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चीन के वर्चस्व को तोड़ने की वैश्विक पहल में भारत की अहम भूमिका, अमेरिका ने प्रस्तावित किया 50 देशों का क्रिटिकल मिनरल्स ब्लॉक

दुनिया की भविष्य की तकनीक और वैश्विक शक्ति संतुलन को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने चीन के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए 50 से अधिक देशों का क्रिटिकल मिनरल्स ट्रेडिंग ब्लॉक प्रस्तावित किया है. यह प्रस्ताव 4 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन में हुए ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ सम्मेलन में रखा गया.

Source: X/ @DrSJaishankar
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दुनिया की भविष्य की तकनीक और वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर एक बड़ा रणनीतिक कदम सामने आया है. अमेरिका के नेतृत्व में चीन के वर्चस्व से क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित करने की दिशा में 50 से अधिक देशों का एक नया ट्रेडिंग ब्लॉक बनाने का प्रस्ताव रखा गया है. यह प्रस्ताव 4 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन में आयोजित पहले ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ सम्मेलन के दौरान सामने आया. सरल शब्दों में कहें तो यह पहल चीन के एकाधिकार को तोड़ने और भविष्य की तकनीकों पर अमेरिका व उसके सहयोगियों का नियंत्रण सुनिश्चित करने की वैश्विक रणनीति है. इस बैठक में भारत भी मुख्य रूप से शामिल रहा.

सम्मेलन के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका और उसके साझेदार देशों को मिलकर ऐसा ढांचा तैयार करना होगा, जो क्रिटिकल मिनरल्स के उत्पादन, प्रोसेसिंग और कीमतों को स्थिर बना सके. वेंस ने कहा कि टैरिफ और न्यूनतम कीमतों के जरिए घरेलू और मित्र देशों के उत्पादकों की रक्षा करना अब अनिवार्य हो गया है. उनका साफ संदेश था कि बाजार को पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ना रणनीतिक तौर पर खतरनाक साबित हो सकता है.

जेडी वेंस ने दिया यह संकेत

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जेडी वेंस ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के लिए एक बेसलाइन प्राइस तय करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चीन जैसे देश जानबूझकर कीमतें गिराकर संभावित प्रतिस्पर्धियों को बाजार से बाहर न कर सकें. वेंस के शब्दों में, 'हमें क्रिटिकल मिनरल्स की कीमतों को अधिक अनुमानित और कम अनियमित बनाना होगा. तभी अमेरिका अपनी क्रिटिकल मिनरल्स इंडस्ट्री को दोबारा मजबूत कर पाएगा.'

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क्रिटिकल मिनरल्स के लिए तीसरे पक्ष पर न रखें निर्भरता 

प्रस्तावित ट्रेडिंग ब्लॉक को वेंस ने 'साथी और सहयोगी देशों के बीच एक सुरक्षित जोन' बताया. उन्होंने कहा कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी उद्योग के लिए जरूरी खनिजों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना और मित्र देशों के साथ संयुक्त उत्पादन को बढ़ावा देना है. वेंस ने जोर देकर कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स के लिए किसी तीसरे पक्ष पर निर्भर रहना भविष्य के लिए सही विकल्प नहीं है. सहयोगी देशों को एक-दूसरे पर भरोसा करते हुए साझा ढांचा बनाना होगा.

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क्या है इस पहल का मुख्य उद्देश्य?

इस पहल का केंद्र लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिज हैं. ये वही खनिज हैं, जिनके बिना स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, जेट इंजन, सेमीकंडक्टर और आधुनिक मिसाइल गाइडेंस सिस्टम की कल्पना भी नहीं की जा सकती. अमेरिका का प्रस्ताव है कि 50 से अधिक देश मिलकर एक ऐसा व्यापार क्षेत्र बनाएं, जहां इन खनिजों का लेनदेन बिना अनावश्यक बाधाओं के हो सके. इस ब्लॉक के तहत न्यूनतम कीमत तय की जाएगी, ताकि सदस्य देशों के उत्पादक चीनी डंपिंग से सुरक्षित रह सकें.

चीन के पास 70 प्रतिशत रेयर अर्थ माइनिंग 

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वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो चीन दुनिया की लगभग 70 प्रतिशत रेयर अर्थ माइनिंग और करीब 90 प्रतिशत प्रोसेसिंग क्षमता पर नियंत्रण रखता है. बीते वर्षों में कई बार देखा गया है कि कूटनीतिक विवादों के दौरान चीन ने इन खनिजों के निर्यात पर रोक लगाई है. हाल ही में अमेरिका के साथ तनाव के दौरान भी ऐसा हुआ. इसके अलावा चीन रणनीतिक रूप से कीमतें गिरा देता है, जिससे अमेरिका, भारत या अन्य देशों में नई खदानें आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन जाती हैं. यही वजह है कि दुनिया लंबे समय से एक सिंगल सोर्स पर निर्भर बनी रही है. इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में 10 अरब डॉलर के सरकारी ऋण और निजी निवेश के साथ एक रणनीतिक खनिज भंडार बनाने की घोषणा भी की है. माना जा रहा है कि यही भंडार इस प्रस्तावित ट्रेडिंग ब्लॉक की रीढ़ बनेगा. इसका उद्देश्य आपात स्थिति में उद्योगों को झटका लगने से बचाना है.

इस बैठक में भारत भी हुआ शामिल 

इस पूरी रणनीति का असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ेगा. भारत इस अहम बैठक का हिस्सा रहा और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सम्मेलन में सक्रिय भूमिका निभाई. भारत में हाल के वर्षों में लिथियम और कॉपर के बड़े भंडार मिलने की खबरें आई हैं. इस ट्रेडिंग ब्लॉक के जरिए भारत को माइनिंग और प्रोसेसिंग के लिए अमेरिकी तकनीक और वित्तीय सहयोग मिल सकता है. इससे भारत को अपनी चिप मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रिक वाहन योजनाओं के लिए चीन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. जयशंकर ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए सप्लाई चेन के अत्यधिक संकेंद्रण से जुड़ी चुनौतियों पर जोर दिया. उन्होंने संरचित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के जरिए जोखिम कम करने की जरूरत बताई. सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए अपने संदेश में उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित और भरोसेमंद बना सकता है. मंत्रिस्तरीय सम्मेलन से पहले जयशंकर ने कनाडा, सिंगापुर, नीदरलैंड्स, इटली, मलेशिया, बहरीन, मंगोलिया, पोलैंड, रोमानिया, इजराइल और उज्बेकिस्तान समेत कई देशों के नेताओं से मुलाकात की. यह साफ संकेत है कि भारत इस नई वैश्विक व्यवस्था में सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार है.

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बताते चलें कि अमेरिका का यह प्रस्ताव केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक कदम है. अगर यह ट्रेडिंग ब्लॉक आकार लेता है, तो दुनिया की क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है. इससे न सिर्फ चीन के वर्चस्व को चुनौती मिलेगी, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए भी आत्मनिर्भर और सुरक्षित भविष्य की राह खुलेगी.

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