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KGMU के 'धर्मांतरण रैकेट' पर आई STF की रिपोर्ट, 12 महिला डॉक्टर-स्टाफ बने शिकार, प्रोफेसर्स से कर्मचारियों तक पर एक्शन के निर्देश
KGMU धर्मांतरण मामले में STF ने बड़ा खुलासा किया है. 10 महीने की जांच में करीब 12 महिला डॉक्टरों-स्टाफ के शोषण का मामला सामने आया है. प्रोफेसर्स से लेकर कर्मचारियों तक इस रैकट में शामिल थे. यूपी सरकार ने कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.
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लखनऊ के केजीएमयू (किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी) में धर्मांतरण, यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग कर धर्म परिवर्तन कराने के मामले में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की 10 महीने की गहन जांच में एक बहुत बड़ा खुलासा हुआ है. इस जांच में करीब 12 महिला डॉक्टरों और स्टाफ के शोषण और धर्मांतरण के गंभीर मामले सामने आए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में पैथोलॉजी के सीनियर रेजिडेंट डॉ. रमीज समेत 5 मुख्य आरोपी दोषी पाए गए हैं.
इतना ही नहीं, इस मामले में कुछ विभागाध्यक्षों पर गंभीर शिकायतों को दबाने और आरोपियों को संरक्षण देने के भी संगीन आरोप लगे हैं. इसके अलावा, एक 'इस्लामिक मेडिकोज' ग्रुप और बाहरी फंडिंग के संभावित कनेक्शन को लेकर भी जांच एजेंसियां लगातार अपनी कार्रवाई कर रही हैं.
जांच के दायरे में आए कई वरिष्ठ प्रोफेसर, डॉक्टर और कर्मचारी
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आपको बता दें कि लखनऊ के केजीएमयू में महिला डॉक्टरों के धर्मांतरण और उत्पीड़न के आरोपों की जांच का दायरा अब काफी बढ़ गया है. एसटीएफ की विस्तृत रिपोर्ट सामने आने के बाद, संस्थान के कई प्रोफेसर, डॉक्टर और अन्य कर्मचारी अब सीधे तौर पर जांच के दायरे में आ गए हैं.
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एसटीएफ की इस जांच रिपोर्ट ने कई फैकल्टी सदस्यों और कर्मचारियों के आचरण, उनकी कार्यशैली और संलिप्तता पर बेहद गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिनमें कुछ जाने-माने प्रोफेसर भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दोषी पाए गए हैं. रिपोर्ट में इन लोगों पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने, महिला डॉक्टरों को ब्लैकमेल करने, शिकायतकर्ताओं को मानसिक रूप से परेशान करने और मुख्य आरोपियों के खिलाफ आई शिकायतों को जानबूझकर दबाने की कोशिश करने जैसे संगीन आरोप लगाए गए हैं.
सरकार का कड़े रुख के बीच 6 सदस्यीय जांच समिति का KGMU करेगी गठन
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एसटीएफ के इन गंभीर निष्कर्षों के सामने आने के बाद, राज्य सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को रिपोर्ट में पहचाने गए सभी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं. इसके जवाब में, केजीएमयू की कार्यकारी परिषद इस पूरे मामले की गहन जांच के लिए एक छह सदस्यीय विशेष जांच समिति का गठन करेगी.
समिति में कौन-कौन होगा?
एक कुलपति (वाइस चांसलर)
एक रजिस्ट्रार
अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के एक शिक्षक
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) वर्ग के एक शिक्षक
कार्यकारी परिषद द्वारा नामित दो अन्य सदस्य
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विभिन्न विभागों में फैला था धर्मांतरण रैकेट का जाल
खबरों और एसटीएफ की जांच के अनुसार, विश्वविद्यालय के कई अहम विभागों के डॉक्टरों और कर्मचारियों की इस पूरे नेक्सस में संलिप्तता का पता चला है. रिपोर्ट में पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण विभागों के साथ-साथ गांधी वार्ड से जुड़ी शिकायतों और वहां हुए कदाचार का बहुत ही विस्तृत विवरण दिया गया है.
पैथोलॉजी विभाग के संदर्भ में, एसटीएफ ने विशेष रूप से कुछ वरिष्ठ फैकल्टी सदस्यों की संदिग्ध भूमिका पर सवाल उठाए हैं. इनमें विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश बाबू और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुमैरा कय्यूम का नाम शामिल है.
