आंख में आंसू, दिल में जज्बा...झारखंड में अपनी मांग को लेकर डटे छात्र, NMF News के कैमरे पर फूट-फूटकर रोया अभ्यर्थी, हिला देश!
झारखंड में अपने अधिकार और मांगों को लेकर छात्र डंके की छोट पर डटे हुए हैं. इस दौरान अपने संघर्ष और परेशानियों को बताते हुए एक अभ्यर्थी फूट-फूटकर रोने लगा. आंसू उसकी आंखों में थे, महसूस पूरा देश कर रहा था.
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झारखंड में छात्र JPSC-14 परीक्षाओं की CBI जांच, PT के नतीजे रद्द करने और जवाबदेही तय करने की मांग को लेकर 11 दिनों से विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. छात्र इसे सत्याग्रह करार दे रहे हैं. इतना ही नहीं छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का आज तीसरा दिन है. इसी बीच फूड डिलीवरी ब्वॉय का काम करने वाले एक छात्र-अभ्यर्थी का NMF News से बात करते हुए भावुक वीडियो और अपील सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. वो कहता है कि क्या करें? मिडिल क्लास में पैदा लेकर गलती कर दिए हैं क्या? उन्होंने कहा कि वो सरकार के लिए बेटे की तरह हैं, उन्हीं की संतान की तरह हैं, वो कुछ नहीं चाहते हैं, बस हक चाहते हैं.
इस दौरान उसने बताया कि कैसे वो परिवार का बड़ा बेटा होने के कारण काम भी करता है और अपने अधिकार के लिए लड़ाई भी लड़ रहा है.
वर्ष 2021-22 में मैंने झारखंड पुलिस का फॉर्म फिल किया था. आज 2025-26 आ गया है, फॉर्म भरे हुए इतना समय हो गया लेकिन अभी तक इसका कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ. हमारे 100 रुपये चले गए. आँखों में आँसू आ रहे हैं, अच्छा नहीं लग रहा. पर रोना नहीं है भाई, रोना नहीं है, मजबूत रहना है. ऐसा लगता है कि क्या हम लोगों ने मिडिल क्लास फैमिली में रहकर गलती कर दी? पैदा होकर गलती कर दी क्या? हम उस समय मर जाते तो भी सही रहता. हम स्टूडेंट हैं यार, कोई दुश्मन नहीं हैं आपके. कम से कम आकर मिल तो लेते. यहां से मात्र 1-2 किलोमीटर दूर मुख्यमंत्री जी का आवास है. फैमिली को बस पैसे ही भेजने पड़ते हैं. मैं घर में यह बोलकर नहीं आया हूं कि मैं यहां क्या कर रहा हूं. घर वालों को यह नहीं बताता कि मैं यही काम करता हूं. शर्म के मारे क्या बोलूँ कि मैं राइडर का काम करता हूं, क्योंकि बोलूँगा तो उन्हें भी खराब लगेगा. पर हम अपना हक लेकर रहेंगे. जैसे धर्मेंद्र प्रधान जी का मामला हो, मैं उनके बारे में कुछ नहीं बोलना चाहूंगा. किसी का इस्तीफा कोई समाधान नहीं होता, बस सिस्टम सही होना चाहिए. सर, यही फर्क और अंतर है.
इस दौरान उसने आगे कहा कि मैं बताता हूं कि मुद्दा क्या है! कार्टून वाली एक तस्वीर की ओर इशारा करते हुए कहा कि मैं पांच एग्जाम पास करके टॉपर हूं और फिर यह कांटेक्ट नंबर देते हैं कि संपर्क करें, आपको नौकरी मिलेगी. अब नौकरी कैसे मिलेगी और किस टाइप का जॉब चाहिए, उस हिसाब से पैसा तय होता है. अगर डीएसपी पद चाहिए तो 1 करोड़ 25 लाख रुपये और अगर सिपाही बनना है तो 20 लाख से 25 लाख रुपये. और सबसे पहला तो मुख्यमंत्री जी का लाडला है. अगर मुख्यमंत्री बनना हो, तब तो फिर वही लाडला है. मतलब बिना पैसे का कुछ नहीं हो सकता. मुख्यमंत्री जी का सर पर हाथ रखा हुआ है, तो फिर कैसे पॉसिबल नहीं है? इनके परिवार में पाँच-पाँच लोग लगातार जॉब में हैं. वहीं दूसरी तरफ हम मिडिल क्लास फैमिली के लोग हैं. मेरा 2018 में 10वीं कंप्लीट हुआ था, उसके बाद से लगातार तैयारी करता आ रहा हूं. 2021-22 में मैंने झारखंड पुलिस का फॉर्म भरा था. आज 2025-26 आ गया, लेकिन अभी तक कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ. हमारे 100 रुपये चले गए. उन 100 रुपयों में तो हम कुछ खा-पी लेते यार, पर सभी स्टूडेंट्स के लिए 100 रुपये बहुत होते हैं. मैं रैपिडो चलाता हूं, जोमैटो-स्विगी जैसे काम करता हूं. मैं मूल रूप से रामगढ़ का रहने वाला हूं.
