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बंगाल में CM सुवेंदु ने काटी TMC की असली लाइफलाइन, कोलकाता नगर निगम भंग, ममता की पॉलिटिकल इकोनॉमी पर प्रहार

बंगाल में सरकार ने TMC द्वारा संचालित कोलकाता नगर निगम के बोर्ड को भंग कर दिया है और वर्तमान KMC आयुक्त स्मिता पांडे को प्रशासक नियुक्त किया है. KMC का भंग होना TMC की पॉलिटिकल इकोनॉमी पर एक तरह से बड़ी चोट है.

KMC Dissolved: Image Source/ IANS
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पश्चिम बंगाल में सत्ता से पहले ही बेदखल हो चुकी TMC को एक और बड़ा झटका लगा है. TMC के कार्यकर्ताओं को साधने और उन्हें सीधे तौर पर फायदा पहुंचाने के लिए जाने-जाने वाले कोलकाता नगर निगम को भंग कर दिया गया है और केएमसी बोर्ड के लिए एक प्रशासक की नियुक्ति कर दी गई है. यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब पार्टी पहले ही टूट का शिकार है, सरकार चली गई है और बजट के लिहाज से अति-महत्वपूर्ण KMC का भी हाथ से निकल जाना किसी सदमे से कम नहीं है.

कोलकत्ता नगर निगम बोर्ड भंग

आपको बताएं कि राज्य के नगर निगम विभाग ने एक अधिसूचना जारी कर कहा कि केएमसी अधिनियम, 1980 की धारा 117 की उपधारा (I) के तहत निगम के बोर्ड को भंग कर दिया गया है. अधिसूचना में आगे कहा गया है कि वर्तमान बोर्ड के भंग होने के बाद निगम के सभी सदस्य, महापौर-परिषद (एमएमआईसी) के सदस्य और अधिनियम के तहत गठित निगम की किसी भी समिति के सदस्य (महापौर और अध्यक्ष भी शामिल) अपना पद छोड़ देंगे.

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KMC बोर्ड के लिए प्रशासन नियुक्त

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अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान बोर्ड के भंग होने के बाद राज्य सरकार के निर्देशों के अधीन, सभी शक्तियां और कर्तव्य ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा प्रयोग या निष्पादित किए जाएंगे जिन्हें सरकार नियुक्त करे. बोर्ड को भंग करने की कार्रवाई ऐसे वक्त में हुई है जब पिछले सप्ताह, केएमसी के पूर्व महापौर और पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री फिरहाद हकीम ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

ममता की आंख-कान थे फिरहाद हकीम

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फिरहाद हकीम को पूर्व सीएम ममता बनर्जी का करीबी और नाक-आंख-कान माना जाता था. उन्हें TMC में अनौपचारिक तौर पर अभिषेक बनर्जी के बाद नंबर 2 भी माना जाता था. इतना ही नहीं, KMC के जरिए शहरी मतदाताओं, पार्टी कार्यकर्ताओं, अल्पसंख्यकों आदि पर कंट्रोल फिरहाद हकीम ही किया करते थे. इसके बाद, राज्य नगर निगम विभाग और केएमसी की पूर्व अध्यक्ष माला रॉय के बीच बोर्ड के विघटन को लेकर कानूनी विवाद शुरू हो गया.

राज्य सरकार ने केएमसी अधिनियम की धारा 117 (I) के तहत विघटन का तर्क दिया, जो सरकार को निगम के बोर्ड को भंग करने का अधिकार देती है. जबकि रॉय ने इसी अधिनियम की धारा 28 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि मौजूदा पार्षदों में से नए महापौर के चुने जाने तक उप महापौर कार्यभार संभालेंगे.

अंततः, सोमवार को राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर तृणमूल कांग्रेस बोर्ड को भंग करने की घोषणा की और पांडे को अधिकतम छह महीने की अवधि के लिए या नव निर्वाचित पार्षदों के कार्यभार संभालने तक प्रशासक नियुक्त कर दिया.

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2010 से KMC की सत्ता में थी TMC

तृणमूल कांग्रेस के पास कोलकाता नगर निगम में भारी बहुमत था. 144 सदस्यीय निगम में तृणमूल कांग्रेस के 136 पार्षद थे. कोलकाता नगर निगम पर 2010 से तृणमूल कांग्रेस का नियंत्रण था. इसके एक वर्ष बाद ममता बनर्जी ने राज्य में 34 वर्षों के वाम शासन का अंत किया था.

केएमसी TMC की लाइफलाइन थी, जिसे काट दी गई है!

