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भगवान श्रीकृष्ण के अपमान पर चुप क्यों अखिलेश?

खुद को यदुवंशी कहने वाले सपा प्रमुख अखिलेश यादव की चुप्पी भगवान श्रीकृष्ण के अपमान पर समझ से पड़े है. मौलाना ने प्रभु श्रीकृष्ण पर विवादित बयान दिया, लेकिन मजाल है कि अखिलेश अपनी जुबान खोलें. खैर ये पहला मौका नहीं है. इससे पहले उन्होंने एक और मौलाना की ओर से डिंपल को लेकर की गई अभद्र टिप्पणी पर भी चुप्पी साध ली थी.

Akhilesh Yadav/ Image Source: IANS
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यूपी में इटावा के एक मौलाना ने सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पूरी समाजवादी पार्टी को न सिर्फ एक चुनौती दी है, बल्कि बुरी तरह से हिला डाला है. ये चुनौती यूपी के 12 फीसदी यादवों को भी है, जो चार दशकों से मुसलमानों के साथ गलबहियां डाले घूम रहे हैं. न सिर्फ घूम रहे हैं, बल्कि इस याराने से कई बार सत्ता के मज़े भी लूट चुके हैं.

इस मौलाना का नाम है मौलाना जर्जिस और इसने झारखंड की एक सभा में ये कह दिया कि भगवान श्रीकृष्ण पांच वक्त के नमाज़ी थे और उन्होंने गीता में बताया है कि नमाज अदा करनी चाहिए. वीडियो जून के महीने का है, जिसमें उसने अपनी तकरीर में कहा है कि गीता के छठे अध्याय के दसवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है कि जब ईश्वर की पूजा करो तो पूरे शरीर का योग करो. अब आइए वो श्लोक भी देख लेते हैं जिसका तिया-पांचा अपनी साज़िश से इस मौलवी ने किया है. श्लोक कुछ इस तरह है-

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः. एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ (१०)

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इसका भावार्थ है कि - मनुष्य को निरन्तर, मन सहित शरीर से किसी भी वस्तु के प्रति आकर्षित हुए बिना तथा किसी भी वस्तु का संग्रह किये बिना, परमात्मा के ध्यान में एक ही भाव से स्थित रहने वाला होना चाहिए. (१०)

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इस पूरे श्लोक में कहीं कोई ऐसा छुपा हुआ अर्थ नहीं है, जिससे ये साबित किया जा सके कि मौलाना के बयान में कोई सच्चाई है. यानी मौलाना कह रहा है कि हमारे आराध्य देव कहते हैं कि नमाज पढो. अब इस मौलाना पर हम और आप नाराज़ हो सकते हैं, लेख लिख सकते हैं, चौराहों-गलियों में बहस-मुबाहिसे में शामिल हो सकते हैं. लेकिन बहस का मुद्दा दरअसल कुछ और है. पहला तो ये कि इतनी विवादास्पद और अपमानजनक टिप्पणी इस देश में कोई कैसे कर सकता है, उसके पीछे कौन सी ताकत है जो उसे इस धृष्टता के लिए उकसाती है. उसने इस श्लोक का अर्थ किसी संस्कृत विद्वान से पूछा होता तो उस स्रोत का नाम बताना चाहिए था. नहीं बताया, मतलब अपने हिसाब से श्लोक का अर्थ निकाल कर इस्तेमाल कर लिया. यानी एक साज़िश के तहत उसने ऐसा किया.

दूसरी बात जो महत्वपूर्ण है, वो यह कि इस मौलाना के बारे में तो खबरें और लेख छपने लगे, लेकिन खुद को श्रीकृष्ण का वंशज कहलाने वाला यूपी, बिहार और झारखंड का यदुवंश कब जागेगा? क्या किसी यादव राजनेता ने इस पर आपत्ति जतायी? और सबसे बड़ी बात, यादवों की पार्टी मानी जाने वाली सपा और आरजेडी के किसी भी नेता ने क्या इस पर प्रतिक्रिया दी?  क्या समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने इस पर कोई प्रतिक्रिया दी.

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भगवान श्रीकृष्ण के अपमान पर सपा में सुनियोजित खामोशी!

समाजवादी पार्टी में कार्यकर्ता स्तर पर इस बात की चर्चा पिछले तीन दिन से है कि पार्टी आलाकमान को कब महसूस होगा कि उनका और उनके समाज का अपमान हो रहा है. इसका जवाब दिया जाना चाहिए. भगवान श्रीकृष्ण वैसे तो पूरे हिंदू समाज के आराध्य देव हैं, लेकिन यदुवंश का होने की वजह से एक उम्मीद ज़रूर थी कि समाजवादी पार्टी के किसी बड़े नेता की ओर से इस पर आपत्ति जताई जाती, कोई बयान आता. खासकर तब जबकि ये मौलाना इटावा से ही ताल्लुक रखता है और इटावा का तो रोम-रोम यादव परिवार के राजनैतिक अहसानों तले दबा हुआ है. कोई तो यादववीर आता और इस मौलाना का जवाब देता. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अखिलेश यादव या उनके परिवार से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. क्या अपने कुल और ईष्टदेव की मर्यादा तार-तार होते देख एक सामान्य सा बयान भी जारी नहीं कर सकते अखिलेश यादव?

मुस्लिम वोटों की खातिर अखिलेश ने साधी चुप्पी!

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ऐसे में या तो हम मान लें कि मुस्लिम वोटों की खातिर अखिलेश ने ये चुप्पी साधी है. वैसे भी उनकी पत्नी के बारे में अनर्गल प्रलाप एक मौलाना कर चुका है. तब भी अखिलेश चुप रहे. मुसलमानों के रहनुमा माने जाने वाले अखिलेश की पत्नी के बारे, जो कि एक सांसद भी हैं, कोई मुल्ला-मौलवी कुछ भी बोल कर बच निकले, इसकी क्या वजह हो सकती है. कौन सी मजबूरी है कि अखिलेश को भगवान श्रीकृष्ण का अपमान सहना पड़ रहा है. सूब के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने तो उन्हें पहले चैलेंज किया ही था कि असली भक्त हो तो मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर पर बोल कर दिखाओ. चलो मान लेते हैं कि मथुरा पर नहीं बोल सकते अखिलेश यादव, मुस्लिम वोट बैंक उनकी राजनीतिक मजबूरी हो सकती है. लेकिन ऐरा-गैरा कोई भी मुल्ला-मौलवी भगवान श्रीकृष्ण पर कुछ भी बोल कर चला जाए और अखिलेश अपने मुस्लिम वोट गिनते रहें, यह कहां तक ठीक कहा जा सकता है?    

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और सबसे बड़ी बात, क्या ये चुप्पी अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के राजनैतिक भविष्य के लिए ठीक है? जिस पार्टी ने अपनी जाति को उसका गौरव याद दिलाकर एकजुट किया, यादव-मुसलमान गठजोड़ बना कर सूबे में चार बार राज किया, देश की राजनीति में ताकत बनी, वो पार्टी अपनी उसी जाति और अपने आराध्य देव के अपमान का ज़हर क्यों पीती जा रही है, इस सवाल का जवाब अखिलेश को देना होगा, वरना तीसरा चुनाव लगातार हारने से उन्हें कोई रोक नही पाएगा. क्योंकि जनता एक ऐसे नेता को ही पसंद करती है, जो बेधड़क और निडर हो कर सच्ची बात बोले. अखिलेश को ये साबित करना बाकी है.

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