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‘मैं दबाव के आगे…’ कर्मचारी ने साकेत कोर्ट की बिल्डिंग से लगाई छलांग, मौके पर ही मौत, सुसाइड नोट ने सामने आया दर्द

हरीश 60% दिव्यांग था और वह दबाव झेल नहीं पाया. उसने सुसाइड नोट में काम को लेकर गंभीर बातें बताईं हैं जिसने व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए.

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09 Jan 2026
( Updated: 09 Jan 2026
04:57 PM )
‘मैं दबाव के आगे…’ कर्मचारी ने साकेत कोर्ट की बिल्डिंग से लगाई छलांग, मौके पर ही मौत, सुसाइड नोट ने सामने आया दर्द

दिल्ली की साकेत डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में उस वक्त सनसनी मच गई जब स्टाफ मेंबर ने कोर्ट कॉम्प्लेक्स की बिल्डिंग से कूदकर सुसाइड कर लिया. शुरुआती जांच में पता चला है कि मृतक काम के दबाव के कारण गंभीर मानसिक तनाव में था. 

मृतक की पहचान साकेत कोर्ट कॉम्प्लेक्स में काम करने वाले हरीश सिंह महार के रूप में हुई. अधिकारियों के मुताबिक, उनके पास से एक सुसाइड नोट मिला है, जिसमें मृतक ने साफ तौर पर लिखा कि वह अपनी मर्जी से यह कदम उठा रहा है और उनके इस फैसले के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए. 

ऑफिस के दबाव ने ली जान!

सुसाइड नोट में हरीश महार ने कथित तौर पर बताया कि 'अहलमद' (कोर्ट का एक अधिकारी जो रिकॉर्ड रखने और न्यायिक कार्यवाही में मदद करने के लिए जिम्मेदार होता है) का पद संभालने के बाद ऑफिस के काम का दबाव बहुत ज्यादा हो गया था. मृतक ने लिखा कि इस पद को संभालने के बाद से ही उनके मन में आत्महत्या के विचार आ रहे थे, लेकिन उसने यह सोचकर अपनी मानसिक स्थिति किसी के साथ शेयर नहीं की कि वह काम के बोझ से निपट लेगा, लेकिन मेरे लिए यह नौकरी मुश्किल है और मैं इस दबाव के आगे झुक गया.

नोट से आगे पता चला कि महार 60 प्रतिशत विकलांग थे और उन्हें इस पद की जिम्मेदारियां बहुत मुश्किल लगती थीं. उन्होंने लिखा कि नौकरी की वजह से आखिरकार उनकी मानसिक सेहत खराब हो गई, जिससे वह दबाव में टूट गए. लगातार तनाव और लगातार ज्यादा सोचने की वजह से नींद न आना भी उनकी सेहत को प्रभावित करने वाले मुख्य कारण बताए गए. सुसाइड नोट में महार ने अपने आर्थिक भविष्य के बारे में भी चिंता जताई थी. समय से पहले रिटायरमेंट लेना उनके लिए सही विकल्प नहीं था. नोट के अनुसार, समय से पहले रिटायरमेंट का मतलब होगा कि वह 60 साल की उम्र तक अपनी बचत या पेंशन का फायदा नहीं उठा पाएंगे, जिससे उनकी चिंता और बढ़ गई. 

‘मेरी मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं’

न्यायपालिका को संबोधित एक अपील में महार ने अनुरोध किया कि विकलांग व्यक्तियों को हल्की ड्यूटी दी जाए ताकि भविष्य में दूसरों को ऐसी ही पीड़ा न झेलनी पड़े. उन्होंने नोट में दोहराया कि उनका फैसला अपनी मर्जी का था और एक बार फिर जोर दिया कि उनकी मौत के लिए किसी को भी दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए. 

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साकेत कोर्ट के एक वकील ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस दुखद घटना के बारे में जानकर उन्हें गहरा सदमा लगा है.  वकील ने कहा कि वह 60 प्रतिशत विकलांग थे. मुझे लगता है कि इस तरह की मुश्किल पोस्ट उस स्तर की विकलांगता वाले व्यक्ति के लिए सही नहीं हो सकती. लीगल कम्युनिटी के सदस्यों ने कोर्ट के बाहर विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है और कोर्ट स्टाफ के लिए न्याय और बेहतर काम करने की स्थितियों की मांग कर रहे हैं. 

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