सिस्टम ने मजबूर किया कि मैं रैपिडो चलाऊँ. मैं अपने घर का बड़ा बेटा हूं, तो बहुत खराब लगता है. पढ़ाई करने के लिए पैसे की जरूरत पड़ती है और फैमिली वाले उस स्थिति में नहीं हैं. इसलिए मैं पहले जो भी कमाता हूं, उसका 50% शेयर घर पर देता हूं. उसके बाद जो पैसा बचता है, उससे मैं पढ़ाई करता हूं और कमरा किराए पर लेकर रहता हूं, जिसका किराया ही ₹8,000 है. अभी मैं जेपीएससी छोड़कर यूपीएससी की प्रिपरेशन कर रहा हूं. उम्मीद तो अभी भी कायम है, जब तक जिंदगी है बाकी जो होगा देखा जाएगा. चाहता हूं कि सिलेक्शन हो जाए तो अच्छा है, नहीं तो फिर लास्ट में जो चल रहा है वह अच्छे से चलेगा. भाई, एक बात बोलेंगे कि रोना मत, आँसू अच्छे नहीं लग रहे. रोना नहीं है भाई, मजबूत रहना है. हम लोग सब साथ हैं, तुमको पिज्ज़ा खिलाते हैं, सेब खिलाते हैं, मद्रास वाली रोटी खिलाते हैं. नहीं सर, कुछ नहीं खाना है. बस हम इस भ्रष्टाचार से तंग आ चुके हैं. ऐसा लगता है कि क्या हम लोगों ने मिडिल क्लास फैमिली में पैदा होकर गलती कर दी? उस समय मर जाते तो भी सही रहता. इतना सब कुछ करने के बाद भी आज यही सब करना पड़ रहा है.
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जैसे सरकार में मंत्री-नेताओं के बेटे होते हैं, वैसे ही हम भी हैं. पर यहां आज क्या सुविधा है? ना टॉयलेट है, ना कुछ और. कोई सुविधा नहीं है, यहां चारों तरफ घास-फूस है. हम स्टूडेंट हैं यार, आपके कोई दुश्मन नहीं हैं. कम से कम आकर मिल तो लेते. यहां से मात्र 1-2 किलोमीटर दूर मुख्यमंत्री जी रहते हैं. कम से कम किसी प्रतिनिधि को ही भेज देते. आप तो दूसरी पार्टियों पर तंज कसते हैं, पर आप खुद देखिए कि आप कैसे हैं. पागल मत बन, खुश रह, इसीलिए तो सब खड़े हैं. कल भी मैं शाम में आया था. सुबह जो भी ड्यूटी करता हूं, स्विगी-ब्लिंकिट जॉइन कर लिया है. सुबह काम करके जो पैसा आता है, उससे पढ़ाई भी करता हूं और फैमिली को भी पैसा भेजना पड़ता है. मैं घर पर बताकर नहीं आया हूं कि मैं यहां क्या करने आया हूं. घर वालों को बस यही बोलता हूं कि कुछ काम करता हूं. शर्म के मारे यह नहीं बताता कि राइडर का काम करता हूं, क्योंकि बोलूँगा तो उन्हें भी खराब लगेगा. सुबह काम करता हूं और शाम को आकर 12:00 बजे रात तक प्रोटेस्ट करता हूं, फिर रूम पर चला जाता हूं.
