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एयरक्राफ्ट कैरियर को 'आउटडेटेड' बताना नौसेना और देश के साथ धोखा, कौन रच रहा भारत को कमजोर करने की साजिश, जानें
देश में इन दिनों एक बहस चल पड़ी है कि विमानवाहक पोत ओल्ड कॉन्सेप्ट या बीते दौर की बात हो गए हैं. ऐसी बात भी करना नौसेना और देश के साथ धोखा है. एयरक्राफ्ट कैरियर रणनीतिक संप्रभुता, नेवल पावर और समय की जरूरत हैं.
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आज के दौर में जब नौसैनिक रणनीति पर चर्चा होती है, तो अक्सर एक गलत और खतरनाक धारणा सामने आती है कि आधुनिक मिसाइल तकनीक और पनडुब्बियों के युग में विमानवाहक पोत या एयरक्राफ्ट कैरियर अब 'बीते दौर की चीज़' (आउटडेटेड) हो गए हैं. यह तर्क न केवल नौसैनिक सिद्धांतों की समझ की कमी को दर्शाता है, बल्कि एक शक्तिशाली नौसेना की वास्तविक जरूरतों को भी नजरअंदाज करता है. सच कहा जाए तो, एयरक्राफ्ट कैरियर को आउटडेटेड बताना नौसेना और देश के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है, और यह सीधे तौर पर भारत को समंदर में कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. भारतीय नौसेना के संदर्भ में, यह समझना अनिवार्य है कि एयरक्राफ्ट कैरियर केवल युद्धपोत नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संपत्ति और संप्रभुता का अजेय प्रतीक हैं.
'पनडुब्बी बनाम विमानवाहक पोत' की तुलना ही छलावा!
सबसे पहले, हमें 'पनडुब्बी बनाम विमानवाहक पोत' की इस झूठी तुलना को समझना होगा. कई आलोचक तर्क देते हैं कि पनडुब्बियां कैरियर की जगह ले सकती हैं, लेकिन यह बुनियादी नौसैनिक सिद्धांत के विपरीत है. पनडुब्बियों का प्राथमिक कार्य दुश्मन के जहाजों को डुबाना या गुप्त रूप से निगरानी करना है, लेकिन वे समुद्र के एक बड़े इलाके में 'दृश्यमान उपस्थिति' (Visible Presence) नहीं बना सकतीं. वे न तो शत्रु के विमानों को हवा में रोक सकती हैं, न ही उभयचर अभियानों के लिए सुरक्षा कवच प्रदान कर सकती हैं और न ही किसी विशिष्ट क्षेत्र में हवाई श्रेष्ठता स्थापित कर सकती हैं. एक आधुनिक, 'ब्लू-वॉटर' नौसेना को इन दोनों संपत्तियों की आवश्यकता होती है, जो मिलकर एक पूर्ण सुरक्षा घेरा बनाती हैं. इस झूठी तुलना को बढ़ावा देना असल में नौसेना की मारक क्षमता को पंगु बनाने की एक साजिश से कम नहीं है.
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भारत की समुद्री ताकत का प्रतीक एयरक्राफ्ट कैरियर
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दूसरा मुख्य बिंदु कैरियर की भेद्यता से जुड़ा है. आलोचक इसे अक्सर 'बैठे हुए लक्ष्य' कहते हैं, जो कि एक बड़ी भूल और देश को गुमराह करने वाला सफेद झूठ है. एक एयरक्राफ्ट कैरियर कभी अकेला नहीं चलता. वह एक 'कैरियर बैटल ग्रुप' के केंद्र में होता है, जो अत्यधिक सुरक्षित सुरक्षा कवच से लैस होता है. इसमें गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक, एंटी-सबमरीन फ्रिगेट और परमाणु हमलावर पनडुब्बियां शामिल होती हैं. हवाई पूर्व चेतावनी प्रणालियों, मिसाइल इंटरसेप्टर और हेलीकॉप्टरों के घेरे के साथ, एयरक्राफ्ट कैरियर वास्तव में किसी भी राष्ट्र के शस्त्रागार में सबसे अधिक सुरक्षित संपत्ति है. यह कवच ही उसे आधुनिक खतरों के खिलाफ अभेद्य बनाता है.
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत आर्थिक और रणनीतिक लाभ का है. विमानवाहक पोत के निर्माण को केवल एक खर्च के रूप में देखना एक संकीर्ण दृष्टिकोण है और देश के स्वदेशी औद्योगिक विकास को रोकने का एक कुत्सित प्रयास है. एक एयरक्राफ्ट कैरियर का जीवनकाल 40 से 50 वर्ष होता है. इतने लंबे समय के लिए एक जहाज का निर्माण करना एक पूरे औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को जन्म देता है.
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मेड इन इंडिया एयरक्राफ्ट कैरियर रणनीतिक और आर्थिक रूप से फायदे का सौदा!
इसमें स्वदेशी जहाज निर्माण, एयरोस्पेस आपूर्ति श्रृंखला और उच्च तकनीक वाले विनिर्माण शामिल हैं. शोध बताते हैं कि रक्षा क्षेत्र में किया गया स्वदेशी निवेश अर्थव्यवस्था में निवेश की गई राशि का लगभग तीन गुना 'आर्थिक गुणक' उत्पन्न करता है. जब हम अपना कैरियर स्वयं बनाते हैं, तो हम न केवल विदेशी मुद्रा बचाते हैं, बल्कि देश के भीतर ही तकनीकी नवाचार और कुशल रोजगार को भी बढ़ावा देते हैं. यह लंबी अवधि में विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर हमारी निर्भरता को कम करता है और हमें वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता देता है. इसका विरोध करने वाले असल में यही चाहते हैं कि भारत हमेशा विदेशी हथियारों का मोहताज बना रहे.
अंत में, समुद्र पर नियंत्रण का अर्थ केवल युद्ध लड़ना नहीं है, बल्कि शांति के समय भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके सुरक्षा सुनिश्चित करना है. हिंद महासागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में, जहां व्यापारिक मार्ग वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, विमानवाहक पोत की उपस्थिति ही शत्रुओं के लिए सबसे बड़ा निवारक है.
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कौन फैला रहा विमानवाहक पोत के बारे में मिथक?
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विमानवाहक पोत का मिथक उन लोगों द्वारा फैलाया जाता है जो नौसेना की भूमिका को केवल एक 'हथियार' के रूप में देखते हैं. लेकिन एक महान समुद्री शक्ति बनने के लिए, भारत को ऐसे प्लेटफार्मों की आवश्यकता है जो समुद्र में हमारी आंखों और हाथों का काम कर सकें. एयरक्राफ्ट कैरियर केवल इस्पात के विशाल ढांचे नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्र की तकनीकी परिपक्वता, औद्योगिक क्षमता और समुद्र पर हमारे अटूट नियंत्रण के प्रमाण हैं. इन पर किया गया निवेश, वास्तव में भारत की भविष्य की सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि में किया गया सबसे बड़ा निवेश है. इन्हें 'आउटडेटेड' मानकर इनका विरोध करना कोई वैचारिक भूल नहीं होगी, बल्कि यह सीधे तौर पर भारतीय नौसेना की ताकत को सीमित करने और राष्ट्र के भविष्य के साथ किया गया एक ऐतिहासिक धोखा होगा.