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एक खास मंदिर जहां आराम करने आते हैं देवों के देव महादेव, माता पार्वती के साथ खेलते हैं चौसर, जानिए ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की अद्भुत कहानी

हिंदू धर्म में 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करना बहुत ही पुण्यकारी माना जाता है. आज हम आपको ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग से जो कि चौथा ज्योतिर्लिंग है, उससे जुड़ी कुछ खास और दिलचस्प बातें बताने जा रहे हैं. चलिए जानते हैं इस अद्भुत ज्योतिर्लिंग से जुड़ी मान्यताएं और इसकी खासियत.

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गंगा से भी ज्यादा पावन नदी नर्मदा, इसके किनारे से सटा ओंकार पर्वत और इस पर्वत पर निवास करते एकलिंगनाथ यानी महादेव. यह स्थान सचमुच देवताओं का निवास स्थान है. यहां नर्मदा नदी के दोनों किनारों पर दो प्रमुख मंदिर हैं ओंकारेश्वर और ममलेश्वर. यहां दोनों ज्योतिर्लिंग मिलकर एक होते हैं और कहलाते हैं ओंकारममलेश्वर. द्वादश ज्योतिर्लिंग में इसका स्थान चौथा है. कहते हैं पूरी पृथ्वी का यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जहां हर रात को सोने के लिए महादेव और माता पार्वती आते हैं और साथ ही यहां चौसर भी खेलते हैं. यही कारण है कि रात्रि के समय यहां पर चौपड़ बिछाई जाती है और मंदिर के भीतर पट बंद होने के बाद रात के समय परिंदा भी पर नहीं मार पाता है, उसमें सुबह चौसर और उसके पासे कुछ इस तरह से बिखरे मिलते हैं, जैसे रात के समय उसे किसी ने खेला हो.

मंदिर में होती है अदभुत आरती
इस मंदिर में एक ऐसी आरती भी होती है, जिसे न तो कोई भक्त देख सकता है और न ही मंदिर का कोई अन्य कर्मचारी उसमें उपस्थित होता है. यह ओंकारेश्वर की 'शयन आरती' है, जिसे सिर्फ एक पुजारी अकेले गर्भगृह में करता है और इस दौरान मंदिर के कपाट भक्तों के लिए पूरी तरह से बंद हो जाते हैं. ओंकारेश्वर में 68 तीर्थ हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां 33 कोटि देवी-देवता अपने परिवार के साथ निवास करते हैं.

कहां है ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग? 
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित है. मंदिर नर्मदा नदी में मांधाता द्वीप या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है. मान्यता है कि ओंकारेश्वर में स्थापित लिंग किसी मनुष्य के द्वारा गढ़ा, तराशा नहीं, बल्कि प्राकृतिक शिवलिंग है. यह शिवलिंग हमेशा चारों ओर से जल से भरा रहता है. ओंकारेश्वर मंदिर नर्मदा के दाहिने तट पर है, जबकि बाएं तट पर ममलेश्वर है.

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यहां की पवित्र नदी नर्मदा जो ओंकारममलेश्वर महादेव के चरण पखारती है. जिसे महादेव का यह वरदान प्राप्त है कि तुम्हारे तट पर जितने भी पत्थर हैं, वह मेरे वरदान से शिवलिंग स्वरूप हो जाएंगे. यानी यहां का हर कंकड़ शंकर है. नर्मदा नदी से निकले इन नर्मदेश्वर शिवलिंग को बाणलिंग भी कहा जाता है. जिसे प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती, यह कहीं भी स्थापित किए जा सकते हैं और किसी भी रूप में इनकी पूजा की जा सकती है.

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नर्मदा पवित्र नदियों के रूप में कब पूजी जाने लगी?
महादेव के आशीर्वाद से नर्मदा पवित्र नदियों के रूप में पूजी जाने लगी. यह पूरे विश्व में इकलौती ऐसी नदी है, जो अपनी दिशा से बिल्कुल विपरीत दिशा में बहती है. इस नदी को जीवन दायिनी के साथ मोक्ष दायिनी भी माना गया है. यह नदी पश्चिम से पूरब की ओर बहती है. इसके साथ ही नर्मदा नदी को कुंवारी नदी भी कहा जाता है. स्कंद पुराण के रेवा खंड के मयूर कल्प में नर्मदा की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है और वे शब्द वास्तव में रेवा के गुणों को दर्शाते हैं.