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आपको बताएं कि कोलकाता नगर निगम (KMC) का बजट और TMC की 'टोलाबाजी' वाली राजनीति में इसकी अहमियत काफी बड़ी है. इसे टीएमसी की असली संजीवनी और लाइफलाइन माना जाता है. 2025-26 में KMC की अनुमानित आय 5,524 करोड़ रुपये के आसपास थी जबकि खर्च 5,639 करोड़ रुपये रहा, जिससे करीब 115 करोड़ रुपये का घाटा हुआ. यह निगम 45 लाख से ज्यादा आबादी को रोड, ड्रेनेज, सफाई, स्वास्थ्य, बस्ती विकास और स्कूल जैसी सेवाएं देता है.

TMC के लिए पॉलिटिकल इकोनॉमी के लिए बहुत जरूरी थी KMC की सत्ता!

कहा जाता है कि TMC के लिए KMC सिर्फ एक नगर निगम नहीं, बल्कि पावर सेंटर, पैसे का स्रोत और कैडर भर्ती का बड़ा हथियार रहा है. 2010 से TMC के कब्जे में आने के बाद यह पार्टी की शहरी ताकत का मुख्य आधार बना. बजट के जरिए लाखों-करोड़ों के कॉन्ट्रैक्ट, स्कीम्स (जैसे लक्ष्मीर भंडार, दुआरे सरकार, काउंसलर एलाका उन्नयन प्रकल्प) और नौकरियां पार्टी को वोट बैंक (माइनॉरिटी, बस्ती और मजदूर वर्ग) से जोड़े रखने में मदद करती थीं.

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KMC के जरिए कैडर और क्लब को साधती थी TMC

घाटे वाला बजट भी TMC को “विकास” का चेहरा दिखाने और राजनीतिक फायदे उठाने का मौका देता था. TMC केएमसी के जरिए अपने कैडर को खूब नवाजती थी. सफाई, रोड निर्माण, ड्रेनेज और वॉटर प्रोजेक्ट्स जैसे कामों के बड़े कॉन्ट्रैक्ट पार्टी के लोकल लीडर्स, कैडर और करीबी ठेकेदारों को दिए जाते थे, जिससे “कट मनी” और फंडिंग का सिलसिला चलता रहता था. हजारों मजदूरों को कॉन्ट्रैक्ट, कैजुअल या शॉर्ट-टर्म जॉब्स पर रखा जाता था. त्योहारों पर एक्स-ग्रेशिया, पेंशन जैसे फायदे देकर उनकी वफादारी खरीदी जाती थी. हर काउंसलर को एलाका उन्नयन प्रकल्प के तहत 30 लाख रुपये और अन्य स्कीम्स के तहत फंड मिलता था, जो लोकल क्लबों, कार्यकर्ताओं और प्रभावशाली लोगों को काम-रोटी देने का जरिया बनता था.

स्वास्थ्य केंद्र, पार्क, मार्केट और लाइटिंग प्रोजेक्ट्स में भी अपॉइंटमेंट और ट्रांसफर का पूरा कंट्रोल पार्टी के हाथ में रहता था. इस पूरे सिस्टम पर फिरहाद हकीम का मजबूत कंट्रोल था. 2018 से 2026 तक मेयर के रूप में उन्होंने बजट पेश करने से लेकर पर्सनल (Personnel) और पॉलिटिकल अपॉइंटमेंट तक सब कुछ संभाला. मिनिस्टर और मेयर दोनों पद संभालकर उन्होंने KMC को TMC का “फैमिली बिजनेस” जैसा बना दिया था.

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विपक्षा KMC को TMC का ATM बतता है!

TMC की इस व्यवस्था पर अब विपक्ष और आम लोग तंज कसते हैं. राजनीतिक पंचलाइन यह बन गई है कि “KMC, TMC का ATM और कैडर नर्सरी है, बजट से पैसा, कॉन्ट्रैक्ट से कमाई, जॉब्स से वोट. घाटा बढ़ता गया लेकिन पार्टी का कैडर वेलफेयर फलता-फूलता रहा.”

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2026 के बाद TMC की हार और फिरहाद हकीम के इस्तीफे के साथ यह सिस्टम अब डिस्टर्ब हो रहा है और नई सरकार KMC को एडमिनिस्ट्रेटर के अधीन करने की कोशिश कर सकती है. कुल मिलाकर KMC, TMC के लिए सिर्फ सिविक बॉडी नहीं, बल्कि पॉलिटिकल इकोनॉमी का सबसे बड़ा इंजन था. ऐसे में सीएम सुवेंदु अधिकारी द्वारा इसे भंग करना मानो ऐसा है जैसे किसी की असली नस ही काट दी गई हो.

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