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विभागाध्यक्षों की भूमिका पर सवाल, कई हत्थे चढ़े!
रिपोर्ट में यह आरोप लगाया गया है कि इन अधिकारियों ने प्रभावित महिला डॉक्टरों द्वारा की गई शिकायतों को आगे बढ़ाने के बजाय उन्हें दबा दिया, आरोपियों का खुला या परोक्ष समर्थन किया, और उचित कार्रवाई सुनिश्चित करने के स्थान पर शिकायतकर्ताओं को ही मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का काम किया.
दो FIR से शुरू हुई थी जांच: सामने आए चौंकाने वाले सच
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यह पूरी जांच मूल रूप से लखनऊ के अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में दर्ज की गई दो एफआईआर पर आधारित थी. पहली एफआईआर 23 दिसंबर 2025 को चौक पुलिस स्टेशन में डॉ. रमीज मलिक के खिलाफ दर्ज की गई थी. यह गंभीर शिकायत पैथोलॉजी विभाग की ही रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. देवार्ती मित्रा ने हिम्मत दिखाते हुए दर्ज कराई थी.
दूसरी एफआईआर 29 दिसंबर 2025 को कैसरबाग पुलिस स्टेशन में रेजिडेंट डॉक्टर मोहम्मद आदिल के खिलाफ दर्ज की गई थी. यह मामला नर्सिंग स्टाफ की एक सदस्य माविया द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर पुलिस संज्ञान में आया था.
इन मामलों पर केजीएमयू प्रशासन का पक्ष रखते हुए, विश्वविद्यालय के प्रवक्ता के.के. सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय ने इन मामलों के संबंध में अपनी ओर से कार्रवाई की है और खुद भी जांच के दौरान कुछ अन्य घटनाओं को उजागर किया है.
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प्रवक्ता के.के. सिंह ने स्पष्ट किया, "दो मुख्य मामले सामने आए हैं. एक मामला रमीज से जुड़ा था और दूसरा नर्सिंग स्टाफ के एक सदस्य और एक बहुरूपिये से जुड़ा था. रमीज वाले मामले में शुरुआत में एक-दो दिन की थोड़ी देरी जरूर हुई थी, हालांकि बाकी दो मामलों का पता हमने खुद अपनी जांच में लगाया. यूनिवर्सिटी ने इनका पर्दाफाश किया और पूरी तरह से हमारी पहल पर ही इसमें शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई."
प्रेम जाल से लेकर शोषण तक, ब्लैकमेलिंग के जरिए बनाया जाता था धर्मांतरण का दबाव
एसटीएफ की विस्तृत रिपोर्ट में डॉ. सजीन के खिलाफ भी बेहद संगीन आरोप लगाए गए हैं. उन पर कई महिला डॉक्टरों के साथ जानबूझकर प्रेम संबंध बनाने और बाद में उन पर धर्म परिवर्तन करने के लिए भारी दबाव डालने का आरोप है.
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डॉ. देवारती मित्रा के अलावा, एसटीएफ की इस रिपोर्ट में इन आरोपों के संबंध में डॉ. मानसी सक्सेना, डॉ. कृतिका पांडे और डॉ. मुस्कान जैसी अन्य महिला डॉक्टरों का भी जिक्र है, जो इस रैकेट का शिकार हुई हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए डॉ. सजीन को इस साल 9 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था.
कई डॉक्टरों और कर्मचारियों पर गंभीर आरोप
जांच में सामने आया एक और चौंकाने वाला मामला ज्योति राव से जुड़ा है, जो केजीएमयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में एक संविदा कर्मचारी के तौर पर काम करती हैं.
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रिपोर्ट में यह आरोप लगाया गया है कि ज्योति ने शफात अली खान नाम के एक अन्य कर्मचारी के खिलाफ छेड़छाड़, लगातार पीछा करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने की गंभीर शिकायत दर्ज कराई थी. हालांकि, इतनी संगीन शिकायत के बावजूद खान के खिलाफ प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई. उल्टे, न्याय की मांग करने वाली ज्योति राव की संविदा सेवा को ही मनमाने तरीके से समाप्त कर दिया गया.
इसके अतिरिक्त, जांच में रेडियोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर रिजवान पर भी गंभीर आरोप लगे हैं. उन पर भी महिला डॉक्टरों को ब्लैकमेल करने और उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने का आरोप है.
