जिस पर देशकरता है भरोसा
Advertisement

कहां है जंगलों के बीच स्थित ये चमत्कारी मंदिर, जहां दिन में तीन बार बदलता है देवी की मूर्ति का रंग, होती है हर मन्नत पूरी

इस मंदिर की सबसे रहस्यमय बात यह बताई जाती है कि यहां स्थापित माता की मूर्ति का रंग दिन में तीन बार बदलता है. सुबह, दोपहर और शाम के समय मूर्ति का रंग अलग-अलग दिखाई देता है. भक्त इसे माता की दिव्य शक्ति और जीवंत उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं.

कहां है जंगलों के बीच स्थित ये चमत्कारी मंदिर, जहां दिन में तीन बार बदलता है देवी की मूर्ति का रंग, होती है हर मन्नत पूरी
Advertisement

उत्तराखंड की वादियां हमेशा से अपनी प्राकृतिक सुंदरता और रहस्यमयी धार्मिक स्थलों के लिए जानी जाती हैं. इन्हीं पहाड़ों के बीच अल्मोड़ा जिले के शीतलाखेत के पास स्थित एक बेहद प्राचीन और चमत्कारी मंदिर है स्याही देवी मंदिर, जिसे कई लोग शाही देवी मंदिर के नाम से भी जानते हैं. 

ये मंदिर केवल एक ही रात में बन गया था

इस मंदिर के बारे में कई रोचक मान्यताएं और लोककथाएं प्रचलित हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कत्युरी शासनकाल में हुआ था और इसकी प्राचीनता लगभग 900 से 1700 वर्ष के बीच मानी जाती है. स्थानीय लोगों की मानें तो यह मंदिर केवल एक ही रात में बन गया था. कथा के अनुसार, मंदिर निर्माण के लिए गांववालों ने ईंटें तैयार की थीं, लेकिन उस रात तेज बारिश होने के बावजूद अगली सुबह जब लोग वहां पहुंचे तो ईंटें पूरी तरह पकी हुई मिलीं. इतना ही नहीं, मंदिर को जोड़ने के लिए चूने या सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया था, बल्कि बेल और गुड़ के मिश्रण से इसे जोड़ा गया था.

Advertisement

सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत होती है पूरी

स्याही देवी को आसपास के लगभग 52 गांवों की इष्ट देवी माना जाता है. उत्तराखंड के कई परिवार इन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत जरूर पूरी होती है. यही वजह है कि दूर-दूर से श्रद्धालु इस मंदिर में माता के दर्शन करने और अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं. नवरात्रि के समय तो यहां विशेष पूजा-अर्चना और भक्ति का माहौल देखने को मिलता है. 

दिन में तीन बार बदलता है देवी की मूर्ति का रंग

Advertisement

इस मंदिर की सबसे रहस्यमय बात यह बताई जाती है कि यहां स्थापित माता की मूर्ति का रंग दिन में तीन बार बदलता है. सुबह, दोपहर और शाम के समय मूर्ति का रंग अलग-अलग दिखाई देता है. भक्त इसे माता की दिव्य शक्ति और जीवंत उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं.

1898 में स्वामी विवेकानंद भी यहां आए थे 

माना जाता है कि वर्ष 1898 में स्वामी विवेकानंद भी यहां आए थे और उन्होंने इस पवित्र स्थान पर ध्यान व साधना की थी. इसी वजह से यह मंदिर कई संतों और साधकों की तपस्थली के रूप में भी प्रसिद्ध हो गया.

Advertisement

मंदिर के आसपास का प्राकृतिक वातावरण भी बेहद आकर्षक है

यह भी पढ़ें

मंदिर के आसपास का प्राकृतिक वातावरण भी बेहद आकर्षक है. चारों ओर फैले घने देवदार और बांज के जंगल, शुद्ध पहाड़ी हवा और दूर-दूर तक दिखाई देती हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां यहां आने वाले हर व्यक्ति को सुकून और शांति का अनुभव कराती हैं. मंदिर के पास पेड़ों का एक ऐसा प्राकृतिक समूह है जो देखने में शेर की आकृति जैसा लगता है.

Tags

Advertisement
टिप्पणियाँ 0
G
Guest (अतिथि)
LIVE
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें