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Parshuram Jayanti 2026: महादेव की कठोर तपस्या करके प्राप्त किया फरसा, जानें क्यों मनाई जाती है भगवान परशुराम की जयंती
परशुराम के जीवन से हमें ये सीखने को मिलता है कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना और धर्म का रास्ता अपनाना ही इंसान का सबसे बड़ा कर्तव्य है. ये पावन पर्व हमे अपने अंदर के डर को खत्म करने और सत्य के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है.
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भगवान परशुराम की जयंती इस साल देशभर में 19 अप्रैल यानि रविवार को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी. वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान विष्णु के छठे अवतार के रुप में भगवान परशुराम का जन्म हुआ था.
ये पर्व सत्य के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है
भगवान परशुराम को चिरंजीवी भी माना जाता है, यानि वो आज भी इस पृथ्वी पर अदृश्य रुप में मौजूद हैं. वो साहस, ज्ञान और शक्ति के अनूठे संगम हैं, जिन्होंने शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुणता हासिल की थी. बाबा परशुराम के जीवन की घटनाएं हमें सिखाती हैं कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना और धर्म का रास्ता अपनाना ही इंसान का सबसे बड़ा कर्तव्य है. ये पावन पर्व हमे अपने अंदर के डर को खत्म करने और सत्य के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है.
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परशुराम जी ने शस्त्र उठाने का संकल्प क्यों लिया था?
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परशुराम जी ने शस्त्र उठाने का संकल्प क्यों लिया था, इसके बारे में कम ही लोग जानते होंगे. उनका अवतार एक ऐसे टाइम में हुआ था जब धरती पर अहंकारी और अत्याचारी राजाओं का आतंक बहुत बढ़ गया था. वो शासक अपनी शक्ति और ताक़त के दम पर निर्दोष जनता और ऋषियों को बहुत प्रताड़ित करते थे. जब राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने परशुराम जी के पिता, ऋषि जमदग्नि का अपमान किया और उनकी दिव्य कामधेनु गाय को अपनी ताक़त के बल पर छीना लिया था, तब परशुराम जी ने न्याय के लिए शस्त्र उठाया. उन्होंने अपनी अटूट शक्ति से समाज को इन अत्याचारी राजाओं से मुक्त कराया और धर्म की स्थापना की. बाबा परशुराम जी की जयंती ये याद दिलाती है कि शक्ति का सही इस्तेमाल हमेशा कमजोरों और जरुरतमंदो की रक्षा और न्याय की व्यवस्था बनाए रखने के लिए ही किया जाना चाहिए.
भगवान शिव की कठोर तपस्या करके प्राप्त किया फरसा
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परशुराम जी ने अपना पूरा जीवन कड़े अनुशासन के साथ जिया. उनके अंदर अपने माता-पिता के लिए अटूट श्रद्धा और प्रेम है. उनकी जीवन यात्रा साहस से भरी हुई है. उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके परशु यानि फरसा प्राप्त किया था, जो उनकी शक्ति और न्याय का मुख्य प्रतीक बना है. वो ना सिर्फ एक महान योद्धा ही नही थे. बल्कि वो सात ऋषियों के समूह में भी गिने जाते हैं. उन्होंने अपने ज्ञान से समाज को सही दिशा दिखाई. उनके जीवन की सीख ये बताती है कि बिना साहस के न्याय की रक्षा करना बहुत ही मुश्किल काम होता है. जब हम अनुशासन के साथ अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ते हैं,तो हमे मानसिक शक्ति और सफलता दोनों ही प्राप्त होती हैं. ये एक पर्व है जो हमें बल और सरलता प्रदान करता है.
ये दिन दान और उदारता का संदेश भी देती है
परशुराम जयंती सिर्फ शक्ति का प्रदर्शन करने का दिन नहीं है. बल्कि ये दान और उदारता का भी संदेश देती है. पौराणिक कथाओं की मानें तो पूरी पृथवी को जीतने के बाद परशुराम जी ने उसे दान कर दिया था और ख़ुद महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गए थे. ये उनके मोह-माया से पूरी तरह मुक्त होने और त्याग की भावना को दर्शता है.
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इस दिन श्रद्धालु रखते हैं व्रत
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इस ख़ास जिन पर श्रद्धालु व्रत रखते हैं और जरुरतमंदों की मदद करते हैं. ताकि समाज में आपसी मेल-जोल और प्रेम बढ़ सके. जब हम निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करते हैं और अपनी शक्ति का सही उपयोग करते हैं, तो हमारे जीवन में वास्तिवक शांति आती है. साथ ही ये पर्व हमारे अंदर दया और करुणा का भाव जगाता है.