शिकायत करने पर दी जाती थी धमकियां
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एसटीएफ की रिपोर्ट में यह भी सनसनीखेज दावा किया गया है कि जब पीड़ित महिलाओं ने हिम्मत जुटाकर शिकायत करने की कोशिश की, तो उन्हें चुप रहने और गंभीर परिणाम भुगतने की लगातार धमकियां दी गईं. इन धमकियों में करियर को बर्बाद करने और परीक्षाओं में जानबूझकर फेल करने जैसी बातें शामिल थीं.
नर्सिंग स्टाफ भी रैकेट का हिस्सा
रिपोर्ट में अस्पताल के गांधी वार्ड में तैनात नर्सिंग स्टाफ से जुड़े कई अन्य आरोपों का भी विस्तृत जिक्र है. नफीस नाम के एक नर्सिंग स्टाफ सदस्य पर आरोप है कि उसने ज्योति सिंह के साथ पहले प्रेम संबंध बनाए और बाद में उन पर धर्म परिवर्तन करके निकाह करने का भारी दबाव डाला.
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ठीक इसी पैटर्न पर, एक अन्य कर्मचारी फुरकान पर भी जागृति गुप्ता नाम की महिला को अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाने और निकाह करने के लिए मजबूर करने का आरोप है. ये सभी आरोप विश्वविद्यालय के कुछ कर्मचारियों की संदिग्ध गतिविधियों की व्यापक जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
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अधिकारियों, विभागों की भूमिका संदिग्ध!
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एसटीएफ की रिपोर्ट में केवल डॉक्टरों और कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि केजीएमयू के कई अन्य उच्चाधिकारियों और फैकल्टी सदस्यों के आचरण पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. इनमें वाइस-चांसलर के निजी सचिव एसएस अब्बास, विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. अब्बास अली मेहदी, प्रोफेसर उस्मान कौसर और बायोकेमिस्ट्री विभाग के कुछ फैकल्टी सदस्य शामिल हैं.
'इस्लामिक मेडिकोस' नेटवर्क और दूसरी जगह से फंडिंग का खुलासा!
रिपोर्ट के अनुसार, इन रसूखदार लोगों पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए आरोपों का सामना कर रहे कुछ आरोपी डॉक्टरों और कर्मचारियों को बचाया और विभागीय जांच के मामलों से जुड़े फैसलों को अनुचित रूप से प्रभावित किया. विश्वविद्यालय प्रशासन में शिकायतों से निपटने के लचर तरीके को लेकर हो रही जांच के तहत, अब इन सभी अधिकारियों की भूमिका भी जांच के कड़े दायरे में आ गई है.
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सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में 'इस्लामिक मेडिकोस' नामक एक संदिग्ध समूह का भी जिक्र किया है. एसटीएफ का साफ दावा है कि एसएमएससीआई आगरा और केजीएमयू से जुड़े कुछ पूर्व और वर्तमान मेडिकल छात्रों का एक सुनियोजित नेटवर्क यहां सक्रिय रूप से काम कर रहा था.
प्रोफेसर्स से लेकर स्टाफ तक के नाम शामिल!
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रिपोर्ट में कुछ संदेहास्पद डॉक्टरों के नामों और इस धर्मांतरण मामले के संबंध में उनके बीच हुई आपसी बातचीत का भी साक्ष्य के तौर पर उल्लेख है. एसटीएफ ने डॉ. सजीन से जुड़े उनके अन्य साथियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी सख्त विभागीय जांच की सिफारिश की है. इस संदर्भ में केजीएमयू में गठित विशाखा समिति की पूर्व जांच का भी हवाला दिया गया है, जिसने अपनी रिपोर्ट में डॉ. सजीन को उन आरोपों के मामले में दोषी पाया था, जिनकी अब एसटीएफ जांच कर रही थी.
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एसटीएफ की इस लंबी और विस्तृत जांच के नतीजों के आधार पर, राज्य सरकार ने अब विश्वविद्यालय प्रशासन को औपचारिक रूप से सख्त निर्देश दिया है कि वह रिपोर्ट में पहचाने गए सभी दोषियों और संदिग्धों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई शुरू करे. इसी क्रम में, 30 अक्टूबर को संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी ने केजीएमयू रजिस्ट्रार को एक आधिकारिक पत्र भेजा, जिसमें प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि वह तय नियमों के अनुसार संबंधित डॉक्टरों, प्रोफेसरों और अन्य कर्मचारियों के खिलाफ हर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करें.