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असम में UCC बिल पेश, शादी-तलाक से लेकर लिव इन रिलेशनशिप तक... क्या-क्या बदल जाएगा, जानें
यह बिल पारित होने के बाद असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन जाएगा. जहां UCC लागू है, इससे पहले उत्तराखंड और गुजरात ऐसा कर चुके हैं.
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उत्तराखंड की तर्ज पर अमस की हिमंत बिस्वा सरमा ने भी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पेश कर दिया है. असम के संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की ओर से विधेयक पेश किया. हालांकि विपक्ष ने इस बिल का कड़ा विरोध किया.
असम में इस बिल को दो हफ्ते पहले कैबिनेट की मंजूरी मिली थी. इसके बाद आज विधानसभा में बिल पेश किया गया. अब इस बिल पर 27 मार्च को चर्चा होगी. अगर यह बिल पारित हो जाता है, तो असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन जाएगा. जहां UCC लागू है, इससे पहले उत्तराखंड और गुजरात ऐसा कर चुके हैं.
कौन-कौन रहेगा UCC से बाहर?
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CM हिमंत बिस्वा सरमा के मुताबिक, अनुसूचित जनजातियां (पहाड़ी) और अनुसूचित जनजातियां (मैदानी) UCC के दायरे से बाहर रहेंगी. इसके अलावा 'पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों, प्रथाओं और अनुष्ठानों' को भी इससे छूट दी जाएगी.
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बिल पेश करने के बाद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक्स पर लिखा, ‘असम विधानसभा में समान नागरिक संहिता 2026 विधेयक पेश होने से इस बात पर खुलकर चर्चा का मार्ग प्रशस्त हुआ है कि UCC समय-समय की जरूरत क्यों है और यह हमारे संस्थापकों की ओर से निर्धारित मार्ग को साकार करने में कैसे मदद करेगा?
असम मंत्रिमंडल ने पिछले सप्ताह समान नागरिक संहिता के मसौदे को मंजूरी दी थी. सूत्रों के अनुसार, असम विधानसभा का कार्यकाल एक दिन बढ़ाकर 27 मई तक कर दिया गया है. जबकि विधेयक पर चर्चा मंगलवार को होने की संभावना है. मंत्रिमंडल का यह निर्णय नव निर्वाचित असम विधानसभा के पहले सत्र से पहले आया है.
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सरकार का कहना है कि UCC का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए, चाहे उनका कोई भी धर्म हो, विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने से संबंधित व्यक्तिगत कानूनों का एक एकल, एकीकृत समूह लागू करना है. प्रस्तावित कानून का उद्देश्य विवाह की कानूनी उम्र, बहुविवाह, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मुद्दों का समाधान करना है. इससे पहले मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा था कि राज्य के पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को भी प्रस्तावित कानून के प्रावधानों से छूट दी जाएगी.
क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड?
समान नागरिक संहिता भारत में नागरिकों के व्यक्तिगत कानूनों को तैयार करने और लागू करने का एक प्रस्ताव है, जो सभी नागरिकों पर, उनके धर्म की परवाह किए बिना, समान रूप से लागू होते हैं. आमतौर पर किसी भी देश में दो तरह के कानून होते हैं. क्रिमिनल और सिविल कानून.
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क्रिमिनल कानून: आपराधिक मामलों की सुनवाई की जाती है. इसमें सभी धर्मों या समुदायों के लिए एक ही तरह की कोर्ट, प्रोसेस और सजा का प्रावधान होता है.
सिविल कानून: शादी-ब्याह और संपत्ति से जुड़ा मामला सिविल कानून के अंदर आता है, लेकिन भारत में अलग-अलग धर्मों में शादी, परिवार और संपत्ति से जुड़े मामलों में रीति-रिवाज, संस्कृति और परंपराओं का खास महत्व है. यही वजह है कि इस तरह के कानूनों को पसर्नल लॉ भी कहते हैं.
जैसे, हिंदुओं की शादी हिंदू मैरिज एक्ट के जरिए होती है. इसी तरह ईसाई और सिखों के लिए भी अलग पर्सनल लॉ हैं, वहीं, मुस्लिमों में शादी और संपत्ति का बंटवारा मुस्लिम पर्सनल लॉ के जरिए होता है.
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सभी धर्मों के लिए एक जैसा कानून
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यूनिफॉर्म सिविल कोड के जरिए पर्सनल लॉ को खत्म करके सभी के लिए एक जैसा कानून बनाए जाने की मांग की जा रही है. यानी भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए निजी मामलों में भी एक समान कानून, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो. यानी पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम पुरुष 4 शादी कर सकते हैं, लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट के तहत पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करना अपराध है. इनके लिए एक कानून बन जाएगा, जिसे दोनों धर्म के लोगों को मानना पड़ेगा.