कोई बात नहीं बाबू, तुम निकालोगे, हम सब मिलकर फाइट कर रहे हैं और सरकार सुनेगी. कभी-कभी पढ़ाई करने का भी मन नहीं करता, ऐसी सिचुएशन हो गई है. अभी ऑनलाइन बैच लेकर जैसे-तैसे पढ़ाई कर रहा हूं, बाकी सब भगवान भरोसे है. नहीं भी होगा तो भी शरीर है, काम करूंगा. मैं किसी सरकार, किसी पार्टी या किसी संगठन का विरोधी नहीं हूं. मैं एक स्टूडेंट होने के नाते बस अपना हक और अधिकार मांग रहा हूं, किसी से भीख नहीं मांग रहा हूं और यह लेकर रहूंगा. मेरा नाम रोहित कुमार है. रोहित कुमार की आँखों में जो आँसू हैं, उन्हें बयाँ करने के लिए शब्द नहीं हैं. मैं बस उन्हें सुनता और समझता रहा कि इस प्रोटेस्ट में जो लोग आए हैं, वे वाकई छात्र हैं या छात्रों की आड़ में राजनीति हो रही है. रोहित से बात करके समझ आ जाता है कि सिस्टम किस तरीके से लोगों को एक-एक दिन मार रहा है.
मैं इसलिए भी कमा रहा हूं कि आगे चलकर मेरे फ्यूचर में कुछ पैसा जमा हो जाए, ताकि जो स्थिति मेरी है, कम से कम मेरे आने वाले बच्चों की स्थिति सही रहे. उसके लिए पैसा बचा रहा हूं. डेढ़ लाख या चार लाख रुपये देकर नौकरी तो नहीं लगवा सकता ना. पर हम लड़ाई लड़ रहे हैं, सब मिलकर फाइट करेंगे. छात्र एकता है और हम अपना हक लेकर रहेंगे. हमें किसी का इस्तीफा नहीं चाहिए. जैसे धर्मेंद्र प्रधान जी का विषय हो, हम किसी का इस्तीफा नहीं चाहते, बस सिस्टम सही होना चाहिए. यही फर्क है यहां और जंतर-मंतर के प्रदर्शन में. हम मीडिया में भी यही बोल रहे हैं कि हम किसी का इस्तीफा नहीं चाहते, हम बस सिस्टम में सुधार चाहते हैं. आज आप इस्तीफा लोगे, कल कोई दूसरा मंत्री आएगा और वह भी वही करेगा, तो उससे क्या फायदा? इसलिए हमें सिर्फ और सिर्फ सॉल्यूशन चाहिए.
जंतर-मंतर पर जब मीडिया जाती थी तो लोग उन्हें गोदी मीडिया कहकर भगा देते थे. लेकिन आज यहां नेशनल मीडिया घूम रही है, तो किसी छात्र ने किसी के साथ बदतमीजी नहीं की. बल्कि खुद आकर बोल रहे हैं कि भैया हमारी बात सुन लीजिए, शायद हमारी आवाज से देश इंस्पायर हो सके या यह बात सिस्टम तक पहुँच सके. झारखंड के बच्चे ऐसे नहीं हैं, वे कभी किसी के साथ बदतमीजी नहीं करते. हम यह डंके की चोट पर कहते हैं. पिछले तीन दिनों से हम सोए नहीं हैं, दो दिन का कपड़ा लेकर आए थे और आज छठा दिन हो गया है, हर दिन कपड़े खरीदने पड़ रहे हैं. जब तक छात्रों के हित में सॉल्यूशन नहीं मिलता, हम इनके सपोर्ट में अपनी बात प्लेटफॉर्म पर दिखाते रहेंगे. कोई हमें कुछ भी बोले, हम तैयार हैं.
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सब साथ मिलकर गाएंगे, "सुनो गौर से दुनिया वालों, बुरी नजर ना हम पे डालो, चाहे जितना जोर लगा लो, सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी." झारखंड का एक प्रसिद्ध संवाद है, "ये झारखंडी है, कोई बोलता ही रे...जोहार, जय झारखंड!" यहां जंतर-मंतर की तरह चोरी नहीं होती. यहां अगर छोटा सा माइक भी गिरता है तो मिल जाता है. फोन और कनेक्टर पानी में छूट गया था, दो घंटे बाद आए तो वहीं पड़ा था. यही झारखंड है, 'वेलकम टू झारखंड!