इंडियन नेवी के सामने पाकिस्तान का 'चीनी दांव' फेल! 8 हैंगोर क्लास पनडुब्बियों के इंजनों की खुली पोल, इस्तेमाल से पहले ही बढ़ा सिरदर्द
अरब सागर में इंडियन नेवी की बादशाहत से पाकिस्तान नौसेना में इस कदर बौखलाहट बढ़ गई है कि आनन-फानन में 8 हैंगौर श्रेणी की पनडुब्बियों के ऑर्डर दिए. इसमें जर्मनी के इनकार के बाद चीन इंजन लगाए गए, जिसकी विश्वसनीयता पर ही अब सवाल उठने लगे हैं.
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समुद्री मोर्चे पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पाकिस्तान हैंगोर-क्लास (Hangor-Class) पनडुब्बियों पर बड़ा दांव खेल रहा है. इसे नौसेना के आधुनिकीकरण की दिशा में अहम कदम बताया जा रहा है. आठ पनडुब्बियों की योजना से पाकिस्तान अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ाना चाहता है. हालांकि, रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि इस परियोजना के दावों और वास्तविक स्थिति के बीच अभी कई सवाल खड़े हैं. पाकिस्तान के नौसेना प्रमुख ने बीते साल बताया था कि नौसेना जल्द ही 2026 में अपनी हैंगोर-क्लास पनडुब्बियों का पहला बैच – जिसमें कम से कम तीन पनडुब्बियां होंगी-शामिल करेगी. ये पनडुब्बियां पाकिस्तान नौसेना की मौजूदा खालिद और हशमत-क्लास पनडुब्बियों की तुलना में एक पीढ़ी आगे की हैं.
भारत की अरब सागर में रणनीतिक बढ़त से खौफ में पाकिस्तान
पाकिस्तान नौसेना के अधिकारी जब भी हैंगोर-क्लास कार्यक्रम की बात करते हैं, लहजे में आत्मविश्वास की कमी नहीं होती. आठ पनडुब्बियां, भारत के खिलाफ रणनीतिक बढ़त, समुद्र की गहराई से हमला करने की ताकत, यही इस कार्यक्रम का सार बताया जाता है. इन तमाम दावों के बीच एक बुनियादी सवाल दब जाता है: इन पनडुब्बियों में इंजन कौन सा है और क्या वह असल में काम का है?
शुरुआत में योजना थी कि हैंगोर पनडुब्बियों में जर्मनी के MTU डीज़ल इंजन लगाए जाएंगे. यह इंजन दर्जनों नौसेनाओं में दशकों से इस्तेमाल होता आया है, युद्ध में परखा हुआ, तकनीकी रूप से सिद्ध. लेकिन जर्मनी ने निर्यात की अनुमति देने से इनकार कर दिया. इसके बाद चीन ने अपना घरेलू CHD620 इंजन आगे किया और वही अब इस पूरे आठ-पनडुब्बी कार्यक्रम की रीढ़ बन गया है. कागज़ पर यह बदलाव सहज लगता है. ज़मीन पर यह कई नई उलझनें लेकर आया है, जिन पर पाकिस्तान की तरफ से कोई सार्वजनिक बात नहीं होती.
CHD620 इंजन का नौसेना में लंबे और कठिन इस्तेमाल का कोई साबित रिकॉर्ड सामने नहीं आया है. खराब मौसम, लंबी समुद्री गश्त या आपात स्थिति में इसकी क्षमता की कोई स्वतंत्र जांच भी सार्वजनिक नहीं की गई. न तकनीकी जानकारी दी गई, न किसी बाहरी संस्था की रिपोर्ट. पाकिस्तान सिर्फ यह कह रहा है कि इंजन पूरी तरह भरोसेमंद है, लेकिन पनडुब्बी में इंजन सिर्फ मशीन नहीं, सुरक्षा का सबसे अहम हिस्सा होता है.
चीनी इंजन ने बढ़ाया पाकिस्तान का सिरदर्द
अगर समुद्र की गहराई में या दुश्मन के इलाके के पास इंजन बंद हो जाए, तो हालात बेहद खतरनाक हो सकते हैं. अरब सागर कोई परीक्षण क्षेत्र नहीं है. असली संघर्ष की स्थिति में इन्हीं इलाकों में इन पनडुब्बियों को काम करना होगा, जहां भारतीय नौसेना पहले से मजबूत पनडुब्बी-रोधी क्षमता रखती है.
एक और बड़ी चिंता रखरखाव को लेकर है. इस इंजन के स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और तकनीकी मदद के लिए पाकिस्तान पूरी तरह चीन पर निर्भर है. अगर भविष्य में सप्लाई में दिक्कत आई या चीन ने अपनी प्राथमिकताएं बदल दीं, तो पाकिस्तान के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है. लेकिन इन सवालों पर अब तक कोई साफ जवाब नहीं दिया गया है.
पाकिस्तान की माली हालत ने बढ़ाई हैंगोर क्लास सबमरीन कार्यक्रम की चिंता
पाकिस्तान पर बढ़ते आर्थिक दबाव ने इस पूरे कार्यक्रम को और मुश्किल बना दिया है. हैंगोर पनडुब्बी परियोजना पाकिस्तान के पिछले कई दशकों के सबसे महंगे रक्षा सौदों में गिनी जा रही है. लेकिन यह ऐसे समय में आगे बढ़ रही है, जब पाकिस्तान पहले से गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है. देश IMF की सख्त शर्तों के तहत आर्थिक सुधार कर रहा है, महंगाई लगातार दोहरे अंकों में बनी हुई है और सरकार पर खर्च कम करने का दबाव है. ऐसे माहौल में अरबों डॉलर की लागत वाला यह कार्यक्रम पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बड़ा बोझ डाल सकता है.
सबमरीन का रखरखाव भी पाकिस्तान के बूते के बाहर!
समस्या सिर्फ पनडुब्बियां खरीदने तक सीमित नहीं है. असली चुनौती इनके लंबे समय तक रखरखाव की है. अगर इस्तेमाल किए जा रहे इंजन पूरी तरह परखे हुए नहीं हैं, तो भविष्य में मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी समस्याओं पर खर्च लगातार बढ़ सकता है. यानी आने वाले वर्षों में इन पनडुब्बियों को चलाना पाकिस्तान के लिए और महंगा साबित हो सकता है.
इंजन की विश्वसनीयता को लेकर पाकिस्तान सरकार और सेना की चुप्पी भी सवाल खड़े करती है. अब तक न कोई विस्तृत तकनीकी जानकारी सामने आई है और न ही किसी स्वतंत्र जांच की रिपोर्ट. इससे यह धारणा बनती है कि इस मुद्दे पर खुलकर बात करने से बचा जा रहा है.
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लेकिन रक्षा मामलों में अनदेखे सवाल हमेशा चिंता का कारण बनते हैं. खासकर नौसैनिक युद्ध में, जहां छोटी तकनीकी कमजोरी भी बड़े खतरे में बदल सकती है. अगर किसी संकट या युद्ध के समय पनडुब्बियों की क्षमता पर सवाल खड़े हुए, तो उसका असर सिर्फ सैन्य रणनीति पर नहीं बल्कि पाकिस्तान की पूरी रक्षा साख पर पड़ सकता है.