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एयरपोर्ट पर न फूल, न माला, देश के लिए Gold Medal जीतकर रिक्शे से घर लौटे रोहन बडवान, क्या यही है हमारे चैंपियंस का सम्मान?

साउथ एशिया गेम्स 2026 में भारत के लिए गोल्ड जीतकर वतन लौटे रोहन बडवान का रिक्शे में बैठकर घर जाना, यह वाकई दुखी कर देने वाली तस्वीर है. वहीं, उनकी सादगी, कड़ी मेहनत और अटूट समर्पण की गवाही भी देती है.

टी-20 वर्ल्ड कप की गूंज तो हर घर में सुनाई दे रही है. क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए प्यार तो हर किसी का उमड़ रहा है. हर चौक-चौराहे पर क्रिकेट की बातें हो रही हैं. हर क्रिकेट प्रेमी क्रिकेटरों से मिलकर उनके कदमों में गिर जाना चाहता है. क्यों? क्योंकि ये खिलाड़ी देश का मान-सम्मान बढ़ा रहे हैं. इसलिए इन्हें भगवान की तरह पूजा भी जाता है. लेकिन क्रिकेट से परे देश में और भी कई स्पोर्ट्स हैं. इन स्पोर्ट्स के खिलाड़ी भी विदेशों में तिरंगा झंडा गाड़कर आते हैं. देश का सम्मान बढ़ाते हैं. लेकिन सवाल ये है, कि क्या इन स्पोर्ट्स को भी यही महत्ता मिलती है? क्या दूसरे स्पोर्ट्स के खिलाड़ियों को भी ऐसा ही सम्मान मिलता है? क्या इनका भी बाजा-गाजा के साथ एयरपोर्ट पर स्वागत किया जाता है? या फिर, क्या दूसरे स्पोर्ट्स के खिलाड़ी भी इतना लोकप्रिय होते हैं, जितना क्रिकेटर्स होते हैं? जवाब सबको पता है, नहीं. 

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक बड़ा ही हृदय विदारक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में एक गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ी जिसने अभी हाल ही में श्रीलंका में साउथ एशिया चैम्पियनशिप 2026 में देश का नाम रौशन किया. अपने प्रतिभा का लोहा मनवाया लेकिन जब वह देश के लिए मेडल जीतकर घर आता है. तो कोई चर्चा नहीं होती और वह गुमनाम बनकर खामोशी के साथ घर लौट जाता है. ये तस्वीर दिल को छू लेने वाली और व्यवस्था पर चोट करने वाली है. दरअसल, इस खिलाड़ी का नाम रोहन बडवान है. चलिए अब आपको इस खिलाड़ी के बारे में तफसील से बताते हैं.

रोहन बडवान ने देश के लिए जीते गोल्ड मेडल

श्रीलंका के कोलंबो में आयोजित साउथ एशिया चैम्पियनशिप 2026 में भारतीय एथलीट रोहन बडवान (Rohan Badhwan) ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए शानदार प्रदर्शन किया है और गोल्ड मेडल जीतकर भारत का तिरंगा लहराया. रोहन बडवान की यह जीत उन्हें अब आगामी एशियाई खेलों और ओलंपिक क्वालीफायर्स के लिए एक मजबूत दावेदार बनाती है. लेकिन जब रोहन गोल्ड मेडल जीतकर वतन लौटे, तो उनकी वापसी किसी फिल्म के उस दृश्य जैसी थी जो आंखों में आंसू और दिल में सम्मान भर दे. 

जीत का शोर विदेश में, वतन में खामोशी

रोहन जब जीत कर घर लौटे तो उनके हाथों में अंतर्राष्ट्रीय ट्रॉफी थी और सीने में देश के लिए गौरव, लेकिन जिस एयरपोर्ट पर उनके स्वागत में जनसैलाब होना चाहिए था, वहां सन्नाटा था. न कोई फूलों की बारिश, न ही ढोल नगाड़े की थाप सुनाई दी. एक चैंपियन, जिसने तिरंगे का मान दुनिया में बढ़ाया, वह गुमनामी के अंधेरे में चुपचाप बाहर निकला. 

VIP काफिला नहीं, बल्कि रिक्शा बना हमसफर

सबसे ज्यादा हृदय विदारक वह पल था, जब देश का यह ‘गोल्डन बॉय’ किसी सरकार गाड़ी या लग्जरी कार के काफिले के बजाय एक साधारण रिक्शे में बैठकर अपने घर की ओर रवाना हुआ. कहने का मतलब ये है, कि एक तरफ चमकती हुई अंतर्राष्ट्रीय ट्रॉफी थी, तो दूसरी तरफ धूल भरी सड़कों पर चलता एक पुराना रिक्शा. जो चीख-चीखकर व्यवस्था के सौतेलेपन की कहानी बयान कर रहा था. 

सलाम है देश के इस असली हीरो को!

खैर, रोहन की खामोशी के साथ वतन वापसी उनकी सादगी, कड़ी मेहनत और अटूट समर्पण की गवाही देती है. यह हमें याद दिलाती है कि, असली नायक लग्जरी या दिखावे की वाहवाही पर निर्भर नहीं होते. उनकी महानता उनके खेल और उनके चरित्र में झलकती है. रोहन बडवान की यह यात्रा केवल एक पदक की कहानी नहीं है, बल्कि उस जज्बे की मिसाल है जो अभावों में भी हार नहीं मानता. सलाम है देश के इस असली हीरो को! 

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