पुराणों में नर्मदा की उत्पत्ति का वर्णन
वहीं, पुराणों के अनुसार शिव से ही नर्मदा की उत्पत्ति हुई है. इसलिए उन्हें शिव की पुत्री माना गया है. शिवजी ने उन्हें अविनाशी होने का वरदान देकर धरती पर भेजा था. शिवजी के निर्देश पर धरती पर आने के कारण मां नर्मदा को शंकरी नर्मदा भी कहा जाता है. महादेव का वरदान ही है कि एक तरफ जहां गंगा, यमुना और सरयू जैसी नदियों में स्नान करने से पुण्य मिलता है, वहीं केवल नर्मदा के दर्शन मात्र से ही वही पुण्य प्राप्त हो जाता है.

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द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में इसके बारे में वर्णित है करते हुए लिखा गया है कि 
कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय |
सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ||
अर्थात जो सत्पुरुषों को संसारसागर से पार उतारने के लिए कावेरी और नर्मदा के पवित्र संगम के निकट मान्धाता के पुर में सदा निवास करते हैं, उन अद्वितीय कल्याणमय भगवान ऊंकारेश्वर का मैं स्तवन करता हूं.

कैसा है ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग परिसर?
ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग परिसर एक पांच मंजिला इमारत है. जिसकी पहली मंजिल पर भगवान महाकालेश्वर का मंदिर है, दूसरे मंजिल पर भगवान महाकालेश्वर का लिंग स्थित है, तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव, चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव और पांचवीं मंजिल पर राजेश्वर महादेव का मंदिर है.

यहीं पास में कुबेर भंडारी मंदिर है. इसके बारे में मान्यता है कि इस मंदिर में शिव भक्त कुबेर ने तपस्या की थी और शिवलिंग की स्थापना की थी. जिसे शिव ने देवताओं का धनपति बनाया था. कुबेर के स्नान के लिए शिवजी ने अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की थी. यह नदी कुबेर मंदिर के बगल से बहकर नर्मदाजी में मिलती है. इसे ही नर्मदा कावेरी का संगम कहते हैं.

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इसके साथ यहां सिद्धनाथ मंदिर है जो प्रारंभिक मध्यकालीन ब्राह्मण वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें मंदिर के खंभों और दीवारों पर विस्तृत नक्काशी की गई है, जो न केवल इसकी समृद्ध वास्तुकला को दर्शाती है, बल्कि इसके आध्यात्मिक मूल्य को भी दर्शाती है. इन खंडहरों में पत्थर पर उकेरी गई प्रभावशाली पेंटिंग शामिल हैं.

यहीं पास में भगवान शिव और देवी पार्वती को समर्पित गौरी सोमनाथ मंदिर है. यह मंदिर खजुराहो मंदिर समूह से काफी मिलता-जुलता है. माना जाता है कि 11वीं शताब्दी में निर्मित गौरी सोमनाथ मंदिर का निर्माण परमारों ने करवाया था. मंदिर तीन मंजिला है और इसे भूमिज शैली की वास्तुकला में बनाया गया है. मंदिर के गर्भगृह में 6 फीट ऊंचा एक विशाल लिंग है जो काले पत्थर से बना है.

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग से लगभग 4 किमी दूर केदारेश्वर मंदिर स्थित है. नर्मदा और कावेरी नदियों के संगम पर स्थित केदारेश्वर मंदिर भगवान केदार को श्रद्धांजलि के रूप में बनाया गया था और यह उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर से एक अनोखी समानता रखता है.

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गोविंदा भगवत्पाद गुफाएं भी यहीं पास स्थित है, इन्हीं पवित्र गुफाओं में आदि शंकराचार्य को अपने गुरु गोविंदा भगवत्पाद के मार्गदर्शन में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. इस परिवर्तनकारी घटना ने आदि शंकराचार्य को अद्वैत वेदांत के सार्वभौमिक दर्शन की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया.

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इस ज्योतिर्लिंग के पास ही अंधकेश्वर, झुमेश्वर, नवग्रहेश्वर नाम से भी बहुत से शिवलिंग स्थित हैं, जिनके दर्शन के लिए जा सकते हैं. इसके अलावा प्रमुख दार्शनिक स्थलों में अविमुक्तेश्वर, महात्मा दरियाई नाथ की गद्दी, श्री बटुक भैरव, मंगलेश्वर, नागचंद्रेश्वर और दत्तात्रेय व काले-गोरे भैरव भी हैं. जैन धर्म का तीर्थ सिद्धवरकूट भी नजदीक ही स्थित है. यहां पर जैन धर्म के कई प्राचीन मंदिर हैं.

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