OBC आरक्षण में बदलाव! सुप्रीम कोर्ट ने तय किया क्रीमी लेयर का नया पैमाना
सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल पारिवारिक आय से नहीं करने का बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि व्यक्ति की सामाजिक और व्यावसायिक स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है.
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी उम्मीदवार के क्रीमी लेयर में होने या न होने का निर्धारण केवल पारिवारिक आय के आधार पर नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि पदों की श्रेणियों और व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को मापे बिना केवल आय के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानून की दृष्टि से सही नहीं है.
पीठ ने मामले की सुनवाई में कहा, 'आय के साथ-साथ व्यक्ति के सामाजिक और व्यावसायिक पद को भी ध्यान में रखना जरूरी है.' इसका मतलब है कि अब केवल यह नहीं देखा जाएगा कि परिवार की वार्षिक आय कितनी है, बल्कि व्यक्ति की वास्तविक सामाजिक स्थिति और व्यवसायिक स्थिति को भी ध्यान में लिया जाएगा.
क्रीमी लेयर की अवधारणा क्या है?
क्रीमी लेयर शब्द ओबीसी समुदाय के उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी समृद्ध हो चुके हैं. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद गरीब और पिछड़े लोगों तक पहुंचे, न कि संपन्न तबके तक. इस अवधारणा की शुरुआत 1992 में इंद्रा सहनी बनाम भारत सरकार मामले के बाद हुई थी. उस समय सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन संपन्न वर्ग को इससे बाहर करने का आदेश दिया. इसके बाद 1993 में सरकार ने क्रीमी लेयर के लागू करने के नियम बनाए.
वर्तमान नियम और आय की सीमा
आज की तारीख में यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है, तो उसे क्रीमी लेयर माना जाता है. ऐसे उम्मीदवार सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते. आय की यह सीमा आखिरी बार 2017 में 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की गई थी. इसके अलावा उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, सशस्त्र बलों के उच्च अधिकारी और बड़े व्यवसायियों के बच्चे भी क्रीमी लेयर में आते हैं. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संपन्न और प्रभावशाली व्यक्ति आरक्षण का लाभ न ले सकें.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर
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सुप्रीम कोर्ट के इस नए फैसले से सरकार पर 1993 के क्रीमी लेयर नियमों की समीक्षा करने का दबाव बढ़ सकता है. अदालत ने संकेत दिया कि केवल पैसे को पैमाना मान लेना सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्य के खिलाफ हो सकता है. उदाहरण के लिए, कम वेतन पाने वाला व्यक्ति अगर ऊंचे प्रशासनिक पद पर है, तो उसकी सामाजिक स्थिति एक अमीर व्यापारी के बच्चे से अलग हो सकती है. जानकारों की माने तो इस फैसले से आरक्षण नीति में न्याय और समानता की दिशा में सुधार की संभावना बढ़ गई है. अब यह देखना होगा कि सरकार और संबंधित संस्थान इस फैसले को लागू करने के लिए कौन‑से नए दिशा-निर्देश जारी करते हैं.
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