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कहा हैं खल्लारी माता मंदिर, निसंतान दंपति की झोली भरती है मां, महाभारत काल से जुड़ा है इतिहास

महासमुन्द से 25 किमी दक्षिण की ओर खल्लारी गांव की पहाड़ी के शीर्ष पर मां का मंदिर है. पहाड़ पर होने की वजह से भक्तों को मां के दर्शन के लिए कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है, हालांकि अब रोप-वे की सुविधा उपलब्ध है. मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 800 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर जाना होता है.

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देशभर में कई शक्तिपीठ और सिद्धपीठ मां जगदम्बा के मंदिर के रूप में मौजूद हैं, जहां भक्त अपने कष्टों से मुक्ति के लिए आते हैं. छत्तीसगढ़ के महासमुन्द की पहाड़ी पर ऐसा प्रसिद्ध और चमत्कारी मंदिर है, जहां निसंतान दंपति को संतान सुख मिलता है. इस मंदिर का जुड़ाव महाभारत काल से है और आज भी मंदिर के आसपास पराक्रमी भीम के होने के चिन्ह मौजूद हैं.  हम बात कर रहे हैं खल्‍लारी माता मंदिर की. 

मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं?

महासमुन्द से 25 किमी दक्षिण की ओर खल्लारी गांव की पहाड़ी के शीर्ष पर मां का मंदिर है. पहाड़ पर होने की वजह से भक्तों को मां के दर्शन के लिए कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है, हालांकि अब रोप-वे की सुविधा उपलब्ध है. मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 800 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर जाना होता है. मंदिर तक पहुंचने का रास्ता प्राकृतिक नजारे से भरा है. पहाड़ पर होने के कारण मंदिर के आसपास का नजारा मन को मोह लेने वाला है.

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महाभारत काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

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इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है. पौराणिक कथाओं की मानें तो इसी स्थान पर भीम ने हिडिंब का वध किया था और माता कुंती के कहने पर राक्षस हिडिंब की बहन हिडिंबा से विवाह किया था. 

पहाड़ी के पास ही भीम चूल्हा और भीम की नाव भी मौजूद है

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इसी जगह पर भीम ने अज्ञातवास में कई दिनों तक विश्राम भी किया था. इसके साक्ष्य आज भी मंदिर की पहाड़ी पर मौजूद हैं. पहाड़ी की चोटी पर भीम के विशाल पदचिन्ह हैं. इसके अलावा पहाड़ी के पास ही भीम चूल्हा और भीम की नाव भी मौजूद है. यही कारण है कि इस स्थान को भीम खोज के नाम से भी जाना जाता है.

मंदिर को लेकर क्या है पौराणिक कथा?

खल्लारी दशकों पहले हैहयवंश के राजा ब्रह्मदेव की राजधानी थी. उन्होंने ही मंदिर के निर्माण कार्य शुरू करवाया था. मंदिर की पौराणिक कथा की बात करें तो स्थानीय लोगों का मानना है कि मां जगदम्बा कन्या रूप में खल्लारी में लगने वाले बाजार में विचरण करने आती थीं. एक दिन एक बंजारा मां की सुंदरता पर मोहित हो उठा और उनके पीछे-पीछे पहाड़ की चोटी तक पहुंच गया. मां ने क्रोधित होकर बंजारे को पत्थर बना दिया और पहाड़ी पर खल्लारी मां के नाम से विराजमान हुईं. 

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कब होता है यहां मेले का आयोजन

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प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ इस दुर्गम पहाड़ी पर स्थित मंदिर में दर्शन के लिए आती है. हर साल चैत्र मास की पूर्णिमा के अवसर पर वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है. 

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