मजबूती के साथ पार्टी से जुड़े रहें और उन्हें हर चुनाव में उनकी तैयारी के आधार पर उनकी भागीदारी यानी चुनावी उम्मीदवार बनाने तथा सरकार बनने पर सन 2007 की तरह ही इनको व अन्य सभी समाज को भी पूरा-पूरा उचित मान-सम्मान जरूर दिया जाता रहेगा.'
दलित समाज की भूमिका को बताया अहम
मायावती ने कहा कि सर्वसमाज आधारित बसपा को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में दलित समाज की महत्वपूर्ण भूमिका होगी और सर्वसमाज आधारित ऐसी अपनी बसपा पार्टी को जमीनी स्तर पर तैयार करने के मामले में अब विशेषकर दलित समाज को ही अपनी अहम भूमिका निभानी है. उन्होंने सर्वसमाज की भागीदारी को पार्टी की ताकत बताते हुए कहा, 'वैसे बसपा की नर्सरी, सर्वसमाज के हसीन गुलदस्तों से ही, अधिकतर हरी-भरी व सजी रहती है.'
पार्टी के भीतर ब्राह्मणों को मिला सम्मान
मायावती के राजनीतिक फैसलों को देखें, तो यह साफ नजर आता है कि उन्होंने सिर्फ चुनावी समय पर नहीं, बल्कि संगठन के भीतर भी ब्राह्मण समाज को अहम स्थान दिया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण सतीश चंद्र मिश्रा हैं. ब्राह्मण समाज से आने वाले सतीश चंद्र मिश्रा को मायावती ने बीएसपी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया. पार्टी में उन्हें मायावती के बाद सबसे ताकतवर नेता माना जाता था. कार्यकर्ताओं के बीच यह आम धारणा थी कि मायावती के बाद अगर किसी का आदेश चलता है, तो वह सतीश चंद्र मिश्रा का है. इनके अलावा राकेश धर त्रिपाठी, नकुल दुबे, रंगनाथ मिश्रा जैसे तमाम दिग्गज नेता थे, जो पार्टी में ब्राह्मण समाज का प्रतिनिधित्व करते थे. इसके साथ ही मायावती ने ब्राह्मण भाईचारा समिति का गठन किया. इस समिति के जरिए ब्राह्मण समाज को संगठन से जोड़ने का काम किया गया. पार्टी के प्रवक्ता, संगठन सचिव और अन्य प्रमुख पदों पर ब्राह्मण नेताओं को जिम्मेदारी दी गई. यह सब महज दिखावे के लिए नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती के लिए किया गया कदम था.
कैसा रहा था 2007 का चुनाव ?
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2007 का विधानसभा चुनाव एक बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है. इसी चुनाव में मायावती ने अपनी चर्चित सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग किया. दलितों के साथ-साथ ब्राह्मणों को बड़ी संख्या में टिकट दिए गए. बीएसपी ने 2007 में 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा. यह अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संदेश था. इस चुनाव में बीएसपी के नारे भी बदले. पहले जहां पार्टी की पहचान सिर्फ दलितों की सियासत से जुड़ी मानी जाती थी, वहीं अब नए नारे सुनाई देने लगे. ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ और ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारों ने साफ कर दिया कि मायावती ब्राह्मण समाज को सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि सम्मानित भागीदार मान रही हैं.
क्या दोहराएगी 2007 की कहानी?
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बताते चलें कि सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मायावती एक बार फिर 2007 वाला फॉर्मूला दोहरा पाएंगी. राजनीतिक हालात बदले हैं, लेकिन मायावती का संदेश साफ है. वह खुद को फिर से एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में पेश कर रही हैं. ब्राह्मण समाज को दिया गया सम्मान और भागीदारी का भरोसा इसी रणनीति का अहम हिस्सा है.