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‘मेलोडी खिलाकर', इटली की स्कूलों में बैन हुआ बुर्का-हिजाब तो भारत में भड़की AIMIM, PM का नाम लेकर मेलोनी पर कसा तंज
वारिस पठान ने PM जॉर्जिया मेलोनी पर बड़ा तंज कसा है. उन्होंने मेलोनी के बहाने PM मोदी को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया और कहा कि यह संगत का असर है.
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इटली में बुर्का और चेहरा ढककर स्कूल आने पर प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने लगाम लगा दिया है. PM मेलोनी स्कूलों में नए नियम ला रही हैं जिसके तहत स्कूल में छात्राएं चेहरा ढककर नहीं आ सकेंगी. इस फैसले का इटली में विरोध हो न हो, भारत में कुछ नेता जरूर ऐतराज जता रहे हैं. इस लिस्ट में AIMIM नेता वारिस पठान का नाम भी है.
इटली में बुर्का और हिजाब पर पाबंदी को लेकर AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने PM जॉर्जिया मेलोनी पर बड़ा तंज कसा है. उन्होंने मेलोनी के बहाने PM मोदी को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया. वारिस पठान ने कहा, ‘मोदी जी ने जब मेलोनी को मेलोडी खिलाई होगी, तब कहा होगा- देखो मेलोनी मैंने तो भारत के मुसलमानों के साथ कितना कर दिया, उनकी मस्जिदों को मैं उखाड़ देता हूं, उनके मदरसों को उखाड़ देता हूं, मैंने तो मुसलमानों के खिलाफ जंग जैसी छेड़ी है. मैनें तो भारत के मुसलमानों के साथ कितना कर दिया. आप क्या कर रहे हो? तो मेलोनी ने भी हिजाब और बुर्के पर पाबंदी लगा दी.’
वारिस पठान ने बताया नफरती फैसला
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वारिस पठान ने मेलोनी के इस फैसले को PM मोदी की संगत का असर बताया. उन्होंने कहा, ये फ्रीडम ऑफ चॉइस है आप कौन होते हैं प्रतिबंध लगाने वाले? ये दर्शाता है कि कितनी नफरत है ये दिखाता है कैसी संगत है, उसका असर है. वे आगे कहते हैं, मेलोनी को शायद पसंद नहीं कि कोई महिला अपने आप को कवर करे. ये नफरत के सिवा कुछ नहीं. AIMIM प्रवक्ता ने इटली की स्कूलों में हिजाब-बुर्का बैन को गलत ठहराया.
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मौलाना ने भी उठाए सवाल
इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी के बुर्का-हिजाब बैन के फैसलों पर मौलानाओं ने भी आपत्ति जताई. मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है. जबकि ये देश दावा करता है कि वह अपने यहां हर नागरिक को हर तरह की फ्रीडम देता है. रशीद फिरंगी महली ने कहा- एक उदाहरण से साबित हो गया कि यूरोपीय देश कैसे ढोंग और दिखावा करता है.
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यूरोप के कई देशों में बुर्का-हिजाब बैन
इटली भी यूरोप के उन देशों की फेहरिस्त में शुमार होने को तैयार है जहां बुर्के पर बैन है. प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने स्कूलों में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी की घोषणा कर दी है. इसके साथ ही सरकार हर कक्षा में विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने और देश की संस्कृति को सीखने या समझने में समस्या का सामना कर रहे विदेशी छात्रों के अभिभावकों के लिए इतालवी भाषा सीखना अनिवार्य करने की योजना बना रही है.
मेलोनी ने रविवार को अपनी पार्टी ‘ब्रदर्स ऑफ इटली’ के युवा संगठन के एक कार्यक्रम में इसका ऐलान किया. प्रस्तावित नियम विशेष रूप से स्कूलों में पूरे चेहरे को ढकने वाले परिधानों पर रोक से जुड़े हैं. बुर्का और नकाब में चेहरा ढका रहता है, जबकि हिजाब में आम तौर पर सिर और गर्दन ढके होते हैं, लेकिन चेहरा खुला रहता है. मेलोनी की घोषणा में बुर्का और नकाब का उल्लेख किया गया है. हालांकि, बुर्का या नकाब पर केवल इटली की स्कूलों में प्रतिबंध लगाया जाएगा. सार्वजनिक तौर पर महिलाएं बुर्का पहन सकेंगी.
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यूरोप के कई देशों में सार्वजनिक स्थानों पर पूरे चेहरे को ढकने वाले परिधानों पर अलग-अलग स्तर की पाबंदियां लागू हैं.
फ्रांस ने अप्रैल 2011 में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने पर व्यापक प्रतिबंध लगाया था.
बेल्जियम ने भी 2011 में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे को पूरी तरह से ढकने पर बैन लगाया.
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बुल्गारिया में 2016 से सरकारी, प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों में फुल फेस वेल पर प्रतिबंध है.
ऑस्ट्रिया में 2017 से सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लागू है. इसके अलावा सितंबर 2026 से 14 वर्ष तक की छात्राओं के लिए स्कूलों में इस्लामी परंपरा के अनुसार सिर ढकने वाले कुछ परिधानों पर भी नया प्रतिबंध लागू हुआ है.
डेनमार्क ने 2018 में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले परिधानों पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाया. नीदरलैंड्स ने 2019 से आंशिक प्रतिबंध लागू किया, जो स्कूलों, अस्पतालों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन जैसे स्थानों पर लागू होता है.
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स्विट्जरलैंड में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने पर संघीय प्रतिबंध 2023 में लागू हुआ.
पुर्तगाल ने अगस्त 2026 में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे को ढकने पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लागू किया.
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यूरोप के कई देशों में चेहरा ढकने पर बैन है लेकिन नियमों की यह तस्वीर एक जैसी नहीं है. कहीं पूरे सार्वजनिक क्षेत्र में चेहरा ढकने पर रोक है, तो कहीं प्रतिबंध स्कूल, अस्पताल, सरकारी संस्थानों या सार्वजनिक परिवहन तक सीमित हैं. कुछ देशों में धार्मिक पोशाक को लेकर व्यापक संवैधानिक संरक्षण भी मौजूद है.