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पांडवों के छल और पश्चाताप से जुड़ा है केदारनाथ मंदिर का पौराणिक इतिहास, यहां स्थित त्रिकोणीय शिवलिंग 'स्वयंभू' है

: केदारनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसकी महिमा का बखान कर पाना मुश्किल है. मंदिर में भगवान शिव शिवलिंग के रूप में नहीं बल्कि एक त्रिकोणीय विशाल पत्थर के रूप में मौजूद हैं, जिसका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है.

Image Credits: kedarnath temple/X/Pushkar Singh Dhami
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छह माह के इंतजार के बाद बुधवार को वैदिक मंत्रोच्चार के साथ केदारनाथ मंदिर के कपाट खोल दिए गए हैं. भक्त और चार धाम यात्रा पर निकले श्रद्धालु अब बाबा केदार के दर्शन आने वाले 6 महीनों तक कर पाएंगे.

मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है

केदारनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसकी महिमा का बखान कर पाना मुश्किल है. मंदिर में भगवान शिव शिवलिंग के रूप में नहीं बल्कि एक त्रिकोणीय विशाल पत्थर के रूप में मौजूद हैं, जिसका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है. 

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मंदिर की नींव पांच पांडवों ने रखी थी

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केदारनाथ मंदिर की उत्पत्ति को लेकर कई कहानियां हैं, जो भक्तों को बाबा की असीम भक्ति से जोड़ती हैं. पौराणिक कथाओं की मानें तो मंदिर की नींव पांच पांडवों ने रखी थी, जो पहले भगवान शिव की खोज में दर-दर भटके थे. माना जाता है कि महाभारत के भीषण युद्ध के बाद पांच पांडव और भगवान श्री कृष्ण युद्ध में हुई जनहानि का समीक्षा कर रहे थे. महाभारत के रण में कई हजार सैनिकों ने अपनी जान गंवा दी और दोनों पक्षों के परिवार के लोग भी मौजूद थे. ऐसे में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि भले ही युद्ध धर्म के लिए लड़ा गया लेकिन पापों का भुगतान तो सभी को करना होगा और मुक्ति सिर्फ भगवान शिव ही दिला सकते हैं. 

युधिष्ठिर को क्या आभास हुआ

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वहीं भगवान शिव पांचों पांडवों से नाराज थे क्योंकि उन्होंने युद्ध को जीतने के लिए छल का सहारा लिया और इसमें कई बेगुनाहों का खून बहा. श्री कृष्ण के कहने पर पांचों पांडव और द्रौपदी भगवान शिव की खोज में देश के कई हिस्सों में जाते हैं. वे काशी जाते हैं, जहां से भगवान शिव अंतरध्यान हो जाते हैं, जिसके बाद उन्हें महसूस होता है कि भगवान शिव ने पहाड़ों में स्थान लिया है और वे उनकी खोज में पहाड़ों पर पहुंच जाते हैं. तभी युधिष्ठिर को आभास होता है कि भगवान शिव क्रोधित हैं और उन्हें दर्शन न देने पड़े, इसलिए छिप रहे हैं. 

भगवान शिव ने पांचों पांडवों और द्रौपदी को पापों से मुक्त किया था

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माना जाता है कि भगवान शिव ने बैल का रूप लेकर पांडवों पर हमला किया था और भीम भी समझ गए थे कि यह कोई साधारण बैल नहीं है. उन्होंने बैल को कुबड़ से पकड़ने की कोशिश की और तभी भगवान शिव अंतरध्यान हो गए और बैल का ऊपरी हिस्सा त्रिकोणीय शिवलिंग में परिवर्तित हो गया. पाडंवों ने केदारनाथ में बाबा को स्थापित किया और उनकी घोर तपस्या की. तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पांचों पांडवों और द्रौपदी को पापों से मुक्त किया था. यहीं से भगवान शिव ने पांडवों को स्वर्ग जाने का रास्ता दिखाया था. 

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