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भुखमरी और कंगाली की मार झेल रहा पाकिस्तान, क्या 1 करोड़ लोगों को मरने देगी Pak सरकार?
पाकिस्तान में भुखमरी की स्थिति बेहद भयावह होती जा रही है. संयुक्त राष्ट्र की FAO रिपोर्ट के अनुसार, देश के बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा जैसे 68 जिलों में करीब 1.1 करोड़ लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं.
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पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह आतंकवाद या राजनीतिक अस्थिरता नहीं, बल्कि उस गंभीर मानवीय संकट की ओर है जो उसके ही नागरिकों को निगल रहा है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की हालिया 2025 ग्लोबल रिपोर्ट ऑन फूड क्राइसिस में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. इस रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में करीब 1.1 करोड़ लोग गंभीर भुखमरी से जूझ रहे हैं. यह आंकड़ा किसी छोटे देश की पूरी आबादी जितना बड़ा है और हैरानी की बात ये है कि यह संकट सरकार की उदासीनता और अव्यवस्था का नतीजा लग रहा है.
क्यों गहराया पाकिस्तान में भूख का संकट?
FAO की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा जैसे इलाकों में हालात बेहद खराब हैं. ये वही क्षेत्र हैं जहां पर साल 2022-23 में भीषण बाढ़ आई थी और लोग अब तक उससे उबर नहीं पाए हैं. रिपोर्ट बताती है कि 22 प्रतिशत आबादी इन इलाकों में भूख से मरने की कगार पर है. 1.7 मिलियन लोग अब भी आपातकालीन स्थिति में जी रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में खाद्य असुरक्षा की स्थिति 2024 के मुकाबले 2025 में और अधिक भयावह हो चुकी है.
आंकड़े जो झकझोर देते हैं
FAO की रिपोर्ट के अनुसार 2018 से 2024 के बीच पाकिस्तान के कई क्षेत्रों में लगातार गंभीर कुपोषण देखा गया. खासतौर पर बलूचिस्तान और सिंध में वैश्विक गंभीर कुपोषण (GAM) की दर 10 प्रतिशत से ऊपर रही, जबकि कुछ जिलों में यह 30 प्रतिशत तक पहुंच गई. सर्दियों के मौसम में अकेले 43 जिलों में 32 प्रतिशत आबादी को खाने की चिंता सताती रही. यह हालात बताते हैं कि पाकिस्तान के करोड़ों लोगों को उनकी सरकार जीने लायक भोजन तक नहीं दे पा रही है.
शहबाज़ शरीफ की चुप्पी क्यों?
इन हालातों के बावजूद प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की ओर से न तो कोई सख्त योजना सामने आई है, न ही भूख से जूझते नागरिकों के लिए कोई राहत पैकेज. हकीकत यह है कि जिन इलाकों में यह संकट सबसे ज्यादा है, वे वही हैं जहां पाकिस्तान विरोधी आवाजें उठती रही हैं. चाहे वो बलूचिस्तान हो या सिंध, इन जगहों पर स्वतंत्रता की मांग समय-समय पर उठती रही है. सवाल यह उठता है कि क्या सरकार जानबूझकर इन क्षेत्रों को अनदेखा कर रही है? क्या शहबाज़ शरीफ भूख को एक राजनीतिक हथियार बना रहे हैं?
जलवायु संकट और अव्यवस्था की दोहरी मार
FAO की रिपोर्ट में यह भी साफ कहा गया है कि खराब मौसम, जलवायु परिवर्तन, सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएं पाकिस्तान की खाद्य व्यवस्था को लगातार कमजोर कर रही हैं. ऊपर से, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सड़क और परिवहन ढांचे की बदहाली ने ग्रामीण इलाकों में राहत पहुंचाना भी मुश्किल कर दिया है. सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में 2.1 मिलियन बच्चे गंभीर कुपोषण से ग्रस्त हैं. इनमें से अधिकांश बच्चों को सही इलाज और पोषण तक नहीं मिल पा रहा है.
वही भारत की बात करें, तो यहां सरकार न केवल अपने नागरिकों को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध करवा रही है, बल्कि संकट के समय दूसरे देशों को भी सहायता भेजने में सक्षम है. कोविड के समय भारत ने कई देशों को मुफ्त अनाज, वैक्सीन और दवाएं भेजीं. पाकिस्तान को भी एक बार भारत से गेहूं की मदद मिली थी, लेकिन अफसोस कि वहां की सरकार इस मॉडल को अपनाने की बजाय राजनीतिक विवादों में उलझी रही. अगर पाकिस्तान को इस संकट से उबरना है तो उसे गंभीरता से खाद्य सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और गरीबों के लिए राहत योजनाओं पर काम करना होगा.
अगर पाकिस्तान सरकार ने अब भी चेतावनी नहीं ली तो आने वाले महीनों में वहां भूख जनित अशांति, स्वास्थ्य संकट और राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है. FAO जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की चेतावनी को नजरअंदाज करना सिर्फ वहां के लाखों भूखे नागरिकों के साथ अन्याय ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए भी एक खतरा बन सकता है.
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