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52 गढ़ों में से एक है पौड़ी का भैरव गढ़ी मंदिर, गोरखाओं को भी झेलनी पड़ी थी हार, यहां आने वाले भक्तों की हर मनोकामना होती है पूरी
'भैरव गढ़ी मंदिर' गढ़वाल के 52 गढ़ों (किलों) में से एक (लंगूर गढ़) माना जाता है. इतिहास के अनुसार, 18वीं शताब्दी के अंत (लगभग 1791) और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में जब नेपाल के गोरखाओं ने गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों पर आक्रमण किया, तो उन्होंने इस सामरिक रूप से महत्वपूर्ण लंगूरगढ़ को जीतने के लिए लगभग दो वर्षों तक घेराबंदी की थी.
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उत्तराखंड की गढ़वाल संस्कृति अपने प्राचीन मंदिरों और किलों को लेकर महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इन्ही में से एक पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गांव में स्थित 'भैरव गढ़ी मंदिर' अपने इतिहास और प्राकृतिक महत्व के लिए खास स्थान रखता है.
इस मंदिर का इतिहास गढ़वाल के राजाओं से जुड़ा है
कहा जाता है कि इस मंदिर का इतिहास गढ़वाल के राजाओं से जुड़ा है और यहां आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मंदिर में सभी को आने की अपील की.
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‘भगवान भैरव को गढ़वाल का रक्षक माना जाता है’
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उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का विशेष वीडियो पोस्ट कर लिखा, "पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गांव में मौजूद भैरव गढ़ी मंदिर, कुदरती खूबसूरती से भरे पहाड़ों के बीच है. भगवान भैरव को गढ़वाल का रक्षक माना जाता है. पौड़ी गढ़वाल जिले में आने पर, इस पवित्र मंदिर के दर्शन जरूर करें."
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गांव में स्थित भैरव गढ़ी मंदिर (जिसे लंगूर गढ़ी भी कहा जाता है) समुद्र तल से लगभग 2,400 मीटर (9,000 फीट) की ऊंचाई पर एक खूबसूरत पहाड़ी चोटी पर बना एक प्रसिद्ध धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है.
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पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गांव में बना भैरव गढ़ी मंदिर नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण पहाड़ों के बीच स्थित है। भैरव जी को गढ़वाल के रक्षक के रूप में जाना जाता है।
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) ?ref_src=twsrc%5Etfw">September 2, 2026
पौड़ी गढ़वाल जनपद आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें। pic.twitter.com/SBP21ldQ00
'भैरव गढ़ी मंदिर' गढ़वाल के 52 गढ़ों में से एक माना जाता है
'भैरव गढ़ी मंदिर' गढ़वाल के 52 गढ़ों (किलों) में से एक (लंगूर गढ़) माना जाता है. इतिहास के अनुसार, 18वीं शताब्दी के अंत (लगभग 1791) और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में जब नेपाल के गोरखाओं ने गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों पर आक्रमण किया, तो उन्होंने इस सामरिक रूप से महत्वपूर्ण लंगूरगढ़ को जीतने के लिए लगभग दो वर्षों तक घेराबंदी की थी. हालांकि, युद्ध शुरू होने के बाद मात्र 28 दिनों के भीतर ही गोरखा सेना को पराजय का सामना करना पड़ा था.
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भैरव गढ़ी को 'गढ़वाल के रक्षक' के रूप में पूजा जाने लगा
इस युद्ध में भैरवनाथ के चमत्कार और शक्ति से प्रभावित होकर गोरखा सेना के एक अधिकारी (थापा) ने मंदिर में लगभग 40 किलो वजनी एक ताम्र-पत्र (तांबे की प्लेट) भेंट किया था. तभी से इस क्षेत्र में भैरव गढ़ी को 'गढ़वाल के रक्षक' के रूप में पूजा जाने लगा.
मंदिर परिसर में विशेष कीर्तन और भंडारे चलते हैं
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ऐसी मान्यता है कि यहां के कालनाथ भैरव को काली चीजें पसंद हैं. इसलिए यहां मंडुए (रागी) के आटे से बनी रोटी (जिसे 'रोट' कहा जाता है) का प्रसाद चढ़ाया जाता है. हर साल जून के महीने (ज्येष्ठ मास) में यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं. इसके अलावा सावन के महीने में भी मंदिर परिसर में विशेष कीर्तन और भंडारे चलते हैं.