ईरान में सत्ता परिवर्तन से भारत को फायदा या नुकसान? बदलने वाला है दुनिया का राजनीतिक समीकरण, क्या होगा भारत का स्टैंड?
Iran Protest: तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरु हुआ आंदोलन अब पूरे ईरान को अपनी चपेट में ले चुका है. ऐसे में अगर सत्ता परिवर्तन होता है, तो भारत को इससे फायदा होगा या नुकसान? जानें.
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ईरान की सड़कों पर विद्रोह बढ़ता जा रहा है. महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ ये विरोध प्रदर्शन अब सत्ता को उखाड़ फेंकने की तरफ आगे बढ़ रहा है. ईरान की सड़कों पर लाखों प्रदर्शनकारी उतर आए हैं, और ये विरोध जंगल की आग की तरह पूरे ईरान में फैल रहा है. इसकी लपटों ने हजारों प्रदर्शनकारियों की जान भी ले चुकि हैं.
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद सबसे बड़ा विद्रोह
पिछले साल 28 दिसंबर को तेहरान के ग्रैंड बाजार से ईरानी हुकूमत के खिलाफ शुरु हुआ ये आंदोलन अब पूरे ईरान को अपनी आगोश में लेने की दिशा में आगे बढ़ चुका है. इस विरोध को दबाने के लिए प्रशासन सख्ती बरत रही है. मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक़, अब तक 2,000 से अधिक मौतें हो चुकि हैं. देशभर में इंटरनेट सुविधा ठप है, सोशल मीडिया पर बंद है, प्रशासन द्वारा प्रदर्शनकारियों पर कड़ी नजर रखी जा रही है, लेकिन इसके बावजूद विरोध की आग बढ़ती जा रही है.
क्या बदलने वाले हैं विश्व के राजनीतिक समीकरण?
रूस-युक्रेन के बीच युद्ध अभी भी जारी है, इसके अलावा दुनिया के कई देश युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं. अमेरिका हमेशा से दुनिया में अपना वर्चस्व चाहता है. वहीं, दुसरी तरफ रूस जैसा ताक़तवर देश भी खड़ा है. दुनिया इस वक्त दो खेमों में विभाजित है. ईरान में लगभग 2000 लोगों के मारे जाने पर अमेरिका मानवाधिकार का हवाला देते हुए, ईरान को सबक सिखाने की धमकी दे रहा है. वहीं, दूसरी तरफ इजरायली हमलों में अब तक 71,000 से भी ज्यादा निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं. 1,70,000 से भी ज्यादा नागरिक घायल हुए हैं. पूरा गाजा कब्रिस्तान बन हो चुका है. लेकिन अमेरिका को यहां मानवाधिकार नहीं दिखता, और ना ही इज़रायल को सबक सिखाने की धमकी देता है. हद तो तब हो जाती है, जब अमेरिका वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उसके घर से बंधक बनाकर उठा लेता है. अमेरिका की मनमानी और दोहरी नीतियों से पूरी दुनिया वाक़िफ़ है. अमेरिका ईरान में भी सत्ता परिवर्तन कराकर वहां अपना पिट्ठू बिठाना चाहता है, और वहां से सेंट्रल एशिया में अपनी ताक़त को और बढ़ाना चाहता है. इसलिए जानकारों का यह कहना है कि ईरान में जो कुछ भी हो रहा है, इसके पीछे अमेरिका का हाथ है.
ईरान में सत्ता परिवर्तन से भारत को फायदा या नुकसान?
ईरान हमारा पूराना मित्र देश है. वह मिडिल ईस्ट में भारत के साथ संतुलन का आधार भी प्रदान करता है, लेकिन मौजूदा विद्रोह ने सबकुछ दाँव पर लगा दिया है. चाबहार प्रोजेक्ट ईरान और भारत के बीच घनिष्ठता और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत बनाता है. इसके अलावा ईरान, भारत का दूसरा सबसे बड़ा बासमती चावल बाज़ार है. चाय, मसाले, फल और ड्राई फ्रूट्स का निर्यात भी भारत में होता है. ईरान के साथ भारत का रिश्ता हमेशा से मधुर रहा है. वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की मनमानी और टैरिफ वॉर ने दुनिया के कई देशों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर दिया है. भारत भी उन देशों में से एक है. ऐसे में अमेरिका पर विश्वास करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. अमेरिका ने हमेशा गिरगिट की तरह अपना रंग बदला है. पाकिस्तान को गले लगाया है. और एक कहावत भी है कि दुश्मन का दोस्त भी दुश्मन ही होता है.
संतुलन ही भारत का हथियार!
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भारत ने सदैव संतुलन की कला दिखाई है. इज़रायल और अरब देशों से भी गहरी दोस्ती के साथ ईरान से भी रिश्ते बनाए रखे हैं. रूस-युक्रेन युद्ध में भी भारत न्यूट्रल रहा है. ऐसे में आगे भी भारत अपनी कूटनीति में संतुलन बनाए रख सकता है. चाबहार बचाने के लिए वैकल्पिक फंडिंग और रुट की तलाश कर सकता है. ईरान में अगर सत्ता परिवर्तन होता है, तो हो सकता है कि नया ईरान भारत के अनुकूल हो, लेकिन नये ईरान पर अमेरिका का प्रभाव ज्यादा होगा. और वर्तमान अमेरिका-भारत के बीच खटास है. ऐसे में अमेरिका नए ईरान में ज्यादा हस्तक्षेप कर सकता है. और भारत के साथ ईरान के रिश्ते को भी प्रभावित कर सकता है. इसलिए भारत इस वक्त ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है.
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