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कहा है नागराज मंदिर? यहां भक्तों को प्रसाद में मिलती है जादुई रेत, दर्शन मात्र से दूर होता है काल सर्प दोष

नागपंचमी और आयुल्या पूजा के उत्सव पर मंदिर में बेहद भीड़ होती है. नागपंचमी के लिए मंदिर के मुख्य देवता नागराज को दूध अर्पित किया जाता है और घर की सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है.

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भारत की हर दिशा में 33 कोटि देवी-देवताओं के निवास स्थान और चमत्कारों से भरे मंदिर देखने को मिल जाएंगे. उत्तर से लेकर दक्षिण में जहां भगवान भोलेनाथ के अलग-अलग मंदिर और ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं, वहीं नागराज के मंदिर भी देखने को मिल जाते हैं. जहां भक्त काल सर्प दोष से मुक्ति पाने के लिए आते हैं, लेकिन हम कन्याकुमारी के ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां भक्तों को प्रसाद के रूप में रेत दिया जाता है. 

किसको समर्पित है ये मंदिर 

तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में लगभग 20 किमी दूर नागरकोइल शहर में बना नागराज का मंदिर नाग राजा वासुकी को समर्पित है. मंदिर की खास बात यह है कि मंदिर बहुत समृद्ध है, लेकिन आज भी इसके गर्भगृह की छत घास, भूसे और ताड़ के पत्तों से बनी है. ऐसा माना जाता है कि जब भी इस छत को स्थायी बनाने या सोने से ढकने का प्रयास किया गया, तो सर्प देवता स्वप्न में प्रकट होकर इसे रोक देते थे या फिर कार्य में कोई बाधा उत्पन्न हो जाती था. 

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मंदिर की तरफ से प्रसाद में क्यों रेत दिया जाता है

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स्थानीय लोगों का मानना है कि नागदेवता को प्रकृति और सादगी से प्रेम है और यही कारण है कि उन्हें घास, भूसे और ताड़ से बनी छत पसंद है. मंदिर का गर्भगृह भी काफी मंदिरों से अलग है. मंदिर के गर्भगृह में नाग राजा वासुकी की प्रतिमा के पास रेत रखा होता है, जो उन्हें ठंडक प्रदान करता है. दर्शन करने आने वाले भक्तों को भी मंदिर की तरफ से प्रसाद में रेत दिया जाता है. स्थानीय लोक मान्यताओं की मानें तो रेत को शरीर पर मलने से त्वचा रोगों से राहत मिलती है.

मंदिर में किस-किस भगवान की मूर्तियां हैं

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मंदिर की वास्तुकला की बात करें तो यह बाकी मंदिरों से अनोखी और सादगी से भरी है क्योंकि इसका मुख्य प्रवेश द्वार, जिसे महामेरु मलिगई कहा जाता है, एक बौद्ध विहार जैसा दिखता है. मंदिर का मुख पूर्व दिशा की ओर है, लेकिन श्रद्धालु दक्षिण दिशा से प्रवेश करते हैं. मंदिर के मुख्य देवता नागराज, पांच सिर वाले सर्प हैं. मंदिर में भगवान अनंतकृष्णन, शिव, मुरुगन और दुर्गा की मूर्तियां भी हैं, लेकिन मंदिर का मुख्य गर्भगृह मिट्टी का बना एक घर है, जिसकी छत घास-फूस की है.

मंदिर के पुजारी को क्यों हमेशा एक सांप दर्शन जरूर देता है

तमिल माह आषाढ़ के दौरान हर साल इस घास-फूस की छत को बदला जाता है. माना जाता है कि जब भी गर्भगृह की छत को बदलने का कार्य किया जाता है तो मंदिर के पुजारी को हमेशा एक सांप दर्शन जरूर देता है. इनके अलावा, एक अलग गर्भगृह भी है जहां सैकड़ों सांपों की मूर्तियां स्थापित हैं. ऐसा माना जाता है कि ये सांप मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र की रक्षा करते हैं.

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कब मंदिर में बेहद भीड़ होती है

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नागपंचमी और आयुल्या पूजा के उत्सव पर मंदिर में बेहद भीड़ होती है. नागपंचमी के लिए मंदिर के मुख्य देवता नागराज को दूध अर्पित किया जाता है और घर की सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है. नागराज की पूजा के अलावा, मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा की भी पूजा की जाती है, जो भगवान शिव से ही नागदेवता का अस्तित्व है. 

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